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शुक्रवार, 1 अगस्त 2014

ओ रे बदरवा आवत हो का !!!

आस का बादल 
गर झूम के बरसा 
इस बरस तो 
उग आएँगी खेत में 
सरला के ब्याह की किलकारियाँ 
माँ की दवा 
छोटे के ऑपरेशन का खर्च 
दो जून की रोटी 
और एक अदद धोती 
सरला की माँ के लिए 
टकटकी लगाये 
तपते आकाश से 
बुझा रहा था जीवन की पहेलियाँ 
आज फिर सुखिया अपना नाम सार्थक करने को 
गुजर गयी उम्र जिसकी 
फटी मैली कुचैली धोती में 

ओ रे बदरवा आवत हो का !!!
गूँज रहा था स्वर कम्पायमान ध्वनि में 


आस विश्वास और अविश्वास के मध्य ...

11 टिप्‍पणियां:

रविकर ने कहा…

आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति आज शनिवासरीय चर्चा मंच पर ।।

yashoda agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना शनिवार 02 अगस्त 2014 को लिंक की जाएगी.........
http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

सु..मन(Suman Kapoor) ने कहा…

बहुत बढ़िया

Anusha Mishra ने कहा…

बेहतरीन

Smita Singh ने कहा…

वाह,उत्कृष्ट

Pratibha Verma ने कहा…

सुन्दर रचना...

Pratibha Verma ने कहा…

सुन्दर रचना...

anupam ने कहा…

सुन्दर रचना

BLOGPRAHARI ने कहा…

आपका ब्लॉग देखकर अच्छा लगा. अंतरजाल पर हिंदी समृधि के लिए किया जा रहा आपका प्रयास सराहनीय है. कृपया अपने ब्लॉग को “ब्लॉगप्रहरी:एग्रीगेटर व हिंदी सोशल नेटवर्क” से जोड़ कर अधिक से अधिक पाठकों तक पहुचाएं. ब्लॉगप्रहरी भारत का सबसे आधुनिक और सम्पूर्ण ब्लॉग मंच है. ब्लॉगप्रहरी ब्लॉग डायरेक्टरी, माइक्रो ब्लॉग, सोशल नेटवर्क, ब्लॉग रैंकिंग, एग्रीगेटर और ब्लॉग से आमदनी की सुविधाओं के साथ एक सम्पूर्ण मंच प्रदान करता है.
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वाणी गीत ने कहा…

बुझी आँखों में विश्वास /अविश्वास जीवन देता है या निराशा !
अच्छी रचना !

lori ali ने कहा…

pyaaraaa.....