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शनिवार, 4 जून 2016

तमंचे पर डिस्को

वक्त का जालीदार बिछौना है ज़िन्दगी
जर्रे जर्रे से रेत सी फिसलती
मौत के स्पंदन ख़ारिज करने से खारिज नहीं होते

ज़िन्दगी न साहस है न दुस्साहस
अम्लीय क्षार ने कब दी है दुहाई
एकतारे से चाहे जितनी धुनें निकालो
आखिरी कतार में तो मिलेगी रामनामी धुन ही

अब पालो पोसो पुचकारो दुलारों
गर्दिशों की पाँव में जंजीरें नहीं हुआ करतीं
और ज़िन्दगी , दहशतगर्दी का दूसरा नाम है
अक्सर कह देते हैं कुछ लोग
जो नहीं जानते
अरूप और कुरूप के मध्य
रूप है ज़िन्दगी
श्रृंगार है ज़िन्दगी
अलंकार है ज़िन्दगी

ज़िन्दगी से इश्क तमंचे पर डिस्को सा है ...

2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (06-06-2016) को "पेड़ कटा-अतिक्रमण हटा" (चर्चा अंक-2365) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

dj ने कहा…

बहुत खूब लिखा है आदरणीया