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रविवार, 1 मई 2016

हाशिये का नवगीत

ये हाशिये का नवगीत है
जो अक्सर
बिना गाये ही गुनगुनाया जाता है

एक लम्बी फेहरिस्त सा
रात में जुगनू सा
जो है सिर्फ बंद मुट्ठियों की कवायद भर

तो क्या हुआ जो
सिर्फ एक दिन ही बघार लगाया जाता है
और छौंक से तिलमिला उठती हैं उनकी पुश्तें

तुम्हारे एक दिन के चोंचले पर भारी है उनके पसीने का अट्टहास


सन्दर्भ --- मजदूर दिवस

7 टिप्‍पणियां:

शिवम् मिश्रा ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " मजदूर दिवस, बाल श्रम, आप और हम " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Vandanagupte55 ने कहा…

तुम्हारे एक दिन के चोंचले पर भारी है उनके पसीने का अट्टहास..
सही कहा।

Kavita Rawat ने कहा…

तुम्हारे एक दिन के चोंचले पर भारी है उनके पसीने का अट्टहास.....सटीक

दिखावा ज्यादा देर नहीं टिकता

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (03-05-2016) को "लगन और मेहनत = सफलता" (चर्चा अंक-2331) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
--
श्रमिक दिवस की
शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

राकेश कौशिक ने कहा…

सटीक और सार्थक

Onkar ने कहा…

बहुत सुन्दर

Shape Me Fit ने कहा…

I like the way of your writing, you just write with your heart;
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