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मंगलवार, 11 सितंबर 2018

अदृश्य हमसफ़र मेरी नज़र में



आज एक हफ्ते बाद यहाँ वापसी हुई है. मम्मी एडमिट थीं उन्हें खून की उल्टियाँ हो गयी थीं लेकिन ईश्वर की कृपा से बहुत बड़ी बीमारी नहीं निकली और जो आई है उसके लिए प्रीकाशन लेनी होंगीं. अब भी तबियत पूरी तरह ठीक नहीं हुई है तो इसी वजह से साहित्य संसार से पूरी तरह कटी हुई थी. कुशल मंगल पता करने के लिए गंगा शरण सिंह जी का मेसेज आया, उन्हें मेरी अनुपस्थिति का आभास हुआ, जानकर अच्छा लगा, चलो कोई तो है जिन्हें हमारी कमी महसूस हुई  और एक दो मित्रों ने अपने काम से बात की. तो लब्बोलुबाब ये कि इसी बीच कल मेरे पास विनय पंवार जी द्वारा भेजा उनके द्वारा लिखित पहला उपन्यास "अदृश्य हमसफ़र" मुझे मिला. अब क्योंकि ये उपन्यास धारावाहिक रूप में लगभग आधे से ज्यादा हमने फेसबुक पर ही पढ़ा था तो अंत में क्या हुआ जानने की बेहद उत्सुकता थी. ये किसी भी किताब की खुशकिस्मती होती है यदि वो पाठक के हाथों में जाने पर एक बैठक में खुद को पढवा ले जाए और ऐसा ही कल हुआ. मम्मी थोडा ठीक थीं, सो गयी थीं तो हमें दो घंटे मिल गए और उपन्यास शुरू से दोबारा खुद को पढवा ले गया. लिखना तो मुझे पहले एक कहानी संग्रह पर था जिसके बारे में मैंने दस दिन पहले जिक्र भी किया था मगर अपनी अपनी किस्मत होती है . आज अभी टाइम मिला तो इस पर लिखने बैठ गयी.
अब बात करती हूँ उपन्यास की. इसमें तीन मुख्य किरदार हैं. अनुराग, ममता और देविका. हम अक्सर चाहते हैं हमें कोई ऐसा प्रेमी मिले जो हमें हमसे ज्यादा जान ले, हम कुछ सोचें उससे पहले उसे पूरा कर दे, हमारी इच्छा ही उसकी इच्छा हो. यानि प्रेम की उच्च स्तरीयता. जहाँ प्रेम है मगर उसका इजहार नहीं है. इजहार तो दूर की चीज किसी को अहसास तक न होने देना. अन्दर ही अन्दर प्रेम को इबादत जिसने बना दिया हो ऐसा ही किरदार है अनुराग, जिसे ममता के बाबा अपने साथ लेकर आते हैं और वो यहीं का होकर रह जाता है. वहीँ ममता, जो जब सात साल की बच्ची थी जिसे उसका आना और अपना स्नेह किसी और पर बाबा द्वारा लुटाना गंवारा नहीं होता. छत्तीस का आंकड़ा पनप जाता है ममता के अन्दर अनुराग के प्रति. वहीँ अनुराग कुशाग्र मेहनती और मर्यादा में रहने वाला लड़का. जिसे ममता पहली ही नज़र में भा जाती है यानि बचपन में पहली झलक से ही उसमें ममता के लिए एक सॉफ्ट कार्नर बन जाता है और फिर अपना पूरा जीवन सिर्फ ममता की ख़ुशी के लिए होम कर देता है बिना उसे बताये या किसी को भी बताये कि ममता की उसके जीवन में क्या जगह है.
प्रेम अपने सुगठित रूप में बहता है यहाँ. ममता की शादी हो जाना, उसके बच्चे होना और फिर पति का देहांत होने के बाद उनके पालन पोषण की जिम्मेदारी कुशलता से निबाहना, वक्त सब ममता को सिखा देता है क्योंकि शादी से पहले अपनी हर जरूरत के लिए जो लड़की अनुराग को मुंह देखा करती थी वो एक कुशल गृहणी और बिज़नस वूमेन का किरदार भी निभा जाती है. वहीँ इस उपन्यास के एक तीसरा कोण है देविका- अनुराग की पत्नी. यहाँ देविका का चरित्र कहीं किसी से जिसकी तुलना नहीं की जा सकती, ऐसा चरित्र है, जिसके लिए पति की ख़ुशी ही उसकी ख़ुशी है. उसके लिए पूरा जीवन तमाम करने वाली, सच जानते हुए भी कि उसके पति के जीवन में उसका कोई स्थान नहीं, वहां ममता विराजमान है. ये है प्रेम की उत्कट मीमांसा, जहाँ एक स्त्री, अपने पति के जीवन में दूसरी स्त्री को स्वीकार कर ले और वो भी ख़ुशी से. लेखिका ने यहाँ अपने लेखन के कौशल से पाठक को चमत्कृत कर दिया.
तीनो किरदार अपने अपने दायरों में बंधे मर्यादा की सीमा कभी क्रॉस ही नहीं करते. वहीँ इस उपन्यास को पढ़ते समय दो बातें ध्यान में आयीं. एक तो जैसे शुरू में उपन्यास चल रहा था उसे पढ़ते हुए फिल्म प्रेमरोग का ध्यान आया जिसमें नायिका को अहसास तक नहीं होता कोई उसे चाहता है, जैसा ऋषि कपूर चुपचाप कूच कर जाता है पद्मिनी कोल्हापुरे की शादी के बाद, उसकी विदाई का वो हिस्सा जैसे यहाँ भी वैसे ही प्रयुक्त हुआ हो लेकिन यहाँ उसे लेखिका ने एक अलग मोड़ दे दिया. वहीँ इस उपन्यास को जब धारावाहिक रूप से पढ़ रही थी तब साथ साथ जैसे मेरे धर्मवीर भारती का गुनाहों का देवता भी चल रहा था. वहां भी प्रेम इज़हार को तरसता है, लेकिन मूक इज़हार दोनों तरफ से होता है और फिर अपनी अपनी सीमा में बंधे सुधा का विवाह हो जाता है और चंदर उसके प्रेम में खुद को बर्बादी के कगार पर ले जाता है. वहीँ सुधा का किरदार वहां मजबूत होते हुए भी मजबूत नहीं रहता और एक तरह से जैसे वो खुद को ख़त्म ही कर लेती है और चंदर को विवाह के लिए मजबूर. पढ़ते पढ़ते यही ध्यान आ रहा था आखिर लेखिका इसे कहाँ ले जाकर अंत देगी क्योंकि बेहद साम्यता थी यहाँ भी दोनों उपन्यासों में. मगर यहीं लेखिका ने वो मोड़ दिया जिसके बारे में मैं 'गुनाहों का देवता' के लिए उम्मीद करती थी और जिसके बारे में मैंने ऐसे ही तर्क देते हुए अभी अपने समीक्षा संग्रह 'अपने समय से संवाद' में दिया है. जो पक्ष मजबूत हो उसे चाहिए दुसरे को जीने के लिए, आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करे. यहाँ ऐसा ही होता है. उम्र के उस मोड़ पर जाकर प्रेम का इज़हार होता है जहाँ उसके बेशक कोई मायने न हों फिर भी एक दूसरे की भावनाओं का सम्मान होता है. प्रेम जब शरीर के स्तर पर होता है तो वो वास्तव में सिवाय वासना के कुछ नहीं लेकिन जहाँ प्रेम शरीर से ऊपर उठकर एक इबादत बन जाए तो खुदा हो जाता है. यहाँ प्रेम की उसी दिव्यता को लेखिका ने प्रस्तुत किया है.
अब बात करते हैं उपन्यास के शीर्षक की तो वाकई उपन्यास का शीर्षक कितना सार्थक है ये पढ़कर जाना जा सकता है जहाँ अनुराग हर पल साए की तरह ममता की ढाल बना रहता है और ममता को पता भी नहीं होता. प्रेम प्रतिकार नहीं चाहता मानो इसी उक्ति को चरितार्थ किया है यहाँ अनुराग ने. वहीँ अंत में ममता के दिल में एक छोटा सा कोना पा जाना मानो प्रेम की सार्थकता है लेकिन यहाँ भी मूक है प्रेम, यहाँ भी कोई इज़हार नहीं, यहाँ भी एकतरफा स्वीकार्यता है. प्रेम की दिव्यता ही यही है मानो एकतरफा प्रेम की यदि कोई सही व्याख्या हो सकती है तो यही हो सकती है जहाँ दूसरे पक्ष को पता भी न चले और कोई अदृश्य रूप में हमसफ़र बन साथ साथ चलता रहे उम्र भर जैसे खुदा.
ज्यादा उपन्यास के बारे में खोलना सही नहीं इसलिए न उसके अंत के बारे में बताऊँगी और न ही कहानी के बारे में वर्ना रोचकता ख़त्म हो जाएगी. लेकिन उपन्यास में पठनीयता का गुण है तो लेखिका में किस्सागोई का. तभी उपन्यास खुद को इतने कम समय में दोबारा पढवा ले गया. चूँकि लेखिका का पहला उपन्यास है तो उस लिहाज से एक अच्छी कोशिश की है जो सराहनीय है. बाकी संभावनाएं तो अनंत होती हैं किसी भी लेखन में और पाठकों के जेहन में. पाठक तो और और और की दरकार रखता है यानि ये भी होता या ऐसा भी होता मगर किसी भी अगर मगर की यहाँ जरूरत नहीं. रोचकता पाठक को अपने पाश में बांधे रखती है और यही किसी भी लेखन का सबसे जरूरी तत्व होता है. लेखिका को पहले उपन्यास के लिए अनंत शुभकामनाएं. उम्मीद है पाठकों को आगे भी उनकी कलम इसी तरह नवाजती रहेगी.

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