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शुक्रवार, 21 अगस्त 2015

हाँफते हुए लोग

ये हाँफते हुए लोगों का शहर है 
जो हाँफने लगते हैं अक्सर 
दूसरों के भागने / दौड़ने भर से 

उठा लेते हैं अक्सर परचम 
करने को सिद्ध खैरख्वाह 
भाषा संस्कृति और साहित्य का 
मगर 
जहाँ भी देखते हैं झुका हुआ पलड़ा 
झुक जाते हैं 

झुका दी जाती हैं बड़ी बड़ी सत्ताएं 
अक्सर अर्थ के बोझ तले
वाकिफ हैं इस तथ्य से 
इसलिए 
विरोध का स्वर साक्षी नहीं किसी क्रांति का 
जानते हैं ये ....

वास्तव में तो भीडतंत्र है ये 
प्रतिकार हो , विरोध या बहिह्कार 
स्लोगन भर हैं 
हथियार हैं इनके 
खुद को सर्वेसर्वा सिद्ध करने भर के 
असलियत में तो 
सभी तमाशाई हैं या जुगाडू 

ऊँट के करवट बदलने भर से 
बदल जाती हैं जिनकी सलवटें 
मिला लिए जाते हैं 
सिर से सिर , हाथ से हाथ 
और बात से बात 
वहाँ
मौकापरस्त नहीं किया करते 
मौकापरस्तों का विरोध , बहिष्कार या प्रतिकार

हाँफते रहो और चलते रहो 
बस यही है मूलमंत्र विकास की राह का 

3 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (22-08-2015) को "बौखलाने से कुछ नहीं होता है" (चर्चा अंक-2075) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

kuldeep thakur ने कहा…

आप की लिखी ये रचना....
23/08/2015 को लिंक की जाएगी...
http://www.halchalwith5links.blogspot.com पर....


Onkar ने कहा…

बहुत सुंदर प्रस्तुति