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शनिवार, 22 अप्रैल 2017

मंजिल की तलाश में

मंजिल की तलाश में
बहुत दूर निकल आये हम
वो कहते हैं रास्ता बदल दो
वो कहते हैं मंजिल 


अब मुझे खुद से शिकायत है
सोचता हूँ
खुदा बदल दूँ


कि
बुतपरस्ती मेरा शौक है यारा ....

2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (23-04-2017) को
"सूरज अनल बरसा रहा" (चर्चा अंक-2622)
पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

Onkar ने कहा…

सुन्दर पंक्तियां