मैंने एक ख्वाब देखा है ,चाहतों का बाज़ार देखा है,यह कौन सी मंज़िल है,जो मिल कर भी नहीं मिलती ,हर तरफ एक खामोशी सी छाई है , दर्द है तनहाई है,यह कौन सा मुकाम है जिन्दगी का, जहाँ कुछ नहीं मिलता ,सिर्फ ख्वाबों को टूटते देखा और जिन्दगी को हाथ से फिसलते देखा ,अब इस दौर मैं कैसे ख्वाबों को सजाऊँ ?किसे आवाज़ दूं और किसे बुलाऊं ?
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बुधवार, 4 जुलाई 2007
ख्वाब
दिल चाहता है
दिल चाहता है आसमान में ऊड़ना,
पंछियों कि तरह उन्मुक्त ऊड़ना ,
बादलों की तरह हवा में तैरना ,
विशाल आकाश को छूना ,
जहाँ ना कोई बंदिश हो ना पहरे,
बस मैं हूँ और मेरी चाहतें हों,
जहाँ मैं सुन सकूं अपने मन कि बात ,
अपनी आवाज़ को दे सकूं शब्द ,
कुछ दिल की कहूं कुछ दिल की सुनूं
और बस आस्मां में ऊड्ती फिरूं ऊड्ती फिरूं ऊड्ती फिरूं।
पंछियों कि तरह उन्मुक्त ऊड़ना ,
बादलों की तरह हवा में तैरना ,
विशाल आकाश को छूना ,
जहाँ ना कोई बंदिश हो ना पहरे,
बस मैं हूँ और मेरी चाहतें हों,
जहाँ मैं सुन सकूं अपने मन कि बात ,
अपनी आवाज़ को दे सकूं शब्द ,
कुछ दिल की कहूं कुछ दिल की सुनूं
और बस आस्मां में ऊड्ती फिरूं ऊड्ती फिरूं ऊड्ती फिरूं।
शनिवार, 30 जून 2007
कैसे कहूं
दिल की बात कैसे कहूं ,किससे कहूं ,यहाँ कौन है सुनने वाला,
इक छोटी सी आरजू है ,इक छोटी सी तमन्ना है ,
बरसों से दबी ख्वाहिश है , कोई हो इक ऐसा जो समझे इस दिल को,
जाने इस के दर्द को , और कोशिश करे समझने की
यह दिल क्या चाहता है , गर कोई जान ले तो
जीने की आरजू पूरी हो जाये , मरने का कोई मलाल ना रहे
लेकिन किससे कहूं और कैसे कहूं ?
इक छोटी सी आरजू है ,इक छोटी सी तमन्ना है ,
बरसों से दबी ख्वाहिश है , कोई हो इक ऐसा जो समझे इस दिल को,
जाने इस के दर्द को , और कोशिश करे समझने की
यह दिल क्या चाहता है , गर कोई जान ले तो
जीने की आरजू पूरी हो जाये , मरने का कोई मलाल ना रहे
लेकिन किससे कहूं और कैसे कहूं ?
शुक्रवार, 29 जून 2007
वक़्त और जिन्दगी
वक़्त ने कब जिन्दगी का साथ दिया हमेशा आगे ही चलता जाता है और जिन्दगी वक़्त की परछाईं
सी नज़र आती है। वक़्त बहुत बेरहम है , अपनी परछाईं का साथ भी छोड़ देता है। वक़्त का हर सितम जिन्दगी सहती जाती है मगर उफ़ भी नहीं कर सकती। किसी के पास इतना वक़्त होता है कि काटना मुश्किल हो जाता है और किसी को इतना भी वक़्त नहीं होता कि अपने लिए भी कुछ वक़्त निकाल सके। वाह! रे वक़्त के सितम।
वक़्त जिन्दगी को बहुत उलझाता है।
यह कैसा वक़्त आ गया जब जिन्दगी भी कुछ कह नहीं पाती
और वक़्त के खामोश सितम भी सह नहीं पाती
गर कुछ कहना भी चाहे तो सुनने वाला कोई नहीं
यह कैसी बेबसी है , यह कैसी आरजू है,
वक़्त के सितम हँस के सहने को मजबूर
जिन्दगी उदास राहों पर चलती जाती है
काश!कोई दिखाये दिशा इस जिन्दगी को
वक़्त के साथ चलना सिखाये कोई जिन्दगी को
खामोश राहें हैं खामोश डगर है जिन्दगी की
वक़्त का साथ गर मिल जाये तो जिन्दगी के मायने बदल जाएँ
सी नज़र आती है। वक़्त बहुत बेरहम है , अपनी परछाईं का साथ भी छोड़ देता है। वक़्त का हर सितम जिन्दगी सहती जाती है मगर उफ़ भी नहीं कर सकती। किसी के पास इतना वक़्त होता है कि काटना मुश्किल हो जाता है और किसी को इतना भी वक़्त नहीं होता कि अपने लिए भी कुछ वक़्त निकाल सके। वाह! रे वक़्त के सितम।
वक़्त जिन्दगी को बहुत उलझाता है।
यह कैसा वक़्त आ गया जब जिन्दगी भी कुछ कह नहीं पाती
और वक़्त के खामोश सितम भी सह नहीं पाती
गर कुछ कहना भी चाहे तो सुनने वाला कोई नहीं
यह कैसी बेबसी है , यह कैसी आरजू है,
वक़्त के सितम हँस के सहने को मजबूर
जिन्दगी उदास राहों पर चलती जाती है
काश!कोई दिखाये दिशा इस जिन्दगी को
वक़्त के साथ चलना सिखाये कोई जिन्दगी को
खामोश राहें हैं खामोश डगर है जिन्दगी की
वक़्त का साथ गर मिल जाये तो जिन्दगी के मायने बदल जाएँ
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