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सोमवार, 14 दिसंबर 2020

इंसान


इंसान
तुम्हारी फुफकार से भयभीत हैं
आज सर्प भी
ढूंढ रहे हैं अपने बिल
क्योंकि जान गए हैं
उनके काटने से बचा भी जा सकता है
मगर तुम्हारे काटे कि काट के अभी नहीं बने हैं कोई मन्त्र
नहीं बनी है कोई वैक्सीन

हे विषधर
तुम्हारे गरल से सुलग रही है धरा
तो ये नाम आज से तुम्हारा हुआ
सर्पों ने त्याग दिया न केवल नाम
अपितु छोड़ दी है केंचुली भी
कि तुम ही उत्तराधिकारी हो
उनके हर कृत्य के

वंशज बनने हेतु स्वीकारो पद
सर्पों ने ग्रहण कर लिया है संन्यास

8 टिप्‍पणियां:

Onkar ने कहा…

सही कहा.सुन्दर रचना

अनीता सैनी ने कहा…

जी नमस्ते ,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (१९-१२-२०२०) को 'कुछ रूठ गए कुछ छूट गए ' (चर्चा अंक- ३९२०) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है
--
अनीता सैनी

डॉ. जेन्नी शबनम ने कहा…

बहुत सही और सटीक।

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सुन्दर सृजन

Amrita Tanmay ने कहा…

मर्माघाती ... अत्यंत प्रभावी ।

विकास नैनवाल 'अंजान' ने कहा…

सही कहा... सुन्दर रचना...

आलोक सिन्हा ने कहा…

सुन्दर रचना

मन की वीणा ने कहा…

सही कहा !
विषधर ही होता जा रहा है मानव।
सुंदर सृजन।