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मंगलवार, 22 अप्रैल 2025

हे रुष्ट प्रकृति

 

हे रुष्ट प्रकृति
करके क्रोध का त्याग
होंगी तुम कैसे प्रसन्न?

ये मूढ़ मानव
है तो तुम्हारी ही संतान
लाड़ का कर दुरुपयोग
पहुँचाई तुम्हारे जिया को ठेस
जानता है मानता है
कर दो क्षमा अब हे जीवनदायिनी
हे प्रेम वत्सला! इतना क्रोध ठीक नहीं

तू दया ममता की खान है
तुझसे ही तो पृथ्वी की शान है
तू ही माँ, तू ही देवी, तू ही जग कल्याणी
तुझसे ही पाएं आधार नर नारी
मगर
तेरी रुग्ण देह नहीं देख सका
देखा तो भी अनदेखा किया
अपने गुरुर में मगरूर हो
तुझे ही भट्टी में झोंक दिया
अब तेरी रूह के फफोलों से
नज़र न मिला पाता है
खुद पर जब बीती
तब तेरे दर्द की थाह पाता है
हे करुणामयी ! अब कर कल्याण
स्वच्छता निर्मलता के आभूषण से कर श्रृंगार
फिर विभोर हो कर नृत्य कदमताल
मुस्कुरा खिलखिला प्रफुल्लित हो जा
मानव को क्षमा कर फिर से सुरभित हो जा

अब न तेरा शोषण करेगा
ओ प्रकृति! बस शीश झुका तेरी शक्ति को ही नमन करेगा




4 टिप्‍पणियां:

Priyahindivibe | Priyanka Pal ने कहा…

बहुत सुंदर

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सुन्दर

Onkar ने कहा…

बहुत सुंदर प्रस्तुति

Admin ने कहा…

ये कविता बेहद असरदार और सोचने पर मजबूर करने वाली है। आपने प्रकृति को माँ की तरह पुकारा है और यह याद दिलाया है कि वही जीवनदायिनी है जिसने हमें सब कुछ दिया है। आज जब मैं अपने आसपास के पेड़ों, नदियों और वातावरण को सोचता हूँ, तो मुझे भी लगता है कि हमने कितनी लापरवाही से उसके साथ व्यवहार किया है।