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गुरुवार, 26 नवंबर 2015

दुष्कर उपालंभ

जब चुक जाएँ संवेदनाएं
रुक जाएँ आहटें
और अपना ही पतन जब स्वयमेव होते देखने लगो
मान लेना
निपट चुके हो तुम

गिरजों के घंटे हों
मंदिरों की घंटियाँ
या मस्जिद की अजान
सुप्त पड़ी नाड़ियों में नहीं किया करतीं
चेतना का संचार

ये घोर निराशा का वक्त है
चुप्पियों ने असमय की है आपातकाल की घोषणा
और उम्र कर रही है गुरेज
मन के बीहड़ों से गुजरने में

ऐसे में
मन बहुत थका थका है
इस थके थके से मन पर
कौन सा फाहा रखूँ
जो सुर्खरू हो जाए उम्र मेरी
क्योंकि
जुगाली करने को जरूरी होता है दाना पानी

'आशावाद' आज के समय का सबसे दुष्कर उपालंभ है ...

शनिवार, 21 नवंबर 2015

मैंने हदों से कहा

1
मैंने हदों से कहा
मत चिंघाडो
कि लांघने को मेरे पास दहलीज ही नहीं 


पत्थरों के शहर में
पत्थरों के आइनों में
पत्थर सी हकीकतें ही तो नज़र आएँगी 


ये मेरी
बेअदबी मोहब्बत का जूनून नहीं
जो सिर चढ़कर बोले ही 


कि आज
शहर में झंझावात आया है
और डूबने को मैं कहीं बची ही नहीं 


और दिल है कि गुलफाम हो रहा है .........


2
तेरी यादों से बात करूँ कि तुझे याद करूँ
दिल की बेचैनियों को कैसे आत्मसात करूँ




चुप्पी को घोंटकर पी गयी
ज़िन्दगी कब का लील गयी




मंगलवार, 17 नवंबर 2015

शब्द भर ही

मोहब्बत के
वृहद् और विस्तृत अर्थों में से
कौन सा अर्थ चुनूँ अपने लिए
जो किसी एक में समा जाए सारी कायनात की मोहब्बत

वैसे सुना है
मोहब्बत सोच समझ कर नहीं की जाती
मगर मुझे तो आदत है
हर लकीर को आड़ा काटने की
तो
मोहब्बत मेरे दिमाग का फितूर ही सही
चलो इस बार फितूर को ही आजमा लूं

दिल तो वैसे भी बंदगी का दीवाना है
और मेरे पास
न प्रेमी है न कृष्ण

और शायद इसीलिए
मेरे निरामय निपट अंधेरों में
मोहब्बत का
सिर्फ शब्द भर ही अस्तित्व रहा...

शुक्रवार, 13 नवंबर 2015

शून्य निरर्थक नहीं .......

शून्य पर खड़ा होता है जब एक कवि
आउट होने के डर से परे
खींचने लगता है एक हाशिया
उस तरफ की जमात के लिए

यूँ बेसबब नहीं है शून्य भी
जानता है वो शून्य का महत्त्व

बस तमाम वर्जनाओं से अवगुंठित हो
बनाने लगता है एक गुंथी हुई माला
ताकि सनद रहे
इस तरफ और उस तरफ के मध्य
खिंची खाइयों में भी
बचे होते हैं कविता के अवशेष

और अमर होने के लिए काफी है अवशेषों का होना ही
क्योंकि
शून्य निरर्थक नहीं .......

गुरुवार, 5 नवंबर 2015

ये हैं अच्छे दिन

ये है सुशासन
तुम्हें पता नहीं
ये हैं अच्छे दिन
ये है विकास का मूल मन्त्र

घर बाहर
गाँव नगर
चुप रहना है तुम्हारी नियति
सिर्फ सिर झुकाने की अदा तक ही
तुम्हारी कर्मस्थली
गर बोलोगे
घर से बाहर कदम रखोगे
मिलोगे एक दूसरे से
हम तालिबानी बन जायेंगे
तुम चीखते रहना
कहीं न सुनवाई होगी
न्याय की दहलीज पर ही
तुम्हारी हजामत होगी

चुप हो जाओ नहीं तो करवा दिए जाओगे
धर्म के नाम पर चिनवा दिए जाओगे
कब चुपके से हालाक कर दिए जाओगे
पता भी न चलेगा
फिर चाहे कलबुर्गी हों या पानसरे या आम आदमी .........

कुछ भी कहने और करने की आज़ादी
सिर्फ उन्हें और उनके गुर्गों को है ......तुम्हें नहीं 
क्या इतना सा तथ्य भी नहीं जानते
देश में अराजकता हो या धार्मिक उन्मादी माहौल
यही तो है हमारी पहली पहल
किसी भी कीमत पर खुद को साबित कर दें
और दुनिया हमें सबसे ताकतवर इंसान की श्रेणी में स्थान दे दे ..............

मुफ्त में कुछ नहीं मिला करता
इसलिए प्यारों
सुशासन और अच्छे दिन की कुछ तो कीमत तुम भी चुकाओ
उनके दिखाया चश्मा ही लगाओ 
तभी सहज जीवन जी पाओगे  
फिर सिर झुकाए सिर्फ यही चिल्लाओगे
ये हैं अच्छे दिन 
ये हैं अच्छे दिन 
ये हैं अच्छे दिन 


सोमवार, 2 नवंबर 2015

जब तक सत्ता निरंकुश है .......

आश्वस्त हूँ
अपने मानवाधिकार से
और मुझसे परे भी
क्या जरूरत होती है
किसी को किसी और अधिकार की .......जरा सोचिये !!!

मानवाधिकार
मेरा कवच
मेरी सुरक्षा का बीजमंत्र
तो क्या हुआ
कल कर दूं मैं तुम्हारे ही अधिकारों का हनन
ये है मेरा विकल्प .......

मानवाधिकार
एक शब्द भर
और शब्दों का अक्सर हो ही जाता है बलात्कार
तो क्या हुआ
जो इसकी आड़ में
हो जाए सम्पूर्ण सभ्यता बलात्कृत
ये है आज का सच

तब से सोच में हूँ
मानवाधिकार
ओढ़ा हुआ शब्द है
या बिछाया हुआ बिछौना
जो
बच्चे के गीले करने भर से हो जाता है निष्कासित
या फिर
किसी कुँवारी लड़की के सिर से
चुनरी ढलकने भर से
हो जाता है अपमानित
या फिर मैं हूँ
अपने ही हाथों अपना खून बेचता दलाल

न न , आम आदमी हूँ मैं
जिसके कोई नहीं होते मानवाधिकार
कम से कम तब तक
जब तक सत्ता निरंकुश है .......