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शनिवार, 15 दिसंबर 2018

मुझे ऊपर उठना था

मुझे ऊपर उठना था
अपनी मानवीय कमजोरियों से
आदान प्रदान के साँप सीढ़ी वाले खेल से

मैंने खुद को साधना शुरू किया
रोज खुद से संवाद किया
अपनी ईर्ष्या
अपनी कटुता
अपनी द्वेषमयी प्रवृत्ति से
पाने को निजात
जरूरी था
अपने शत्रुओं से दूरी बनाना
उनका भला चाहना
उनका भला सोचना

ये चाहना और सोचना संभव न था
सिर्फ मेरे लिए ही नहीं , किसी के लिए भी
मगर मेरी जिद ने
मुझमें रोंपे कुछ सुर्ख गुलाब संवेदना के
कि शहर से विस्थापित होने के लिए
करना ही होगा एक हवन
अपनी प्रवृत्तियों से मुक्त होने का
और शुरू हो गयी जिरह

मैं ही जज
मैं ही वकील
मैं ही मुजरिम
बहस के पायदान पर
जितनी बार आत्ममुग्धता की सीढ़ी चढ़ी
उतनी बार द्वेष के साँप से डंसा गया
जितनी बार सिर्फ अपने 'मैं' को पोषित किया
उतनी बाद आंतरिक विद्रोह से आहत हुआ
'खुद का खुद से संवाद कहीं ढकोसला तो नहीं' का जब आक्षेप लगा
व्याकुल चेतना फडफडा कर जमीन पर गिर पड़ी

फैसला एकपक्षीय मोहर के इंतज़ार में
आज भी
वटवृक्ष की छाँह में कर रहा है परिक्रमा

विषवमन ही अंतिम विकल्प नहीं किसी भी युद्ध का ...




4 टिप्‍पणियां:

Dr Varsha Singh ने कहा…

सुंदर रचना

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा आज रविवार (16-12-2018) को "समझौता" (चर्चा अंक-3187) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Onkar ने कहा…

सुन्दर रचना

Book River Press ने कहा…

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