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रविवार, 31 जुलाई 2016

चटखारों की आवाज़

कोई ज़िन्दगी से संवाद करे भी तो कितना
जहाँ प्रश्नों का ज़खीरा हो
समय कम हो
और उत्तर नदारद

नमक मिर्च वाली ज़िन्दगी में
इश्क नाकामियों का ही तो दूसरा नाम है
और तुम ... पहला

अब चटखारों की आवाज़ मौन के गुम्बद में अज़ान भरती है

मंगलवार, 26 जुलाई 2016

एक सच

मरखनी गाय और कटखने कुत्तों से हम
भूल चुके हैं अपनी सभ्यताएं भी

अब
आने वाली
पीढियां मशगूल हैं
अंतर्विरोधों को ताबीज बना
पहनने में

समय सिर धुन रहा है ...

गुरुवार, 14 जुलाई 2016

चिड़िया पंखहीन नहीं .........

अकेलेपन के गीतों पर
डोलता है धरती का सीना
जाने कैसे
निष्ठुर हो गया आसमां

यूँ
चिडिया ने चुग्गे तो खूब खिलाये थे
फिर कैसे
बाँझ हो गयी इंसानियत
जो पराये दर्द पर तिलमिला उठो
और उसके लिए खुद ही दर्द के बायस बन जाओ

आह !
जान लो इतना सा सच बस
चाहे न मिले धरती न मिले आसमां
फिर भी जानती है वो जीना
क्यूँकि
चिड़िया पंखहीन नहीं .........

शनिवार, 2 जुलाई 2016

अँधेरे का मध्य बिंदु ... सुनीता शानू की नज़र से



अँधेरे से उजाले की ओर ले जाती प्रेम-कहानी

"अँधेरे का मध्य बिंदु " वंदना गुप्ता का प्रथम उपन्यास है । इससे पहले उनकी पहचान एक कवयित्री और एक ब्लॉगर के रूप में ही थी...

सबसे पहली बात मेरे मन में जो आती है वह ये है कि जिस विषय पर हमारा समाज कभी बात करना पसंद नहीं करता, जिसे नई पीढी की उच्छंखलता, गैरजिम्मेदाराना हरकत, या पाश्चात्य समाज की नकल कह कर नक्कार दिया गया है, उसी विषय को उठाकर सामाजिक बेडियां तोड़ते हुए कलम चलना कोई मामूली बात नहीं है। शायद पाठक यह नहीं जानते कि लेखिका के मन में समाज में फैली बुराइयों के प्रति आक्रोश के बीज बहुत समय पहले से ही पनप चुके थे, जिन्हें वह अपनी कविताओं के माध्यम से कई बार समाज के सामने लेकर आई भी हैं, इसी समाज को, और सदियों से चले आ रहे वैवाहिक बंधनों को चुनौती देता यह उपन्यास वाकई काबिले तारीफ़ कहा जायेगा।

वन्दना गुप्ता के उपन्यास का नाम है, “अंधेरे का मध्य बिंदु” उपन्यास के प्रथम अध्याय में पाठक यह विचार लगातार करता है कि कहीं कुछ ऎसा मिले जिससे यह ज्ञात हो कि इसका नाम अँधेरे का मध्य बिंदु ही क्यों रखा गया है, तो सम्पूर्ण उपन्यास पढ़ने के उपरान्त ही आप भली-भांति इस बात से परीचित भी हो जायेंगें, कि सिर्फ़ विवाह के बंधन में बंध जाने से ही ज़िंदगी में उजाला नही आता, रिश्तों में दोहरापन, शक, और अभिमान ऎसे मुद्दे हैं जिनके रहते विवाह के बाद भी जीवन में अँधकार छाया रहता है, एक दूसरे के प्रति प्रेम,विश्वास और समर्पण द्वारा ही जीवन में खुशियाँ लाई जा सकती है तथा समाज में फैले अज्ञानता के अंधेरे को दूर करना ही इस उपन्यास का मकसद है...।

मै यह नहीं कहूँगी कि वन्दना का यह उपन्यास पूरी तरह से अपनी बात कह पाया है, या इसमें कोई कमी नहीं है, लेकिन यह अवश्य कहूँगी कि यह वन्दना गुप्ता का प्रथम उपन्यास है, इस नाते कुछ सामान्य गलतियों अथार्त दोहराव को नक्कारा जा सकता है, जैसे पूरे उपन्यास में एक शब्द “मानो” का प्रयोग अत्यधिक किया गया है, जिसे कम किया जा सकता है। इन छोटी-मोटी गलतियों को नज़र अंदाज़ करते हुए हम कह सकते हैं कि वन्दना गुप्ता अपनी बात कहने में सफ़ल रही है। उपन्यास में निहित उनके तमाम विचार जनसाधारण को आकर्षित करते है। भाषा का फूहड़पन कहीं पर भी परिलक्षित नहीं होता है, न ही सपाट बयानी नजर आती है, वरन उपन्यास पढ़ते हुए वंदना गुप्ता की कल्पनाशक्ति का अनुमान लगाया जा सकता है।

विवाह चाहे अरेंज हो या प्रेम विवाह दोनों में ही प्रेम, विश्वास, और स्वतंत्रता का होना जरूरी है, वन्दना उपन्यास के माध्यम से यह संदेश देना चाहती है कि कोई भी किसी दूसरे को जबरन रिश्तों में बाँधकर नहीं रख सकता, अगर रिश्तों में परस्पर प्रेम, विश्वास तथा स्वतंत्रता बनी रहेगी तो वह रिश्ता अधिक टिकाऊ होगा, और ज़िंदगी खुशी-खुशी जी जायेगी, वरना ज़िंदगी भर यही रोना चलता रहेगा कि विवाह करके गलती की, या प्रेम करके गलती की। उपन्यास में बहुत से उदाहरणों द्वारा वंदना ने लीव इन रिलेशन के हानिकारक परिमाणों की ओर इशारा किया है, जिन्हें पढ़कर लगता है कि वह सब सच्ची घटनायें है, इसके साथ ही कुछ ऎसे उदाहरण भी आपको पढ़ने को मिल जायेंगे जहाँ शादी-शुदा जोड़े एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप करते हुए जीवन जीने पर मज़बूर हैं... इन सभी बातों को रखते हुए वंदना की उपन्यास को रोचक बनाने की मेहनत साफ़ दिखाई दे रही है।

अंधेरे के मध्य बिंदु के नायक-नायिका विवाह जैसे बंधन में नहीं बँधना चाहते हैं वह चाहते हैं कि उनका रिश्ता एक दूसरे के प्रति प्रेम-समर्पण तथा विश्वास का रिश्ता हो, जिसमें कोई भी एक दूसरे से किसी प्रकार की अपेक्षाऎं न रखें वरन ज़िंदगी की जिम्मेदारियों को दोनों ही मिलकर उठायें। उपन्यास में नायक-नायिका के प्रेम-समर्पण-विश्वास को इतना अधिक दिखाया गया है कि पाठक जब स्वयं की ज़िंदगी से तुलना करने लगता है तो उसे यह सब महज़ एक कल्पना सी लगती है, क्योंकि पाठक अपने आप को नायक-नायिका की तरह नहीं देख पाता है, उसकी स्थिती “लोग क्या कहेंगे” में आकर अटक जाती है, इसी समस्या को एक सोशल वर्कर के रूप में शीना को दिखाते हुए लेखिका ने हल किया है, साथ की एड्स जैसे रोग को बड़ी सावधानी के साथ उपन्यास का एक महत्वपूर्ण अंश बनाते हुए कारण-निवारण तक समझा दिये हैं।

अंत में वंदना गुप्ता को उनके प्रथम उपन्यास पर मै शुभकामनायें देते हुए इतना ही कहना चाहूंगी कि उनकी कलम रूकनी नहीं चाहिये, साथ ही यह आशा करती हूँ कि वे जल्द ही पाठकों को एक और नया उपन्यास देगीं...
सुनीता शानू


ये समीक्षा राजस्थान डायरी पत्रिका के जून अंक में जगह की कमी की वजह से कम  प्रकाशित हुई है .