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रविवार, 20 सितंबर 2015

मोहब्बत के हरम

वो कहते हैं
दिल के जंगल में
फूल खिले
गर मोहब्बत का कोई
तो शायद हो जाये हरा

और हम
यूँ वीरानों के अदब से वाकिफ हैं
जाने फिर भी कैसे
खामोशियों के जंगल से मोहब्बत कर बैठे

अब
अपने अपने जंगल के बादशाह
ढूंढ रहे हैं अपनी अपनी मेहरूनिसा

ये मोहब्बत के हरम हमेशा सूने ही क्यों होते हैं 
और प्यास के पनघट हमेशा प्यासे 
खोज में हैं 
एक अरसे से दोनों ही ..........


3 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (21-09-2015) को "जीना ही होगा" (चर्चा अंक-2105) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

savan kumar ने कहा…

सफर जिंदा रहना चाहिए मंज़िल का पता हो न हो
http://savanxxx.blogspot.in

Onkar ने कहा…

बहुत सुंदर