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रविवार, 8 मार्च 2015

फिर नहीं रहोगी तुम मोहताज एक दिन के ताज की ..........

कितना अच्छा लगता है न 
जब एक दिन में ज़िन्दगी सिमट जाती है 
तुम्हें मुक्ति की लोलीपॉप हाथ में पकड़ाई जाती है 
और तुम एक बार फिर 
अदृश्य चक्रव्यूह की शिकार हो 
रख देती हो खुद को गिरवीं 

आह ! स्त्री मुक्ति , स्त्री विमर्श , महिला दिवस 
सिर्फ एक दिन मुक़र्रर किया गया है तुम्हें साँस लेने को 
क्या संतुष्ट हो एक दिन से ओ स्त्री ?

शायद तभी तो खुश हो दे देती हो 
'महिला दिवस की शुभकामनाएं '
बिना जाने महिला दिवस के अर्थहीन औचित्य को 
क्योंकि 
तुम हो तो जीवन है 
जीवन का अर्थ है 
ये संसार है 
इसका आधार है 
बस इतना सा ही तो समझना है तुम्हें 
फिर हर दिन तुम्हारा है 
फिर नहीं रहोगी तुम मोहताज एक दिन के ताज की ..........

2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (09-03-2015) को "मेरी कहानी,...आँखों में पानी" { चर्चा अंक-1912 } पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत सटीक अभिव्यक्ति...