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मंगलवार, 29 सितंबर 2015

अर्थहीन है वो ............

जब तक बुहारती रही आँगन
मिटाती रही सिलवटें
घर, बाज़ार
स्कूल ,डॉक्टर
से लेकर दुनियावी पहलुओं तक
उगाती रही कोशिशों के चिनार
खुद को मिटा सजाती रही तुम्हारी बज़्म
बा -अदब बा - मुलाहिजा होशियार की टंकार
और सिर झुकाने के अदबी रिवाजों के साथ
प्रिय थी शायद
या फिर स्वीकार था इतना होना भर उसका

समय समेट ही लेता है खुद में
धन रूप और यौवन को भी
ऐसे अंधेरों में घिरने पर
सूख जाती हैं शाखाएं
झरने लगते हैं पत्ते
शिथिल होने लगते हैं अंग
चूलों के हिलने से
हिलने लगती है जब इमारत
और फिर ऐसे नाज़ुक वक्त में
नकारा जाने लगता है अस्तित्व
आखिर बेजारियों की तीमारदारी कोई क्यूँ करे ?

पालने में झूलने के दिन तो
वैसे भी नसीब की क्यारियों में नहीं उगा करते
लेकिन तब भी
उम्मीद की क्यारी में जवां रहता है एक ख्वाब
शायद कभी खिल जाए ये जवाकुसुम
और हो जाये वो निहाल

ख्वाब ख्वाब ही होते हैं .......हकीकत नहीं
वाकफियत करा दी जाती है
जब हकीकत की तस्वीर उसे दिखाई जाती है
हाँ , अनुपयोगी हो अब तुम
खाना पीना और दंगडाना भर है तुम्हारा काम
जो नहीं है अब हमें स्वीकार

और रह जाती है वो हतप्रभ
हो जाती है सोचने को मजबूर
आखिर क्या है कारण
जो हो गयी यूं निष्कासित

क्या यही है एकमात्र कारण
उसके अस्तित्व को नकारे जाने का
कि ' हाउसवाइफ ' है वो
जिसका जिसकी उपयोगिता तक ही होता है , होना 


अर्थ बिना अर्थहीन है वो .............

रविवार, 20 सितंबर 2015

मोहब्बत के हरम

वो कहते हैं
दिल के जंगल में
फूल खिले
गर मोहब्बत का कोई
तो शायद हो जाये हरा

और हम
यूँ वीरानों के अदब से वाकिफ हैं
जाने फिर भी कैसे
खामोशियों के जंगल से मोहब्बत कर बैठे

अब
अपने अपने जंगल के बादशाह
ढूंढ रहे हैं अपनी अपनी मेहरूनिसा

ये मोहब्बत के हरम हमेशा सूने ही क्यों होते हैं 
और प्यास के पनघट हमेशा प्यासे 
खोज में हैं 
एक अरसे से दोनों ही ..........


गुरुवार, 17 सितंबर 2015

ईर्ष्या

क्या फर्क पड़ता है
मैं स्त्री हूँ या पुरुष
मानव सुलभ इर्ष्याओं से तो ग्रस्त रहता ही हूँ

पड़ जाता हूँ हैरत में
अपने समकालीनों को देख
नहीं स्वीकार पाता उनका बढ़ता वैभव
आखिर कैसे संभव है
कम समय में बुलंदियों को छूना
हमने क्या महज घास की खोदी है एक अरसे से
जो कल के आये
तरेरते हैं आँखें
करते हैं जुबाँ बंद अच्छे अच्छे लिक्खाडों की

न न यूं तो अपने वर्चस्व पर
लग जाएगा ग्रहण
ज्यों हम यूं तरजीह देते रहे
और वाह वाह का छौंक
उनके लेखन में देते रहे

बदलनी होगी तस्वीर
खुद को बचाने की जद्दोजहद में
खींचनी ही होगी एक लकीर
उनके और अपने बीच
ताकि तहजीब के फासलों पर
बची रहे कुछ इज्जत

यूं भी
फिर क्या बचेगा हमारे पास
कर दिए जायेंगे दरकिनार जब
इसलिए सोचा है
अपनी इर्ष्या को स्नेहमिश्रित चाशनी में डुबाकर
भले ही ऊपर से ही सही
करने ही होंगे थोड़े बहुत गुणगान
मगर
आलोचना के सम्पुट लगाकर
ताकि
बचा रहे लोकतंत्र लेखन में हमारा भी

ये आज के वक्त की
आज के लेखन की राजनीति है
फिर भला कैसे अछूते रह सकते हैं हम 


जानते हो 
मुख पर मुस्कान का खोल ओढना 
वाहवाही की झांझर झंकाना 
सच पर हैरिसन ताले लगाकर रखना
और अन्दर ही अन्दर ईर्ष्या को सहेजना भी एक कला है 

क्या आती है तुम्हें ?

गुरुवार, 10 सितंबर 2015

घोर संघर्ष काल है

घोर संघर्ष काल है
नहीं पता
हिन्दी का या हिन्दी के साहित्यकारों का
या फिर दोनों का
क्योंकि
मौज तो राजनीतिज्ञों की है
या चाटुकारों की

हिंदी की बाँह कौन पकड़ता है
सबको बस अपना मकसद ही दिखता है
वो तो कल भी अवांछित थी
आज भी है और कल भी रहेगी
क्योंकि
जो राजभाषा से राष्ट्रभाषा तक का सफ़र तय न कर पायी
या कहिये
जिसे ये सफ़र तय नहीं करने दिया गया
उस हिन्दी का भी भला कोई उज्जवल भविष्य हुआ

आओ शंख ध्वनि करो
आओ उद्घोष करो
आओ अपना परचम फहराओ
कि
हमने तय कर ली है एक और दूरी
तो क्या हुआ जो
चार दिन में चार कोस ही चले हों

बस इतना सा ही तो है मकसद
विश्व पटल पर लगा कर बिंदी
हमने अपना परचम फहरा दिया
हिन्दी का नाम बढ़ा दिया
अब गर्व से कहो
जय हिन्दी जय भारत

विश्व हिंदी सम्मलेन में शामिल होना खाला जी का घर नहीं जनाब

( सन्दर्भ : १० वां विश्व हिंदी सम्मलेन )

गुरुवार, 3 सितंबर 2015

' मुँह काला होना '

कितनी उठापटक है
फिर वो साहित्य हो , समाज , राजनीति या रिश्ते

कितने विषय बिखरे पड़े हैं
एक अराजकता सिर उठाये खड़ी है 
मगर मेरी साँसों में 
मेरे दिल में 
मेरे दिमाग में 
मेरी सोच में 
मेरे विचार में 
निष्क्रियता के परमाणु बिखरे पड़े हैं
आहत हैं इतने कि 
प्रतिकार भी नहीं करते और स्वीकार भी नहीं

विस्फोटक समय है ये 
जहाँ आंतरिक उथल पुथल शब्दहीन है
फिर मर्यादाओं के शिखरों का ढहना कोई आश्चर्य नहीं

' मुँह काला होना ' श्रृंगार है आज के समय का ..........

सोमवार, 31 अगस्त 2015

" ..... के भौंकने से शहर खाली नहीं होते "

" ...... के भौंकने से शहर खाली नहीं होते "
***************************************
ओ बगावती हवाओं
स्वीकार नहीं तुम्हारे स्वर
तुम्हारे आकाओं को
कि
सिर झुकाने की रवायतें
गर बदल दी जाएँ
तो कैसे संभव है उनका सिर उठाकर चलना
एकछत्र राज्य के वारिस हैं जो

ये शापित वक्त है
जहाँ फलने फूलने के मौसम
सिर्फ चरण चारण करने वालों को ही नसीब होते हैं

फिर क्यों
जोर आजमाइश किये जाती हो
जाओ , जाओ सो जाओ
फिर उन्ही तबेलों में
जहाँ की आवाज़ नहीं तोडा करती नींदें
सत्ताधारियों की

वर्ना आता है उन्हें प्रयोग करना
कीटनाशकों का भी
और आता है साज के सुरों को बदलना भी
ये त्रासद समय की आग उगलती विभीषिका है
बच सको तो बच लो
आज बगावत भी देश समय और काल देखकर ही करनी चाहिए
विपरीत परिस्थितियों में उपेक्षा लाज़िमी है
क्योंकि
जानते हैं वो हुनर
बगावती हवाओं के रुखों को मोड़ने का भी


क्योकि
सूत्रवाक्य है ये उनकी सत्ता का
जिसका पालन हर ताजपोश करता है

" ..... के भौंकने से शहर खाली नहीं होते "
" राजा आगे आगे चलते हैं .... पीछे भौंका करते हैं "

किसी भी बगावत को कुचलने के लिए काफी है
सिर्फ एक शब्द या एक वाक्य
" कुत्ता "
अर्थ अपने आप अपना स्वरुप ग्रहण करने लगते हैं

शनिवार, 29 अगस्त 2015

मेरा कोई भाई नहीं ..............

नहीं जानती
कैसे उठती है उमंग इस रिश्ते के लिए
नहीं जानती
कैसे इस रिश्ते की ऊष्मा से लबरेज
बाँध लेते हैं सारा प्यार
मोली के एक तार से

नहीं जानती
सारी दुनिया को कर दरकिनार
इस एक दिन
कैसे दौड़ पड़ती हैं बहनें भाइयों के लिए
और भाई बहनों के लिए
होकर आतुर किसी बच्चा जनी गाय की तरह
होकर विह्वल

कह सकते हैं
खून के रिश्तों से बढ़कर होते हैं उधार के रिश्ते
जाने क्यों फिर भी
नहीं उमगी कोई उमंग इनके लिए
कौन विश्वास के दामन में
कब अविश्वास की कील ठोंक दे 
और मर्यादा की सीमारेखा लांघ दे ...नहीं पता
इसीलिए  
उधार के रिश्तों से कभी दामन भरा नहीं
बस विश्वास और अविश्वास के मध्य ही झूलती रही

कभी न गा सकी वो गीत किसी के लिए
' भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना '
या फिर
' चंदा रे मेरे भैया से कहना , बहना याद करे '
कैसा होता है ये राखी का बंधन ....... नहीं जानती
क्योंकि
मेरा कोई भाई नहीं ..............


( कुछ सत्य स्वीकारने से ही मुक्ति पाया करते हैं )

गुरुवार, 27 अगस्त 2015

स्यापा

छाती पीट पीट स्यापा करने के इस दौर में 
आओ , छाती पीट करें स्यापा हम भी 

यूं के नहीं हैं शामिल हम किसी 
मज़हब, धर्म या संगठन में 
न ही किसी गुट या दल में 
और जानते हैं ये सत्य 
फिर राजनीति हो या समाज 
देश हो या साहित्य 
सिवाय स्यापाइयों के 
और किसी को नहीं मिला करती तवज्जो की सहूलियतें 

शायद हुक्मरानों के कानों में 
पड़ जाएँ कर्णभेदी शहनाइयां 
और बच जाए एक मसीहा क़त्ल होने से 
वर्ना अपने समय की विडम्बनाओं को दोहते दोहते 
रीत जायेंगी जाने कितनी पीढियां 
नपुंसक से ओढ़े आवरण से खुद को मुक्त करने का समय है ये 

कि या तो बजाओ 
ढोल ताशे और नगाड़े 
कि जिंदा है अभी एक सलीब 
यहाँ दुधारी तलवार की तेजी से भी तेज 
कट जाया करते हैं मस्तक धड से 
नहीं तो 
स्यापा करने तक ही सीमित रहेगी तुम्हारी नपुंसकता 

यहाँ अपने अपने अर्थ 
और अपने अपने स्यापे हैं 
जुगाड़ के पेंचों पर जहाँ 
खड़ी की जाती है प्रसिद्धि की इमारत 
वहाँ दोष ढूँढने वालों पर ही 
भांजी जाती हैं अनचाही तलवारें 
छिन्नमस्तक की लाशों पर 
लगाए जाते हैं जहाँ कहकहे 
वहाँ प्रतिबद्धताएं वेश्या सी नोची खसोटी जाती हैं 
राजनीति के मर्मज्ञ जानते हैं 
क्षेत्र कोई हो  
कैसे जुगाड़ के साम्राज्य को किया जाए पोषित 
जो उनकी सत्ता रहे निर्विघ्न कायम 

स्यापों का क्या है 
वे पथ बाधक नहीं 
बल्कि उनकी प्रसिद्धि में 
चार चाँद लगाने का जुगाड़ भर हैं 
जहाँ सभी अपने हैं और सभी पराये 
मगर स्यापों में शामिल होना नियति है हमारी 

स्यापों में चाहे अनचाहे शामिल होने का रिवाज़ 
आज के वक्त की एक खुली तस्वीर है ... झाँक सको तो झाँक लो 






सोमवार, 24 अगस्त 2015

जानता है वो

अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता
नक्कारखाने में तूती की आवाज़ कोई नहीं सुनता
जानते हुए भी
वो चल दिया अकेला ही
सूरज से आँख मिलाने

ये जमा घटा गुणा भाग का समय नहीं है
क्योंकि
हर अमावास के बाद पूर्णिमा आती ही है ...........जानता है वो

शुक्रवार, 21 अगस्त 2015

हाँफते हुए लोग

ये हाँफते हुए लोगों का शहर है 
जो हाँफने लगते हैं अक्सर 
दूसरों के भागने / दौड़ने भर से 

उठा लेते हैं अक्सर परचम 
करने को सिद्ध खैरख्वाह 
भाषा संस्कृति और साहित्य का 
मगर 
जहाँ भी देखते हैं झुका हुआ पलड़ा 
झुक जाते हैं 

झुका दी जाती हैं बड़ी बड़ी सत्ताएं 
अक्सर अर्थ के बोझ तले
वाकिफ हैं इस तथ्य से 
इसलिए 
विरोध का स्वर साक्षी नहीं किसी क्रांति का 
जानते हैं ये ....

वास्तव में तो भीडतंत्र है ये 
प्रतिकार हो , विरोध या बहिह्कार 
स्लोगन भर हैं 
हथियार हैं इनके 
खुद को सर्वेसर्वा सिद्ध करने भर के 
असलियत में तो 
सभी तमाशाई हैं या जुगाडू 

ऊँट के करवट बदलने भर से 
बदल जाती हैं जिनकी सलवटें 
मिला लिए जाते हैं 
सिर से सिर , हाथ से हाथ 
और बात से बात 
वहाँ
मौकापरस्त नहीं किया करते 
मौकापरस्तों का विरोध , बहिष्कार या प्रतिकार

हाँफते रहो और चलते रहो 
बस यही है मूलमंत्र विकास की राह का 

रविवार, 16 अगस्त 2015

भाषा के विकल्प

न डोंगरी न तमिल न कन्नड़ 
न ही अरबी उर्दू या फारसी 
न हिंदी संस्कृत या रोमन 
कोई भी तो मेरी भाषा नहीं 

आती है मुझे सिर्फ एक भाषा 
जिसके साथ जन्मा था 
जिसके साथ स्वीकारा गया 
पुचकारा गया , लाड लड़ाया गया 
जी हाँ , वो है ममत्व की , अपनत्व की , प्रेमत्व की 

भला इससे भी बेहतर हो सकती है कोई भाषा 
अगर हाँ , तो पढ़ाना मुझे भी 
शायद इंसान बन सकूँ 
सुना है ......... तुम जानते हो इंसानियत की सबसे बेहतर कोई भाषा 

क्योंकि 
मैंने नहीं सीखे भाषा के विकल्प .......

शुक्रवार, 14 अगस्त 2015

मन के मौन आकाश पर

मेरे मन के मौन आकाश पर 
जरूरी तो नहीं टंगे मिलें तुम्हें 
हमेशा ही जगमगाते सितारे 

ये चाँद की बेअदबी नहीं तो क्या है भला 
जो ओढ़कर घूँघट छुपा लेता है चेहरा 
और 
सितारों के पक्ष सूने पथ पर 
करते हैं जब चहलकदमी 
नहीं की जातीं संस्तुतियाँ 

अमावस की कालरात्रियाँ फर्क करना नहीं जानतीं  
फिर मन का मौन हो 
या आकाश का पथ सूना ...

बुधवार, 5 अगस्त 2015

साहित्यिक विज्ञापन


आवश्यकता है एक अदद खास मित्र की जो सच में ख़ास हो यानी ख़ास में भी ख़ास हो यानि हमारे लिए वो ख़ास हो और उसके लिए हम .......बस वो और हम .......जिसमे निम्नांकित गुण होने आवश्यक हैं इनके बिना योग्यता प्रमाणित नहीं होगी :

सच्चे मित्र की दुर्लभ परिभाषा का बाकायदा नुमाइंदा हो 

जिसको अर्थ समझाए न जाएँ फिर भी समझ जाए यानि बिना कहे दिल दिमाग को पढ़ जाए 

सबसे जरूरी चीज वो उधर की बात तो इधर कह दे मगर इधर की उधर न कहे 

हमारी भृकुटी के हिलने पर हिलने लगे जिसका आसन ऐसा हो उसका आचरण 

हमारे गलत पर भी सही की मोहर लगा दे और फिर सारी दुनिया से मनवा दे 

हमारे लिए एक पूरा शहर बसा दे जहाँ हमारी चाहतों को मुकाम मिलता रहे यानि कि यानि कि यानि कि हमें महिमामंडित करता रहे , ऐसा वातावरण बना दे , ऐसी हमारी ख्याति में चार चाँद लगा दे कि सबकी नज़रों के चाँद हम ही बन जाएँ 

और सबसे अहम बात वो हमें पढ़े , सराहे , हम से इतर कोई दूजा कवि न उसे नज़र आये 

तब जाकर उसकी योग्यता प्रमाणित होगी और उसे ये सच्चे मित्र का दुर्लभ पद प्राप्त होगा और फिर हम उसे अपना महत्त्वपूर्ण कार्य सौंपेंगे जिसके लिए ये विज्ञापन दिया है :

.........और क्या यूँ ही थोड़े विज्ञापन दिया है , इतनी मगजमारी की है , जानते हो क्यों दिया विज्ञापन ? सिर्फ इसलिए ताकि कोई कह न सके ऊंचाइयों पर पहुँचने पर सभी अकेले हो जाते हैं और सच बात है मुझे किसी पर विश्वास नहीं , जाने कौन किस संगठन से जुड़ा हो और मेरी बात लीक कर दे , आजकल तो संगठनों का बोलबाला है , उन्ही की छाती पर पैर रख बनाए जाते हैं नौसिखिये भी महाकवि ........अरे भाई , रोज देखते हैं यही खेल . वैसे भी आजकल सच्चे मित्र कोई टैग लगाकर तो घूमा नहीं करते और हमें चाहिए एक सच में हमारी तरह सच्चा मित्र जो लट्टू की तरह घूम सके . 

आखिर हमारे भविष्य का सवाल है क्योंकि यहाँ तो मुखौटे लगाए घूम रहे हैं सब ..........यदि किसी को बता दिया कि फलानी जगह से कविता की किताब छपवानी है तो वो ही सबसे पहले जाकर वहां भांची मारेगा और सामने मुंह मियां मिट्ठू बना रहेगा ....... तो क्यों अँधा न्यौतें और दो बुलाएं ......... और सबसे मुश्किल बात होती है एक कवि के लिए खुद अपनी कवितायें सेलेक्ट करना , उसे तो हर कविता में मुक्तिबोध दिखाई देता है तो कहीं निराला तो कहीं महादेवी ऐसे में जरूरी है निष्पक्षता  की , तो उसके लिए जरूरी है कुछ साहसिक कदम उठायें तो साहेबान जिस में ये गुण होगा उसे ही हम अपनी कवितायें दिखायेंगे , पढवायेंगे और उनसे कहेंगे भैये छाँटो इनमे से वो कवितायें जो मुझे साहित्य के आकाश का सबसे चमकता सितारा बना दे तभी तो बन पाएगी एक मुकम्मल पाण्डुलिपि .

बस फिलहाल इतनी कवायद तो पाण्डुलिपि के लिए है ...... आगे काम के हिसाब से तय किया जाएगा कि आपको और मौका दिया जाये या नहीं .

तो जो उम्मीदवार इन योग्यताओं पर खरे उतरने की हिम्मत करते हों वो ही आवेदन करें ...... विचारार्थ का कोई प्रावधान नहीं है .........जो है बस फुल एंड फाइनल है ...........टाइम नहीं है मेरे पास !!!

रविवार, 2 अगस्त 2015

गर क्या हुआ

नहीं तैरती हैं मेरे पानी में जज़्बात की मछलियाँ 
जो ख्यालों के उलटने पुलटने से हो जाएँ घायल 

नहीं है मेरा पानी नीलवर्णी आकाश सा स्वच्छ 
जो तुम कर सको अपने अक्स से धूमिल 

नहीं हूँ मैं एक गूंजता हुआ अनहद नाद 
जिसकी गुंजार से हो उठो पुलकित आनंदित 

हर क्रिया प्रतिक्रिया से परे हूँ 
तभी तो 
हर प्रतिकार के बाद भी अस्तित्व में हूँ 
गर क्या हुआ 
जो मैं एक स्त्री हूँ ............

रविवार, 26 जुलाई 2015

' नया क्या ?'

वो कहते हैं 
नया क्या ?

अरे भाई 
नया दिन है 
हर पल नया है 
हर पल गुजरती ज़िन्दगी नयी है 

उस पर रोज 
तुम्हारी बातें नयी हैं 
तुम्हारे विचार नए हैं 
तुम्हारी सोच नयी है 
तुम्हारे चेहरे के भाव नए हैं 

उस पर भी प्रश्न 
नया क्या ?
सिर्फ नयी चीजें खरीदना 
नयी फिल्म देखना 
नए गाने सुनना 
नयी चीजें खाना ही नयेपन की श्रेणी में नहीं आता 

कभी देखना बाग़ में खिले फूलों को 
रोज़ नए ही लगेंगे 
रोज नयी ही बातें करेंगे 
रोज नयी ही खुशबू से सराबोर होंगे 

बच्चों की मुस्कान में 
उनकी बातों में 
उनके क्रियाकलाप में 
खोजोगे तो भी न मिलेंगे  
कोई पुरा अवशेष 

सिर्फ शब्दों का रोज घटजोड़ ही नया नहीं होता 
रंगों से खींची आड़ी टेढ़ी लकीरों से ही नया नहीं बनता 
प्रकृति की कूची नित्य नए अलंकार गढ़ती है 
जो मौसम के साथ बदलती है 

नया यहाँ सब है 
बस जरूरत है तुम्हें 
वो दृष्टि विकसित करने की 
जो आदिम युग में भी नयापन देख ले 
क्योंकि यहाँ तो 
हर सरकते पल में बदल जाती है सृष्टि 
आत्मा भी देह त्याग बदल लेती है नया चोला 
जब एक दिन पहले तुम जैसे थे 
वैसे न अगले दिन रहे 
तो फिर कैसे पूछते हो तुम .... ' नया क्या ?'

शुक्रवार, 24 जुलाई 2015

चाँद मेरे हिस्से का


आज मुझे गुनगुनाना है दुनिया का हर एक गाना , जीना है जी भर के , कल हो न हो ........कहाँ से आये कहाँ है जाना ये सत्य भला कौन है जाना तो क्यों न जी ली जाए एक दिन में एक उम्र कि शिकायत न हो फिर खुदा से भी कोई . 

अब इस पार और उस पार के फेर में कौन पड़े .........रात दोनों ही तरफ गहरी अंधियारी है और बीच में जो मिली है रौशनी की   चार लकीरें तो क्यों न इस रौशन जहान से मोहब्बत कर लें .........वर्ना किसने कब क्या पाया , कोई न भेद जान पाया ..........इस पार उस पार की खोज करता रहा और वर्तमान को खोता रहा ...........मूल मकसद से ही भटक गया ..........क्या होगा जानकर उधर क्या ? जो है यही है खुली आँखों से जो दिख रहा है , बंद होते ही तो सिर्फ अँधेरा ही अँधेरा है ये जानते हैं फिर भी अदृश्य की खोज में लगे हैं.... न भविष्य से और न भूत से निकल रहे हैं बस इसी भूलभुलैया में घूम रहे हैं ये जानते हुए कि इस चक्कर में वर्तमान को भी खो रहे हैं .........तो क्या रहा औचित्य फिर जीवन का जब खाली ही हाथ रहा .......... न आगत का पता मिला न विगत का और जीवन के मध्यांतर को खोज के प्रांगण में बिता दिया ...........जैसा आया था वैसा ही चल दिया कसकता हुआ , रोता हुआ ...........

नहीं , मुझे नहीं गंवाना अपना अमूल्य क्षण इस तरह .............गुनगुनाना है आज हर वो गीत जो बना है और जो नहीं बना .............शायद बन जाए मेरा जीवन ही संगीत , किसी के प्रेम का मीत , कोई सांझी रीत , एक झबरीली प्रीत .............और कह उठूँ मैं एक दिन ..............पंछी बनूँ उडती फिरूं मस्त गगन में आज मैं आजाद हूँ दुनिया के चमन में . 

सोमवार, 20 जुलाई 2015

इश्क के चटकारे, मेरा खोना .....एक रस्म है ये भी


ये मेरा खोना ही है 
जब खुद को भी ढूंढ न पाऊँ 
पलकों की ओट में छुप जाऊँ 
किसी बहेलिये के डर से 
डरी सहमी हिरणी सी सकुचाऊँ 

ये मेरा खोना ही है 
जब आदमखोर बन जाए मनवा 
भरी थाली को लात मारे जियरा 
किसी सजन की पीहू पीहू पर भी 
न उमगे ये निगोड़ा मन भंवरा 

ये मेरा खोना ही है 
निष्क्रिय निस्पंद हो ठहर जाऊँ 
किसी मोड़ पर न मुड़ पाऊँ 
आगे पीछे आजू बाजू चलती रेल से 
खुद को न उतार पाऊँ 
मन की भीड़ में ही कहीं गुम हो जाऊँ 

ये मेरा खोना ही है 
जब तुम हो सामने 
और मैं मौन हो जाऊँ 
प्रेम के अवलंब लम्बवत पड़े रह जाएँ 
और मैं शोकमुक्त हो जाऊँ 

ये मेरा खोना ही है 
श्वेत श्याम से परे 
एक शीशमहल बनवाऊँ 
उसमे खुद को चिनवाऊँ
और आखिरी ईंट तुमसे लगवाऊँ 

ये मेरा खोना ही है 
जब भी खुद से मिलना चाहूँ 
तुम से मिल जाऊँ 
किसी उधडी सींवन सी 
किसी कांटे से उलझ जाऊँ 
और बूँद बूँद रिस  जाऊँ 

भरी बरसातों के अहातों में पानी भरने पर नहीं चला करतीं कुँवारी कश्तियाँ 
क्यूंकि 
अस्थि कलशों की स्थापना को उच्चरित नहीं किये जाते वेद मन्त्र 
और तुम जानते हो 
यहाँ सह्स्त्राब्धियों की मोहब्बतों ने बीजे हैं आखिरी प्रपत्र 
बिना बीजमंत्रों के 
फिर भोर के तारे से करके इश्क 
कैसे कर दोगे तवारीख में दर्ज 
विधना के विधान को उलट कर 
मान भी लो अब ...........ये मेरा खोना ही है 

और खोये हुए दस्तावेज सिद्ध नहीं किये जा सकते और न ही ताबीज में पहन कैद किये जा सकते हैं 

एक बूंद अश्क की ढलके जिस दिन .......मान लेना ये मेरा खोना ही है 

बन्दनवार लगाने से 
दहलीजों पर नहीं रुका करतीं 
इश्क की मिश्रियाँ 
इश्क के चटकारे लगाना खोने का ही पर्याय  है .......... 

एक रस्म है ये भी  .......निभानी तो पड़ेगी ही न !!!



बुधवार, 15 जुलाई 2015

किसी भी प्रकाशन , प्रकाशक के लिए क्या जरूरी है ?

रश्मि प्रभा दी द्वारा आयोजित परिचर्चा " #किसी _भी_प्रकाशन_प्रकाशक_के_लिए_क्या-जरूरी_है ?" में मेरे विचार इस आलेख में पढ़ सकते हैं :


आज के दौर में जब चारों तरफ लेखकों और प्रकाशनों की बाढ़ सी आ रही हो उसमे ये प्रश्न उठाना भी लाजिमी है कि किसी भी प्रकाशन और प्रकाशक के लिए क्या जरूरी है अर्थात कौन सा पहलू ऐसा है जो सबसे जरूरी है तो इस सन्दर्भ में केवल एक मोड़ पर रुके रहना संभव ही नहीं है . आज गलाकाट प्रतियोगिता के दौर में सबसे पहले तो अपनी एक पहचान बनाना जरूरी है और पहचान बनाने के लिए कुछ नियम कायदे बनाने जरूरी हैं जिनका सख्ती से पालन किया जाए .

एक प्रकाशक के लिए जरूरी है सबसे पहले वो उस लेखक को ढूंढें या उस लेखन को पकडे जिसमे उसे लगे हाँ , इसमें है समाज को बदलने की कूवत और साथ ही बन सकेगा हर आँख का तारा अर्थात जो सहज संप्रेषणीय होने के साथ सर्वग्राह्य हो न कि चलता नाम देखकर उसे ही छापे जाए बल्कि थोडा जोखिम उठाने की भी हिम्मत रख सके . आज बड़े बड़े प्रकाशन ऐसे ही बड़े नहीं बने उन्होंने भी अपने वक्त पर जोखिम उठाये नयों में से ऐसे मोती ढूंढें जो साहित्य का आकाश पर अपना परचम लहरा सकें और वो उसमे सफल भी हुए तो क्यों नहीं आज का प्रकाशक ये जोखिम उठाये और अपनी राह खुद बुने .

दूसरी जरूरी बात है सिर्फ पैसे के पीछे न भागे जैसा कि आजकल हो रहा है पैसे लो और जिस किसी को भी छाप दो फिर चाहे लेखक कहीं न पहुँच अपनी जेब तो गरम हो ही गयी न तो उससे प्रकाशक की साख पर ही बट्टा लगेगा तो जरूरी है पहले पाण्डुलिपि मंगवाई जाए , कुछ सिद्धहस्तों से पढवाई जाए और फिर लगे ये छापने योग्य है तो जरूर छापी जाए और लेखक से कीमत न लेकर उसके लेखन का प्रचार और प्रसार प्रकाशक करे ताकि वो जन जन तक पहुँच सके . आज तो वैसे भी इन्टरनेट के माध्यम से कहीं भी किताब पहुंचाई जा सकती है तो जरूरत है तो सिर्फ प्रचार और प्रसार की फिर तो पाठक खुद ही मंगवाने का जुगाड़ कर लेगा मगर उसे पता तो चले कि आखिर उस किताब को वो क्यों पढ़े ? प्रचार प्रसार ऐसा हो जो पाठक के मन को झकझोरे और वो उसे पढने को लालायित हो उठे तो प्रकाशन को स्वयमेव फायदा होगा . जितनी प्रतियाँ बिकेंगी प्रकाशक को ही मुनाफा होगा .

एक जरूरी चीज और है लेखक और प्रकाशक में आईने की तरफ साफ़ रिश्ता हो जो कि आज कहीं नहीं दिखता बल्कि लेखक प्रकाशक पर और प्रकाशक लेखक पर दोषारोपण करते रहते हैं जो रिश्ते को कटु बनाते हैं क्योंकि पारदर्शिता नहीं होती तो लेखक को पता नहीं चलता कितनी प्रतियाँ बिक गयी हैं और उस हिसाब से कितनी रॉयल्टी बनी . रॉयल्टी मिलना तो आज दूर की ही बात हो चुकी है बल्कि प्रकाशक यही रोते हैं कि बिकी ही नहीं तो आखिर कहाँ गयीं ? जबकि सरकारी खजाने में भी किताबें पहुंचाई जाति हैं जो लेखक भी जानता है मगर उसके पास कोई सबूत नहीं होता तो कुछ साबित नहीं कर सकता ऐसे में दोनों के बीच गलतफहमियां पैदा हो जाती हैं जिनका सुखद भविष्य नहीं होता बल्कि जरूरी है एक ऐसा अग्रीमेंट जिसके तहत दोनों बंधे हों .

एक सच ये भी है कि कोई भी प्रकाशन बिना पैसों और धर्म हेतु नहीं चलाया जाता बल्कि प्रकाशक तभी काम करना चाहेगा जब उससे उसे कुछ लाभ हो तो इसके लिए जरूरी है आज के वक्त में तकनीक का सहारा लेना और उसके माध्यम से लेखकों और पाठकों से जुड़ना . पाठकों की समय समय पर राय लेना आखिर वो पढना क्या चाहते हैं अर्थात किस तरह का लेखन पाठक की पहली पसंद है ऐसी रायशुमारी समय समय पर की जाती रहे तो कोई ताकत नहीं जो प्रकाशक कभी घाटा उठाये बल्कि जब पाठक को उसके मतलब की सामग्री मिलेगी तो वो और कहीं नहीं भागेगा और लेखक भी ऐसे ही प्रकाशक की ओर आकर्षित होगा जो उसे पहचान दिलाये न कि उसका शोषण करे . इस तरह के प्रयोगों से दीर्घकाल में प्रकाशन को लाभ ही लाभ होगा मगर उसके लिए जरूरी है समझौता न करके सच्चाई और ईमानदारी से अपने प्रकाशन को आगे बढाए और अपनी एक मुकम्मल पहचान बनाए .

एक आखिरी बात और प्रकाशक को चाहिए प्रचार प्रसार के अलावा बड़े बड़े आलोचकों तक किताब पहुंचाए , उनकी समीक्षाएं करवाए फिर वो अच्छी हों या बुरी उससे प्रकाशक का कोई सरोकार नहीं होना चाहिए क्योंकि यही सही और मुकम्मल तस्वीर होगी आंकने की ताकि उसी हिसाब से आगे निर्णय वो ले सके . केवल साहित्यकारों की निगाह में स्थान पाने के लिए जो लेखन किया जाता है वो आम पाठक की समझ से परे होता है इसलिए जरूरी है आम पाठक की सोच को आधार बनाकर लेखक और उसके लेखन को तवज्जो दी जाए और सही व् उचित मूल्यांकन करवाया जाए तो निसंदेह लेखक के साथ प्रकाशक और प्रकाशन दोनों अपना मुकाम पा लेंगे क्योंकि वहां मूल्यों से समझौता नहीं होगा और जब ये बात बाज़ार में होगी तो हर लेखक जुड़ने में गौरव महसूस करेगा साथ ही चाहेगा कि वो ऐसा लिखे तो उसी प्रकाशन से छपे .

लेखक और प्रकाशक का मजबूत रिश्ता किसी भी प्रकाशन की सफलता का एक आधार स्तम्भ होता है जिसे हर प्रकाशक के लिए समझना जरूरी है .

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