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रविवार, 22 अप्रैल 2012

ना तलाश मुकम्मल हुई और ना ही "मैं" ..........

सुनो 
बदल दो मुझमे
मेरा सब कुछ 
हाँ ...........सब कुछ
कहा था एक दिन तुमसे
और देखो तो ज़रा
मुझमे "मैं" कहीं बची ही नहीं 

तेरी तमन्ना 
तेरी चाहत
तेरी आरजू 
बस यही सब तो 
ज़िन्दगी बन गयी 
मगर कोई तलाश थी बाकी
जो अब भी अधूरी रही 

अलाव का सुलगना
गर्म तवे पर बूँद का वाष्पित होना
और चिनारों के साए में भी 
धूप की तपिश से जल जाना 
बस अब और क्या बचा ?

ना तलाश मुकम्मल हुई और ना ही "मैं" ..........
बदलाव की प्रक्रिया में सुलगते अंगारों की पपड़ी आज भी होठों पर जमी है .......... दो बूँद अमृत की तलाश में 

31 टिप्‍पणियां:

vikram7 ने कहा…

न तलाश मुकम्मल हुई न ही ''मै''
बेहतरीन भाव लिये ,प्रभावशाली कविता

PARAM ARYA ने कहा…

शाश्वत भाव जगत की झांकी.

ब्लॉ.ललित शर्मा ने कहा…

गहरे भाव है, तलाश कभी पूरी नहीं होती। फ़िर भी जारी रहती है। लगा रहता है मनवा।

रश्मि प्रभा... ने कहा…

अतृप्ति की अग्नि आज भी सुलग रही है एक बूंद की तलाश में .... खुद को पाने की चाह में

expression ने कहा…

very nice.........

संध्या शर्मा ने कहा…

ना ही तलाश मुकम्मल हुई ना ही मैं..
नाजुक कोमल भाव...अधूरी तलाश...

RITU ने कहा…

बेहतरीन !

दिगम्बर नासवा ने कहा…

जब खुद ही बदलने की चाह थी तो किसी से क्या उल्हाना ... जो भी है उस अधूरेपन की जीना पढ़ेगा ... गहरी उदासी लिए है रचना ...

shikha varshney ने कहा…

तलाश कभी खत्म ही कहाँ होती है. सुन्दर प्रस्तुति.

India Darpan ने कहा…

बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति....


इंडिया दर्पण
की ओर से शुभकामनाएँ।

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

Nice post.

sushma 'आहुति' ने कहा…

कोमल भावो की और मर्मस्पर्शी.. अभिवयक्ति .......

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

:)

dheerendra ने कहा…

बेहतरीन और सुंदर प्रस्तुति !

MY RECENT POST...काव्यान्जलि ...:गजल...

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

चिनारों के साए में भी धूप की तपिश से जल जाना

बहुत सुंदर भाव

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

यही अधूरापन पूरेपन की ओर बढ़ते कदम हैं।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बढ़िया रचना!
पृथ्वी दिवस की शुभकामनाएँ!

mridula pradhan ने कहा…

bahut sunder.....

कुमार राधारमण ने कहा…

मैं का न बचना एक दुर्लभ अवस्था है। किंतु,यहां तलाश शायद भौतिकता की है।

Rakesh Kumar ने कहा…

आपकी गहन पीड़ा को आप ही ज्यादा समझ
सकती हैं,या आपका कान्हा,जो आपको ऐसा
अहसास करवा रहा है.
दो बूंद अमृत क्या आपका निवास अमृत के सागर में है वन्दना जी.

मनोज कुमार ने कहा…

जब बदलाव की भावना मन में जग गई तो समझिए की तलाश तो मुकम्मल हुई, बस खुद को मुकम्मल हुआ ही समझिए।

veerubhai ने कहा…

स्वगत कथन सी खुद से ही संवाद करती रचना .खामोश सफ़र अभी ज़ारी है चिनार के साए में धूप है मनवा बे -चैन है ,तुम बिन नहीं चैन है .

abhi ने कहा…

मुझे तो कविता का शीर्षक ही बहुत अच्छा लगा "ना तलाश मुकम्मल हुई और ना ही मैं" :)
कविता भी अच्छी है!!!

Maheshwari kaneri ने कहा…

bahut gahan bhav..

इमरान अंसारी ने कहा…

गहन संवेदनशील......बदलाव की प्रक्रिया में बहुत कुछ जलकर खाक हो जाता है ।

Naveen Mani Tripathi ने कहा…

bahut hi prabhav shali post abhar ke sath hi badhai bhi,

मेरे भाव ने कहा…

RUMANI KAVITA..

AlbelaKhatri.com ने कहा…

anupam kavita ...........

badhaai !

Ramakant Singh ने कहा…

SEARCH AND ENDLESS JOURNEY NO THERE MUST BE END OF SEARCH LET IT .

mahendra verma ने कहा…

मैं का अधूरापन शायद कभी पूरा नहीं होता।
सुंदर कविता।

Saras ने कहा…

सुन्दर गहन अभिव्यक्ति वंदनाजी