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सोमवार, 29 नवंबर 2010

मेरे सपनो का शहर

अनंत यात्राओं की 
अंतहीन पगडंडियों
पर चलते चलते 
जब कभी थक जाती हूँ 
तब कुछ पल 
जीना चाहती हूँ
सिर्फ तुम्हारे साथ
तुम्हारी आशाओं 
अपेक्षाओं और 
अपनी चाहतों के साथ
जहाँ मेरी हर चाहत
परवान चढ़ सके 
और तुम्हारे वजूद का
हिस्सा बन सके 
जहाँ तुम्हारे ह्रदय के
हर गली कूचे पर
सिर्फ मेरा नाम लिखा हो 
हर मोड़ पर 
मेरा बुत खड़ा हो
जिसके हर घर में 
तुम्हारी मुस्कराहट 
तैर रही हो और 
मेरे पाँव थिरक रहे हों 
तुम्हारी प्रेममयी झंकार पर
जहाँ एक ऐसा आशियाना हो 
जिसमे सिर्फ तुम्हारा 
और मेरा वजूद
अपना वजूद पा रहा हो 
और कभी हम किसी 
भीड़ के रेले में 
चुपचाप हाथों में हाथ डाले
चल  रहे हों और
इक दूजे की धडकनें
सुन रहे हों
बस कुछ पल 
इसी सुकून के 
जीना चाहती हूँ
जिसे तुमने 
मेरा नाम दिया है
और मेरे अस्तित्व का
प्रमाण दिया है
उसी अपने घर में 
रहना चाहती हूँ
जानते हो ना 
कौन सी है वो जगह
 वो है तुम्हारा ह्रदय
मेरे सपनो का शहर

शनिवार, 27 नवंबर 2010

आँच

मद्धम- मद्धम 
सुलगती आँच 
और सीली 
लकड़ियाँ 
चटकेंगी तो
आवाज़ तो 
होगी ही
लकड़ियों का 
आँच की
तपिश से 
एकीकृत होना
और अपना 
स्वरुप खो देना
आँच की 
सार्थकता 
का प्रमाण 
बन जाना
हाँ , आँच
का होना
जीवंत बनाता 
है उसे 
सार्थकता का
अहसास 
कराता है 
आँच पर 
तपकर ही 
कुंदन खरा 
उतरता है
फिर चाहे 
ज़िन्दगी हो 
या रिश्ते 
 या अहसास
आँच का होना
उसमे तपना ही
जीवन का
सार्थक प्रमाण
होता है
लकड़ियाँ
सुलगती 
रहनी चाहिए
फिर चाहे 
ज़िन्दगी की 
हों या 
दोस्ती की 
या रिश्ते की
मद्धम आँच
का होना 
जरूरी है
पकने के लिए
सार्थकता के लिए
अस्तित्व बोध के लिए

मंगलवार, 23 नवंबर 2010

बस एक बार तू कदम बढाकर तो देख .........

ख्याल  : मजाक है क्या ये 
                   मुझे भी बता दो 
             अरसा हुए हँसे हुए
             चलो , मैं भी हँस लेती हूँ 
             हा हा हा ...........

हकीकत :ऐसा क्या हो गया ?
              रोज हँसा करो 
              मगर किसी के सामने नहीं 

  ख्याल:  तो फिर कहाँ ?

हकीकत :  अकेले में 

  ख्याल :  क्यूँ ?
           अकेले में तो 
           पागल हँसते हैं 
           क्या अब यही ख़िताब 
           दिलाना बाकी है
           याद को यूँ दबाना बाकी है 
           किसी दर्द को यूँ जगाना बाकी है 
           आखिर कैसे हँसूँ ?
           किस लीक का कोना पकडूँ 
           किस वटवृक्ष की छांह पकडूँ 
           कौन -सी अब राह पकडूँ
           बिना लफ्ज़ के कैसे बात करूँ
           ख़ामोशी भी डंस रही है 
           नासूरों सी पलों में बस गयी है 
           फिर कैसे अकेले में हँसे कोई?

हकीकत : ख़ामोशी भी पिघलने लगेगी
               यादें भी सिमटने लगेंगी 
               दर्द भी बुझने लगेंगे
               बस एक बार मुझे 
               गले लगाकर तो देख
               मुझे अपना बनाकर तो देख
               लबों पर मुस्कराहट भर दूँगा 
               तेरे ग़मों को अंक में भर लूँगा 
               बस एक बार मुझे  
               अपना बनाकर तो देख 
               चाहत का लिबास पहना दूँगा 
               तुझे तुझसे चुरा लूँगा
               तेरे साये को भी 
               अपना साया बना लूँगा
               बस एक बार मुझे 
               हमसफ़र बना कर तो देख
               मेरी चाहत को अपना
               बनाकर तो देख
               रंगों को दामन में
               सजाकर तो देख
               मोहब्बत की रेखा
               लांघकर तो देख
               हर मौसम गुलों सा
               खिल जायेगा
               चाँद तेरे आगोश में 
               सिमट जायेगा
               चाँदनी सी तू भी
               खिल जाएगी
               झरने सी झर- झर
               बह जाएगी
               बस एक बार तू
               कदम बढाकर तो देख .........

शनिवार, 20 नवंबर 2010

वो ही पुरातन भारतीय नारी हूँ

चाहे शोषित  करे कोई 
चाहे उपेक्षित भी होती हूँ 
मगर मन के धरातल पर
डटकर खडी रहती हूँ
संस्कारों की वेणी में जकड़ी

मन से तो मैं आज भी वही
पुरातन भारतीय नारी हूँ 


चाहे मानक रोज नए बनाती हूँ
अपनी सत्ता का आभास कराती हूँ 
मगर मन की अतल गहराइयों से तो
आज भी १८वीं  सदी की नारी हूँ 


चाहे आसमां को छू आऊँ 
अन्तरिक्ष में उड़ान भर आऊँ
पर पैर जमीन पर ही रखती हूँ 
अपने मूल्यों की थाती को 
ना ताक पर रखती हूँ
चाहे विचारों में समरसता हो 
चाहे भावों में एकरसता हो
मित्रता के आयाम बनाती हूँ
पर पुरुष मन में उठे भावों की
गंध पहचानती हूँ इसीलिए 
पर पुरुष की छाया का 
ख्वाबों में भी प्रवेश वर्जित है 
मैं ऐसी संस्कारों में जकड़ी नारी हूँ


चाहे कितनी आधुनिक कहलाती हूँ 
अधिकारों के लिए दुनिया से लड़ जाती हूँ
उन्मुक्तता , स्वतंत्रता मेरे अधिकार हैं
स्वच्छंद हवा में विचरण करना मेरी नियति है
मगर उसका दुरूपयोग कभी ना करती हूँ
अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों 
को भी खूब समझती हूँ 
तभी तो  मन से आज भी 
अपनी जड़ों से जुडी नारी हूँ


वक्त पड़ने पर 
दृढ संकल्प शक्ति 
की बदौलत
चाहे दुर्गा बन जाऊँ
काली सा संहार करूँ 
लक्ष्मीबाई सी लड़ जाऊँ
मगर फिर भी मुझमें  बसती 
वो ही पुरातन नारी है 

जो बीज रोपित किये थे सदियों ने 
उन्ही से पोषित होती हूँ
इसीलिए कभी भी अपनी 
संस्कारों की ज़मीन नहीं खोती हूँ 
मैं आज भी संस्कारों के 
बीज रोपती हूँ  और 
संस्कारों की फसल उगाती हूँ
क्योंकि आज भी मन से तो मैं
वो ही पुरातन भारतीय नारी हूँ

गुरुवार, 18 नवंबर 2010

शायद मोहब्बत का भरम टूट जाए

आज तुम
बहुत याद आये
क्युं ?
नहीं जानती 
शायद 
तुमने पुकारा मुझे
तेरी हर सदा 
पहुँच  रही है 
मन के
आँगन तक 
और मैं
भीग रही हूँ 
अपने ही खींचे 
दायरे की 
लक्ष्मण रेखा में 
जानती हूँ
तड़प उधर भी 
कम नहीं
कितना तू भी
बेचैन होगा
बादलों सा 
सावन बरस 
रहा होगा
मगर ना 
जाने क्यूँ
नहीं तोड़
पा रही
मर्यादा के 
पिंजर को 
जिसमे दो रूहें 
कैद हैं 
 तेरी खामोश 
सदायें 
जब भी 
दस्तक देती हैं
दिल के 
बंद दरवाज़े पर
अन्दर सिसकता 
दिल और तड़प
जाता है 
मगर तोड़ 
नहीं पाता
अपने बनाये 
बाँधों को 
ये क्या किया 
तूने
किस पत्थर 
से दिल 
लगा बैठा
चाहे सिसकते 
सिसकते 
दम तोड़ दें
मगर 
कुछ पत्थर 
कभी नहीं
पिघलते
मैं शायद
ऐसा ही 
पत्थर बन 
गयी हूँ
बस तू 
इतना कर
मुझे याद 
करना छोड़ दे
शायद 
मोहब्बत का 
भरम टूट जाए 
और कुछ पल
सुकून के
तू भी जी जाए 

मंगलवार, 16 नवंबर 2010

ख्वाब में ही सही .................

एक ख़त
उस अनदेखे 
अनजाने
प्यार के नाम 
जो सिर्फ 
ख्वाबों में 
ही आकार
ले पाया 
हकीकत का 
ना सामना 
कभी कर पाया
वो खामोश 
प्रेम जिसके
शाने पर सिर
रख हर गम
भूल जाऊँ 
जिस की पनाह 
में इक 
ज़िन्दगी जी जाऊं
जो मौन रहकर 
भी मुखर 
हो जाये 
देहयष्टि से परे
जहाँ भावों की
उद्दात तरंगें 
जलतरंग  सी 
बजने लगें
जहाँ "मैं"
मुझको भूल जाऊँ
 प्रेम की गागर 
में डूब जाऊँ
जज़्बात बिना 
कहे ही 
अरमानों की 
बानगी बयाँ 
करने लगें
नयन प्रेम की
मूक अभिव्यक्ति
को व्यक्त 
करने लगें
अधर बिना 
हिले ही
ऊष्मा का 
आदान- प्रदान 
करने लगें
धडकनें हवा के
रथ पर सवार हो
प्रियतम की
सांसों संग 
बजने लगें
और वो मौन की
भाषा पढने लगे 
मेरे अहसास संग
जीने लगे
बिना स्पर्श किये भी
हर बेचैनी
बेकरारी को
करार दे जाये
ख्वाब में ही सही 
बस एक बार 
वो प्रेम व्यक्त 
हो जाये

शुक्रवार, 12 नवंबर 2010

प्रेरणाएं कब जीवंत होती हैं ?

मै तो
धूल का कण हूँ
मत बना
माथे का तिलक
मिटना मेरी
किस्मत है
मै तो एक पल हूँ
मत बना
ज़िन्दगी का सबब

आकर गुजरना
मेरी फितरत है
ये सिर्फ़
किस्से किताबों
की बातें हैं
क्यूँ फ़ेर मे पडते हो
सबकी किस्मत मे
गुलाब नही होते
 

हकीकत मे तो
सभी खार होते हैं
कुछ चुभ जाते हैं
कुछ बच जाते हैं
 
और जो बच जाते हैं
वो ही उम्र भर
तडपाते  हैं
इसलिए
मत बना
आरती का दीया
बुझना मेरी
तहजीब है
मत बना
डोर पतंग की
कटना मेरी
नियति है  
मुझे
सिर्फ वो ही
बना रहने दे
जो मैं हूँ
क्या था

मुझमे ऐसा
जो किसी को

प्रेरित करे
मत बना
अपनी प्रेरणा 
तडपना तेरी 
किस्मत है 
तड्पाना मेरी 
आदत है 
मत बना 
अपनी आदत
ज़िन्दगी तेरी
मिट जाएगी
व्यूहजाल में 
फँस जाएगी
फिर उम्र भर ना 
निकल पायेगी
जहाँ मौत भी 
दगा दे जाएगी 
प्रेरणाएं कब 
जीवंत होती हैं ?

मंगलवार, 9 नवंबर 2010

मैं और मेरी पीड़ा

मैं और मेरी पीड़ा
एक दूसरे के 
पर्याय बन गए हैं
पीड़ा मेरा निजी
अनुभव है
मेरे जीवन का
अवलंबन है
बिना पीड़ा के
मुझे अस्तित्वबोध
नहीं होता
अगर किसी दिन 
पीड़ा में कमी
आ जाये तो
एक शून्यता का
आभास होता है
अगर अपने निज को
सार्वजानिक कर दूं 
तो मुझमे मेरा
क्या बचेगा?
सार्वजानिक होने 
के बाद तो
रोज मेरी 
पीड़ा का 
चीरहरण होगा 
और मैं 
चौराहे पर
खडी खुद को
अस्तित्वविहीन 
महसूस करूंगी 
पीड़ा मेरा नितांत
निजी अनुभव है
अब पीड़ा को भी
पीड़ा होती है
अगर मुझे 
पीड़ा में 
डूबा ना देखे तो
कभी कभी तो
पता ही 
नहीं चलता
पीड़ा मुझमे है 
या पीड़ा ही 
बन गयी हूँ मैं

शनिवार, 6 नवंबर 2010

अब कैसे मेरे बिन जन्म बिताओगे ?

तुम्हें
क्या फर्क 
पड़ता है 
मैं रहूँ 
ना रहूँ
तुम्हारी 
ज़िन्दगी में
मैं हंसूं 
ना हंसूं
तुम्हें
अब फर्क
नहीं पड़ता ना
बस 
तुम तो 
अपने 
मन की
अँधेरी
गुमनाम

गलियों में
 गुम हो 
क्या फर्क 
पड़ता है 
अब तुम्हें
जब खुद 
से ही हमें 
जुदा कर दिया 
 तेरी 
बुत परस्ती 
की आदत ने
हमें रुसवा किया 
स्पर्श के
अहसास में 
अंकित मेरे 
वजूद को 
अब कैसे 
खुद में
समेटोगे 
तुम्हारी
अधूरी 
चाहत की 
पूर्णता 
अब कैसे 
पाओगे 
मेरे बिना 
इतने जन्म
के बाद के 
मिलन को
एक बार फिर
तुमने 
अगले कई 
युगों का
मोहताज़ 
बना दिया 
मेरे वजूद 
में जो तुम
अपना खुदा
तलाश रहे थे
मेरी साँसों 
में अपनी 
ज़िन्दगी 
जी रहे थे
कहाँ गया 
वो आखिरी
सांस तक
साथ जीने

 का वादा
कैसे अब

हर कसम 
निभाओगे 
अब तुम
जन्म जन्म
के लिए
फिर ना
भटक जाओगे
मुझे अपनी
ज़िन्दगी 
जन्मों के 
तप का 
फल मानने 
वाले
कहो
अब कैसे 
मेरे बिन 
जन्म बिताओगे ?

शुक्रवार, 5 नवंबर 2010

चलो दीप एक ऐसा जलायें ..........

चलो
दीप एक ऐसा जलायें
ह्रदय के सभी तम मिट जाएँ
लौ से लौ ऐसी जगाएं 
दीप माला नयी बन जाए 

कुछ तुम्हारे कुछ मेरे 
ख्वाब साकार हो जाएँ
तेरे मेरे की छाया से
ह्रदय मुक्त हो जाएँ
नवगीत लबों पर सज जायें 
आनंद चहूँ ओर छा जाए
हर घर आँगन सँवर जाए
भेदभाव सब मिट जाएँ
आलोकित पथ हो जाएँ
हृदयों में नव सृजन हो जाए
प्रेम रस के हम दीप जलाएं 
दिल की फिर बाती बनाएं 
जीवन सभी महक जाएँ 

चलो 
दीप एक 
ऐसा जलायें ..........

बुधवार, 3 नवंबर 2010

उसका दिनकर तो हमेशा के लिए अस्त हो गया

कभी इंतज़ार 
किया करती थी
रात 
चाँद की 
थाली में 
सितारों की 
कटोरियों में
सजाकर 
दिल के 
टुकड़ों को 
इक सुबह की 
आस में 
कि वो आएगा
और ले जायेगा 
सारी रात के 
बिखरे ,बेतरतीब
अहसासों की किरचों
को समेटकर
मगर वो 
अब नहीं आता 
रात के मुहाने पर 
नहीं देता 
कोई दस्तक
नहीं टूटता 
कोई तारा 
उसके नाम का 
तनहा रात का
हर कोना 
अब इंतज़ार के
दरख़्त पर
सूख रहा है 
वक्त की धूप में 
मगर उसका
दिनकर तो 
हमेशा के लिए 
अस्त हो गया
और रात
खडी है वहीँ 
उम्रभर के 
इंतज़ार के साथ 
एकाकी ,उदासी 
किसी विरहन 
की आँख का
मोती बनकर







सोमवार, 1 नवंबर 2010

कुछ यूँ दुनिया का क़र्ज़ उतारा जाए

चलो अच्छा हुआ
बातें ख़त्म हुयीं 
अब दुनियादारी 
निभाई जाये 
तुझे चाहते 
रहने की सज़ा 
एक बार फिर
सुनाई जाये
चाहतों की सजायें
अजब होती हैं 
बेगैरत फूलों 
की तरह
चलो एक बार
फिर किसी को
चाहा जाए 
कुछ इस तरह
ज़िन्दगी को
मौत से
मिलाया जाये 
यूँ ही नहीं 
मेघ से 
उमड़ -घुमड़ रहे 
इन अलावों को
फिर से 
जलाया जाये
इन रूह की
सीली लकड़ियों को
बुझे चराग से
जलाया जाए
इस सुलगते 
धुएं के
गुबार में 
चलो एक चेहरा
नया ढूँढा जाए
ज़िन्दगी के 
तौर तरीकों को
ताक पर रखकर
एक बार फिर से
चाहतों का ज़नाज़ा 
निकाला जाए
यूँ हसरतों को
रुसवा किया जाए
मौत से पहले 
मौत को
पुकारा जाए

एक बार
फिर से

रूह के
ज़ख्मों को
उबाला जाए
रूह की
खंदकों  में
उबलते लावे को
एक बार 
फिर से 
कढाया जाए
कुछ यूँ
दुनिया का 
क़र्ज़ उतारा जाए