पृष्ठ

शनिवार, 28 अप्रैल 2012

आओ ....... सिलवटो को बुहारें


आओ 
सिलवटो को बुहारें यादों की झाड़ू से
शायद अक्स में वक्त नज़र आये 
जो छुप गया है सर्द अँधेरे में
उस अक्स की कुछ गर्द उतारें

ये रोशनियों के आँचल में
ठिठकती तस्वीरें
चलो इक बार फिर से
इनके रंग में रंग भरें  


वो शम्मा के पिघलने पर
पड़ते निशानों पर
कुछ वक्त की और कुछ अपनी
आओ इक उम्र गढ़ें 


जो ठहर गयी थी 
किसी नज़र में
उस नमी को
उस बेकसी को
उस रुकी सी ज़िन्दगी को
चलो इक बार फिर से
कश्ती में सवार करें 
आओ चलो हम दोनों 
फिर से कोई एक
नयी तस्वीर गढ़ें 

मंगलवार, 24 अप्रैल 2012

अपनी कमली बना लो ना मुझे भी




जरूर राधा ने मोहिनी डारी है 
तभी छवि तुम्हारी इतनी मतवाली है 
जो भी देखे मधुर छवि 
अपना आप भुलाता है 
ये राधे की महिमा न्यारी है 
जो तुम पर पडती भारी है 
तुम सुध बुध अपनी बिसरा देते हो 
जब राधा नैनन मे उलझते हो 
जैसी दशा तुम्हारी है मोहन 
बस वैसी ही दशा हमारी है 
घायल की गति घायल जाने 
अब तो समझो गिरधारी 
मै हूँ तुम्हारी जोगनिया न्यारी
उस अनुपम छवि की प्यासी हूँ 
जो राधे नैनन मे बसता है 
राधा का मन हरता है 
चितचोर नाम कहाता है 
छछिया भर छाछ पर रीझ जाता है 
इक बार झलक दिखाओ सांवरिया
अपने चरण लगाओ सांवरिया 
अश्रुबिंदु अर्पण करती हूँ 
भावों से खुद का तर्पण करती हूँ
बस पिया दरस की प्यासी हूँ ...........मोहन 
इक बार गले लगाओ सांवरिया
मेरी तपन मिटाओ सांवरिया 

चाहे चरण दरस ही दिखाओ सांवरिया
बस इक बार तुम आ जाओ सांवरिया 
वो ही मोहिनी मूरत दिखाओ सांवरिया
जिसमे राधा रूप झलकता है 
प्रेम वहीँ परिपूर्ण होता है 
बस इक बूँद तो पिला दो सांवरिया 
जीवन सफल बना दो सांवरिया
जीवन रास महारास बन जाये 
जो तुम्हारा दर्शन हो जाये 
हे मोहन ........अपनी कमली बना लो ना मुझे भी .......आह !!!!




रविवार, 22 अप्रैल 2012

ना तलाश मुकम्मल हुई और ना ही "मैं" ..........

सुनो 
बदल दो मुझमे
मेरा सब कुछ 
हाँ ...........सब कुछ
कहा था एक दिन तुमसे
और देखो तो ज़रा
मुझमे "मैं" कहीं बची ही नहीं 

तेरी तमन्ना 
तेरी चाहत
तेरी आरजू 
बस यही सब तो 
ज़िन्दगी बन गयी 
मगर कोई तलाश थी बाकी
जो अब भी अधूरी रही 

अलाव का सुलगना
गर्म तवे पर बूँद का वाष्पित होना
और चिनारों के साए में भी 
धूप की तपिश से जल जाना 
बस अब और क्या बचा ?

ना तलाश मुकम्मल हुई और ना ही "मैं" ..........
बदलाव की प्रक्रिया में सुलगते अंगारों की पपड़ी आज भी होठों पर जमी है .......... दो बूँद अमृत की तलाश में 

शुक्रवार, 20 अप्रैल 2012

आखिर अग्निगंधा भी तलाशती है कुछ फूल छाँव के

धूप भी साये की आकांक्षी हो गयी
आखिर कब तक अपना ही ताप सहे कोई
यूँ ही नहीं देवदार बना करते हैं
यूँ ही नहीं छाया दिया करते हैं
उम्र की बेहिसाब सीढियों पर
अनंत से अनंत के सफ़र तक
आखिर ताप भी सुलगता होगा 
अपनी तपिश से .............
उसे भी तो जरूरत पड़ती होगी
कोई आये और सहला दे 
उसके तपते रेगिस्तान को
ड़ाल दे दो बूँद नेह की 
और सारी तपिश भाप बन कर उड़ जाए
यूँ ही नहीं धूप ने साए के आगोश में पनाह ली होगी
आखिर अग्निगंधा भी तलाशती है कुछ फूल छाँव के 

मंगलवार, 17 अप्रैल 2012

फिर कैसे पीड़ा को मूर्त रूप दे पाऊँ ?

जाने कौन सी
वो पीड़ा है
जो दर्द बनकर
लफ़्ज़ों में
उतर आती है
मगर मुझसे
ना मिल पाती है
जब जब अंतस में
कुलबुलाती है
दर्द का दरिया बन
बह जाती है
मगर मुझसे ना 

रु-ब-रु हो पाती है
पीड़ा का स्वरुप 

ना जाना कभी
उसका मर्म स्थान
भी ना पाया कभी
ना कभी सींचा ही
अश्रु बिंदु से
मगर फिर भी
खेत में पड़े बीज
अंकुरित हो ही जाते हैं
फसल लहलहा जाती है
मगर पीड़ा का बीज 

ना खोज पाती  है
कौन सा दर्द 

सैलाब लाता  है
कौन सा पत्थर
दर्द जगाता है
जो मील का
बन जाता है
ना जान पाती है
मगर पीड़ा फिर भी
जाग जाती है
लफ़्ज़ों के माध्यम से
पन्नो को भिगो जाती है
मगर मुझसे
तब भी ना
मिल पाती है
पीड़ा का दर्शन 

ना हो पाता है
पीड़ा का ना जाने
ये  कैसा मुझसे नाता है
मुझमे ही समाती है
और  मुझे ही
ना समझ आती है
फिर हल कहाँ से पाऊँ
निराकार में व्याप्ति है
साकार ना हो पाती है

फिर कैसे पीड़ा को मूर्त रूप दे पाऊँ?

शनिवार, 14 अप्रैल 2012

ये तो अपना परिचय आप हैं………"क्षितिज़ा " एक आगाज़

अंजू चौधरी का प्रथम काव्य संग्रह 
"क्षितिजा "


अंजू चौधरी जी किसी परिचय की मोहताज़ नहीं हैं उनका परिचय मैं क्या करवाऊं बस उनकी उड़ान को नमन करती हूँ और उनके संग्रह के बारे में मेरे जो विचार हैं एक पाठक की दृष्टि से वो प्रस्तुत करती हूँ . उस दिन पुस्तक मेले में विमोचन के वक्त भी हम उनके साथ थे जो अद्भुत क्षण थे उन्होंने उसमे हमें सप्रेम आमंत्रित किया ये हमारे लिए गौरव की बात है कि हमें इस लायक समझा और इतना मान दिया .

अंजू चौधरी जी ने अपना काव्य संग्रह बहुत प्रेम से भिजवाया है ........."क्षितिजा "..........नारी मन के एक- एक बंध को खोलती है उनकी क्षितिजा ..........हर कविता यूँ तो बेजोड़ है ज़िन्दगी की छोटी - छोटी बातों को कविता में पिरोकर नारी मन की परतें उधेड़ना और फिर उन पर रफू करना भी उन्हें आता है . कभी प्रेम से लबरेज चाहतें दरवाज़ा खटखटाती हैं तो कभी फूटपाथ की ज़िन्दगी तो कभी गरीब की बेबसी भी उन्हें उसी तरह आंदोलित करती है कहीं रिश्तों की टीस है तो कहीं सावन की फुहारें भिगोती हैं तो कहीं इंतजार की कीलें चुभती हैं तो कहीं अरमानों के पंख लगा रात की तनहाइयाँ खुद-ब-खुद रोती हैं तो कभी शब्द और उनके अर्थ उन्हें झंझोड़ते हैं तो कभी एक गहन अन्धकार में खुद को खो देती हैं . दूसरी तरफ  एक माँ के ह्रदय का मंथन भी बखूबी करती हैं और उसके हालात का चित्रण वो ही कर सकता है जिसने उसे महसूस किया हो .

पूरा काव्य संग्रह अनुपम कविताओं का संग्रह है उनमे से कुछ कविताओं के बारे में अपने विचार प्रस्तुत कर रही हूँ जो पढने के बाद मैंने महसूस किये 

"श्रापित गरीब की ज़िन्दगी" कविता में जिस संजीदगी से एक गरीब के जीवन को छुआ है वो काबिल -ए -तारीफ है और साथ ही अंतिम पंक्तियों में करोड़ों भारतीयों की ज़िन्दगी को भी परिभाषित कर दिया .

तो दूसरी तरफ "गरीब" कविता आत्मा को झिंझोड़ने को मजबूर करती है कि कैसे एक पैसे वाला एक गरीब से भी गरीब हो जाता है उस वक्त जब उसके पसीने का पैसा देने में भी आनाकानी करता है उस वक्त वो गरीब उस पैसे वाले से कितना अमीर होता है या कहिये वो सच में शहंशाह  होता है उस वक्त जब पैसे वाले की आनाकानी को भी मुस्कुरा कर बर्दाश्त कर लेता है .

"हुस्न-ए-यार" कविता प्रेम और खुदाई प्रेम के बीच का दर्पण है जहाँ मोहब्बत खुदा से भी ऊंचा उठ जाती है और अपनी मोहब्बत के सजदे में झुक जाती है शायद वो ही तो असली मोहब्बत होती है .........बहुत संजीदगी से चंद लफ़्ज़ों में मोहब्बत को बयां कर डाला है .

उसकी आँखों की मौन स्वीकृति ने
मुझे उस खुदा का मुजरिम बना डाला
क्योंकि उसकी इबादत से पहले 
मैंने सजदा अपने प्यार का 
अपने हुस्न-ए-यार का कर डाला 

"मैं" कविता एक अलग ही रूप रंग लिए है जो पढो तो अलग अनुभूति और आखिर में पढ़ते- पढ़ते जब कवयित्री के भाव से जुडो तो अलग अनुभूति देती है और उस सोच को सलाम करती है जो वास्तव में एक जहान से दूसरे जहान तक का सफ़र करवा देती है और इसका आनंद तो खुद पढने पर ही आता है .



"हे! गौतम बुद्ध " कविता में कवयित्री ने कविता के माध्यम से गौतम बुद्ध को सांसारिक जीवन का महत्त्व बतलाया है साथ ही एक सन्देश भी दिया है कि संसार से भाग कर ही प्रभु को या खुद को नहीं पाया जा सकता बल्कि संसार में रहकर और कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए भी स्वयं को पाया जा सकता है क्योंकि मानव जीवन एक बार मिला है तो क्यों ना उसे पूरी तरह जीया जाये उसके हर रंग से जीवन रँगा जाये और अपने स्वरुप को भी ना भुलाया जाये



"२१ वीं सदी के रिश्ते" कविता के माध्यम से आज के मैटलिक रिश्तों को प्रस्तुत किया है और साथ ही रिश्तों का महत्त्व दर्शाया है , एक संयुक्त परिवार की गरिमा और उसकी महत्ता को प्रतिपादित किया है जिस पर आज कोई ध्यान भी नहीं देता 

आज के मशीनी युग में
समय कुछ ज्यादा ही
महंगा हो गया है
आप सब अब
अवकाश निकालो

 इन पक्तियों से आवाहन करती कवयित्री अंतिम पक्तियों में मन की पीड़ा और समाज का सच दर्शाती हैं

आज दौलत से एक
अटूट रिश्ता जुड़ गया है
फिर भी मैं
ये ही कहूँगी की
ढूँढ सकते हो तो ढूँढ लाओ
वो स्वयं के रिश्ते
जो खो गए हैं
इस दुनिया के चलन में
वो पक्के धागों से रिश्ते
वो रिश्तों की सच्ची मिठास
वो प्यार वो बँधन
वो हर चेहरे पर मुस्कान
वो हँसी ठिठोली का वातावरण
वो अपनों पर विश्वास
जो मिलता था सबको
एक संयुक्त परिवार में


तो दूसरी तरफ "भविष्य की रिहर्सल " कविता में रिअलिटी शो की कडवी किन्तु सत्य सच्चाइयाँ प्रस्तुत की हैं .


और एक तरफ एक जवान बेटी की माँ की चिंता को "मैं कैसे सो जाऊँ" कविता के माध्यम से प्रस्तुत किया है कि आज समाज ना जाने किस दिशा में जा रहा है कि पढ़ी लिखी , आत्मविश्वासी स्वावलंबी लड़की के लिए भी वर वो भी बिना दहेज़ के मिलना कितना मुश्किल हो गया है जिसकी चिंता में हर माँ शायद सो नहीं पाती होगी .


कवयित्री ने इस संकलन में ज़िन्दगी के सभी रंग भरे फिर चाहे वो प्रेम से परिपूर्ण हों या सामाजिक विद्रूपता हो या बचपन की निश्छलता हो . समाज और ज़िन्दगी के रंगों से सराबोर संग्रह बेशक पढने योग्य है जिसमे नारी मन का पुरुष द्वारा छलने पर भी उसे स्वीकारना तो कभी उससे आहत होना दर्शाता है नारी मन की पीड़ा का दिग्दर्शन भी उनकी कविताओं से होता है . आस पास के जीवन से ग्रहण करती संवेदनाओं को कविता के माध्यम से मुखरित करने में कवयित्री सक्षम रही हैं और यही उनके लेखन का मूल स्त्रोत भी है जो उन्हें लिखने को प्रेरित करता है . 

वो इसी प्रकार निरंतर लिखती रहें और नव सृजन करती रहें इन्ही शुभकामनाओं के साथ मैं उन्हें बधाइयाँ देती हूँ .



हिंद युग्म प्रकाशन से प्रकाशित ये संग्रह वहाँ से मंगवाया जा सकता है जिसका नंबर है 
M: 9873734046
M: 9968755908
sampadak @hindyugm.com


गुरुवार, 12 अप्रैल 2012

अब आचमन को गंगा कहाँ से लाऊँ?

पानी ठहर गया है
शायद बहना भूल गया है
तभी तो अब इसमें
हिलोरें नही उठतीं
कहीं काई तो नही जम गयी
अब आचमन को गंगा कहाँ से लाऊँ?

गुरुवार, 5 अप्रैल 2012

स्त्री विषयक कवितायेँ लिखना ही शोध का विषय तो नहीं हो सकता ना

जब भी मन आहत हुआ
कभी देखकर 
तो कभी सुनकर 
स्त्री की दुर्दशा पर 
भावों को 
कविता में गूंथ दिया
और कर लिया मुक्त
कुछ क्षण के लिए
क्षणिक आवेगों से 
मगर कभी ना किया
कुछ भी स्त्री के 
स्वाभिमान के  लिए
नहीं सोचा 
कैसे उसे उसकी
दुर्दशा से निजात दिलाऊँ
कैसे उसके ज़ख्मों पर
मरहम का फाया लगाऊँ
कौन सा ताबीज गढ़वाऊँ
जिसे पहन 
उसे खुद के लिए भी
जीना आ जाये
कौन सा ग्रह शांत कराऊँ
कौन सा हवन अनुष्ठान कराऊँ
कि स्त्री को स्त्री का 
रूप वापस मिल जाये
वो सिर्फ एक
शो केस में रखी
गुडिया से आगे
साँस लेती 
ज़िन्दगी को जीती
आसमाओं को छूती
एक इबारत बने
कुछ नहीं कर पायी ऐसा
जो समय की शिला पर
अंकित हो सके
नहीं लिख पाई ऐसा
जो स्वर्णाक्षरों में समेटा जा सके
फिर कैसे कह दूं
स्त्री विषयक कविताओं में
मैंने स्त्री से न्याय किया
सिर्फ स्त्री होना या
स्त्री विषयक कवितायेँ  लिखना ही
शोध का विषय तो नहीं हो सकता ना 
सिर्फ दर्द को महसूसना
और कविताओं में उतारना
ही तो स्त्री का संपूर्ण व्यक्तित्व नहीं
दर्द और भावों को 
शब्दों के अलंकरण से
सुसज्जित करना
सिर्फ साहित्य सृजन हो सकता है
या वाहवाही समेटने का एक पुल
मगर जब तक ना 
स्त्री में खोज कर उसका 
ना स्वर्णिम दिया
तब तक 
स्त्री विषयक कवितायेँ लिखना
महज स्वयं को भ्रमित करने का कोरा आश्वासन हुआ ..........