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शनिवार, 28 दिसंबर 2013

सज गई "सम्मान" की मंडी

पुस्तक मेले में गई हुई थी, तमाम  किताबों को उलटते पलटते मेरी  निगाह एक किताब पर जा टिकी.. उसका  नाम था " धन कमाने की तीन सौ तरीके " । कीमत थोड़ा ज्यादा थी, आठ सौ रुपये, लेकिन दिमाग में एक बात थी,  क्या फर्क पड़ता है, ले लेते हैं। अगर एक तरीका भी हिट हो गया तो बस अपनी तो लाटरी निकल जाएगी। चुपचाप मैने ये किताब खरीद ली और घर पहुंच कर सब  काम धाम निपटाने के बाद उनसे कह दिया कि आज चाय खुद बना लीजिएगा,  मुझे डिस्टर्ब नहीं करना है। पहले तो मियां जी समझ नहीं पाए कि आखिर माज़रा  क्या है, क्यों कह रही है कि  चाय खुद ही बना लेना, लेकिन जब उन्होंने  मेरे हाथ  में धन कमाने की तीन सौ तरीके वाली किताब देखी तो खुशी-खुशी  राजी हो गए। यहां तक मेरे किताब पढ़ने के दौरान दो तीन बार मेरे कमरे में चाय पहुंचा कर भी गए। खैर पूरी किताब पढ़ गई, लेकिन मुझे कोई तरीका पसंद  नहीं आया, लेकिन जो पसंद आया वो उसमें शामिल नहीं था। पसंद ये था कि " धन कमाने के तीन सौ तरीके "  नाम से किताब छपवा ली और अंधाधुंध बिक रही है और लेखक सम्मान पे सम्मान प्राप्त कर रहा है  और लेखक जिस तरह खुद कमाई कर रहा था, इस किताब में उस तरीके का  जिक्र तक नहीं किया।

मैं ये सब सोच ही रही थी कि खबर मिली शहर में पुरस्कार /सम्मान मेला लगा है फिर चाहे साहित्य हो , ब्लॉग या सोशल साईट। मैंने बेटे को आवाज़ दी और कहा सोचती हूँ बंटू , दो चार सम्मान अपने लिए भी मंगवा लूं ,वैसे भी ऐसा सीजन रोज रोज नहीं आता है। राष्ट्रीय हो या अंतर्राष्ट्रीय हर तरह के सम्मान आपको मिल जायेंगे बशर्ते उनकी शर्त पूरी करने की आपमें कूवत हो या कहो इच्छाशक्ति हो क्योंकि शुरू में मामूली रकम सम्मान की एवज में ली जाती है और फिर इसी तरह आदत डाली जाती है सम्मान देने की उसके बाद तो लेखक/ लेखिकाएं घर से कैसे भी इंतज़ाम  करके पैसे ले आते हैं।  

अब देखो  कल तो वो मोहल्ले में रहने वाली मिसिज़ शर्मा भी चार सम्मान एक साथ ले आईं, उन्होंने किया ही क्या, सिर्फ इतना ही ना कि फेसबुक आदि सोशल साइट्स  के जरिए कुछ लोगों को पहले अपना दोस्त बनाया,  उन्हीं की कविताएं और लेख मंगाकर 2 - 4  पुस्तकों का संपादन किया, बेचारे नए - नए छपास के रोग से ग्रस्त कवियों की  बांछे खिल उठी कि पुस्तक में उनकी कविता छप रही है। मिसिज शर्मा ने शर्माते हुए इनसे ढाई ढाई / तीन तीन हजार रूपये मांग लिए, ये बेचारे मना भी नहीं कर पाए। अब मिसिज़ शर्मा स्वभाव से हैं ही इतनी मीठी कि कोई क्या मना करता। वैसे भी अब तो ये धंधा बन गया है,कोई भी संपादक बन सकता है करना ही क्या है  कभी 25 तो कभी 30 कवियों को इकठ्ठा करो और एक संग्रह निकलवा दो और नए नए पंछी भी छपास रोग से ग्रस्त होने के कारण राजी राजी भी इतने पैसे देने को तैयार हो जाते हैं तो राह और आसान हो जाती है , अब देखो लगता क्या है , किसी प्रकाशक से बात कर लो वहाँ सब सेटिंग हो ही जाती है , उसके बाद सारा मामला छपाई से लेकर लोकार्पण तक कुल मिलाकर तक़रीबन 40 हजार तक में भी यदि निपट जाए तो लगा ले हिसाब बेटा अंदर कितना आया और इसका सबसे बड़ा फायदा ये कि अपनी किताब मुफ्त में छपवा लो।  े हींग लगे ना फ़िटकरी और रंग चोखा वाली कहावत इसीलिये तो कही गयी है। मुफ़्त में नेम और फ़ेम दोनों मिल जाते हैं, और वो जो मिसिज़ बत्रा हैं उन्होंने तो क्या किया कुछ नए- नए अख़बार और पत्रिकाओं की नियमित सदस्य बन गयीं और कुछ में सदस्य, जानते हो न सदस्य होने का मतलब यानि एकमुश्त राशि उन्हें दे दो,  फिर क्या था उन्होंने तो पूरा का पूरा परिशिष्ट ही उन पर छाप दिया, अब इन्होंने भी हिंदीसेवी होने का खिताब झटक लिया। इसके बाद तो थोड़े पैसे देकर आराम से 2-3 सम्मान  भी जेब में कर लिए। 

सबसे मज़े की बात तो ये है कि आपको कोई ज्यादा खर्च नहीं करना वो हैं न मिस शालिनी उन्होंने तो आज तक कुछ खास ना लिखा न कुछ किया बस अपनी किताब ही भेज दी जगह जगह और वहाँ उन्होंने उनके नियमानुसार कहीं प्रबंधन के नाम पर तो कहीं सदस्यता के नाम पर तो कहीं प्रतिनिधि शुल्क के रूप में पैसा दिया और सम्मान पर कब्जा जमा लिया।  

वैसे ऐसा सिर्फ़ लेखिकाओं ही नहीं लेखकों के साथ भी हो रहा है , कोई विलग नहीं इस महामायाजाल से , आखिर खर्च किया है तो सम्मानित होने पर हमारा अधिकार बरबस बन ही जाता है और ना भी बनता हो तो दोस्त लोग तो हैं ही आपको बूस्ट अप करने के लिये , आपके लेखन को कालजयी बताने के लिये ऐसे में आप कैसे सम्मान प्राप्त करने की प्रक्रिया से खुद को अलग रख सकते हैं ।

आज कल  मामूली खर्च पर टुचपुंजिए अखबारों में आपके सम्मान की तस्वीरें भी छप जाती हैं, उसे सोशल साइट पर डाल दो, फिर क्या है, सम्मान देने वालों की लाइन लग जाती है। क्योंकि ये भी आजकल धंधा हो गया है। धंधेबाज सोशल  साइट पर तस्वीर देखते ही समझ जाते हैं कि ये मैडम तो आसानी से चंगुल में फंस जाएंगी, क्योंकि इन्हें सम्मान लेने और अखबार में छपवाने  का शौक है। बस ये डोरे डालने लगते हैं और बेचारी लेखिकाएं फंस ही जाती हैं, खुद खर्च करके अपने  किराये भाड़े से जगह जगह दूर पास की जगहो पर तो जाती ही हैं और वहां आयोजकों को  भी एकमुश्त राशि देने से पीछे नहीं रहतीं। मकसद और कुछ नहीं, बस अपनों के बीच अपना नाम कर लिया,   देखो कितनी बड़ी कवयित्री हूँ मैं , जब देखो रौब गांठती फिरती हैं जगह जगह अब चाहे लेखन में परिपक्वता हो या ना हो या लेखन स्तरीय हो या नहीं मगर सम्मान तो मिल गया ना और दोनों का मकसद पूरा हो गया जो संस्था दे रही है उसका भी नाम हो गया और उसने तो इन्ही का इन्हे दे दिया मगर लेने वाली ये महिलाएं जानकार भी अनजान बन यूं लहराती फिरती हैं मानो हमारी तो कोई कीमत ही नहीं। 

हमें तो जैसे इन हथकंडों का पता नहीं या हम नहीं ले सकते थे ऐसा करके , हुंह , क्या समझती हैं ये लेखिकाएं,  क्या ये ही ऐसा कर सकती हैं , मैं नहीं , जब आज सब जगह यही हो रहा है हर गली चौराहे के नुक्कड़ पर बड़े बड़े संस्थाओं के नाम रखकर सम्मान बेचे और ख़रीदे जा रहे हैं तो सिर्फ मैं ही क्यों लीक से हटकर चलूँ , क्यों ना मैं भी भीड़ में शामिल हो जाऊं , आखिर रहना तो इसी समाज में है ना , आखिर समाज की परम्पराओं को तोड़कर कैसे जिया जा सकता है, फिर तो मरणोपरांत ही याद किया जाता है और सम्मान दिया जाता है और ऐसे सम्मान का क्या फायदा जिसका सुख जीते जी ना भोगा, क्योंकि ज़िन्दगी तो आखिर एक बार मिलती है और खुद को साबित भी एक बार ही किया जा सकता है संसार की नज़रों में तो मौका हाथ से भला मैं भी क्यों गँवाऊँ और फिर  आजकल सिर्फ प्रतिभावान होने भर से गुजारा नहीं चलता , देखो ये सम्मानों के जो महल होते हैं ना यूं ही तो खड़े हो नहीं सकते , पैसा लगता है , अब शोहरत पाना चाहते हो , खुद को सिद्ध करना चाहते हो तो जेब तो ढीली करनी ही पड़ेगी ना कोई सरकारी अकादमी तो हैं नहीं जो प्रतिभा के दम पर सम्मान ले जाओ तुम , वैसे वहाँ भी डगर इतनी आसान थोड़े होती है ।वहाँ  भी जान पहचान और रसूख के बल पर ही सम्मानों की ढेरी लगती है फिर जब दोनों ही जगह एक जैसा हाल है तो ये क्या बुरे हैं , कम से कम यहाँ हम खुद तो खुश हो लेते हैं , ड्राइंग रूम में सम्मानों का एक कार्नर बना लेते हैं जिससे आने जाने वाले मेहमानों पर रुआब पड़ता है और हमारा कद समाज में ऊंचा हो जाता है क्योंकि अंदर की बात हर कोई नहीं जानता और जो जानते हैं वो इस पर चुप रहते हैं क्योंकि कहीं ना कहीं उन्होंने भी इसी तरह सम्मान पाये होते हैं तो बता बेटा बहती गंगा में यदि मैं भी हाथ धो लूँगी तो कौन सा पाप कर लूँगी , आखिर लेखन कर्म करके मैं भी तो साहित्य की सेवा ही कर रही हूँ । माँ की इन तर्कों के आगे बेटा बंटू शब्दहीन होकर खामोश रह गया। आजकल मौसम है सम्मानों का , देखो तो हर गली कूचे में , हर चलते फिरते को मिल रहा है तो मुझे भी जरूर मिल जायेगा बेटा, बस तू कॉलेज जाते जाते सम्मान की ईएमआई भरता जाइयो, बाकी मैं सम्भाल लूँगी कम से कम इन सम्मानों में इज्जत का जनाज़ा तो नहीं निकलता, कोई देने के बाद अफ़सोस तो जाहिर नहीं करता न कि गलती से दे दिया या ये इस सम्मान के लायक नहीं , इसकी उम्र इस लायक नहीं या इसका लेखन उस स्तर  का नहीं था। हाँ नहीं तो !!! 

क्या हाँ नहीं तो हाँ नहीं तो कर रही हो माँ, उठो देर हो रही है मुझे कॉलेज जाना है माँ कहकर जब बंटू ने हिलाया तो मेरा सुन्दर सलोना सपना कांच सा टूट गया और हकीकत के धरातल पर मे आत्मा का लहूलुहान वजूद सिसक रहा था। बेटा तो चाय नाश्ता करते कॉलेज  चला गया, पर मेरे सामने इन दिनों बिक रहे तमाम सम्मान और सम्मान लेने वालों के चेहरे सामने आ गए, सच कहूं, नाराज मत होना, तरस आ रहा था ऐसे चेहरों पर ... और बदबू आ रही थी खुद की सोच से भी आखिर मैंने ऐसा सोचा ही क्यों ? क्या सम्मान की लालसा इतनी भयंकर होती है जो आत्मसम्मान भी लील लेती है ……… इस प्रश्न में डूब गयी मैं। 

शुक्रवार, 27 दिसंबर 2013

बालार्क की आठवीं किरण



बालार्क की आठवीं किरण हैं सुधा ओम ढींगरा जी जो किसी पहचान की मोहताज नहीं।  जो अपनी पहचान आप हैं , उनका लेखन स्वयं बोलता है।  

" रिश्ते " शब्द ही जाने कितने रिश्तों की ऊष्मा साथ लिए आ जाता है जेहन के दरवाज़े पर मगर क्या जरूरी है हर रिश्ते को नाम देना , क्या बिना नाम के रिश्ते , रिश्ते नहीं होते या उनमे भावनाएं नहीं होतीं या उनमे कलुषता होती है ये एक ऐसा प्रश्न है जिससे हर कोई जूझता है और खास तौर से एक स्त्री जब उसे कसा ही रिश्तों की कसौटी पर जाता है ना कि उसके स्वतन्त्र अस्तित्व को स्वीकारा ………यही है हमारे समाज की सबसे बड़ी विडंबना और कवयित्री इसी विडंबना से उसे मुक्त करना चाहती हैं और एक नए समाज का निर्माण जहाँ स्त्री केवल स्त्री ना हो बल्कि एक इंसान भी हो

"भावनाएं/ संवेग / खुले रहकर भी / मर्यादित रह सकते हैं / फिर बंधना -बांधना क्यों ?"


"कठपुतली " के माध्यम से स्त्री की दलित अवस्था  का सटीक चित्रण किया है क्योंकि डोर है उसके हाथों में 

"कराये हैं नौ रस भी अभिनीत / जीवन के नाट्य मंच पर / हंसें या रोयें / विरोध करें या हों विनीत /  धागे वो जो थामे है "


"स्मृतियाँ " नाम ही काफी है , कौन है जो बचा है स्मृतियों के गेसुओं में उलझने से , कौन होगा ऐसा जिसकी रूह पर कोई स्मृति दस्तक न देती हो , शायद ही कोई प्राणी हो जो अच्छी या बुरी स्मृतियों से ज़िन्दगी में रु-ब -रु ना होता हो और जब ये स्मृतियाँ जब बिन बुलाये मेहमान सी जब चाहे चली आती हैं तो यादों के पर्दों को यूं हिलाती हैं कि ना चाहते हुए भी स्वागत करना ही पड़ता है फिर न कोई होश रहता है बस यही तो भाव संजोया है कवयित्री ने कविता में 

"तेरा मेरा साथ " ज़िदगी की धूप  छाँव का एक खूबसूरत चित्रण हैं , एक के बिना दूजे का कोई अस्तित्व ही नहीं , एक के होने से ही दूसरे के होने के अहसास से गुजरा जा सकता है , सुख हो या दुःख ज़िन्दगी के ऐसे पहलू हैं जिनसे गुजरे बिना ज़िन्दगी जी ही नहीं जा सकती और सुख और दुःख हैं तो ज़िन्दगी की धूप और छाँव से भी बचा नहीं जा सकता और यही ज़िन्दगी का अनुपम सौंदर्य होता है जिससे गुजरने के बाद ही जीवन कुंदन बनता है 

" और कहती है / ऐ पथिक ! / दो पल मेरे पास आ / सहला दूं / ठंडी सांसों से / तरोताजा कर दूं तुम्हें / ताकि चहकते महकते / बढ़ सको अपनी / मंज़िल की और "

"नींद चली आती है " एक ऐसी संवेदनशील कविता है जिससे गुजरते तो सभी हैं मगर उन भावों में रचता बसता  कोई कोई है।  यूं तो आज के दौर में जब संवेदनहीन हो गया है समाज और रिश्ते भी , जहाँ माता पिता को भी एक अवांछित तत्व समझ किनारा कर लिया जाता है वहाँ कवयित्री की संवेदनाएं इतनी सौम्यता से मुखर हुयी हैं कि एक चारपाई के माध्यम से उसने एक जीवन की पूरी  ना केवल कहानी कही है बल्कि रिश्तों की नमी को भी उकेरा है जो इस कविता का अक्षुण्ण सौंदर्य है 

"चारपाई के फीके पड़े रंग / समय के धोबी पाठकों से / मौसी के चेहरे पर आयी / झुर्रियों से लगते हैं "

कभी कभी इंसान एक क्षण में एक लम्बी यात्रा तय कर लेता है जब कोई लम्हा उसे छूकर गुजरता है तभी तो कवयित्री "वर्षों की यात्रा " तय कर लेती हैं सर्दियों की उतरती धूप के मखमली अहसासों के साथ खो जाती है अपने बचपन की दुनिया में , जो जीवन की रोजमर्रा की स्थितियाँ हैं उनमे भी स्पर्श की ऊष्मा महसूसना और उसे शब्दों में पिरोना ही तो कवि के लेखन की सार्थकता है जिसमे कवयित्री सक्षम रही हैं :

" आँगन में धीरे धीरे / सरकती , फैलती , सिकुड़ती / सर्दियों की धुप / उस पर लहराते / पाइन वृक्ष के साये / दादी की चटाई की याद दिल गए"

रिश्तों की आत्मीयता का क्या महत्त्व है उसे महसूसने और कहने की क्षमता से लबरेज है कवयित्री का ह्रदय तभी तो हर और उसकी निगाह है , हर पल को जैसे साँसों संग महसूसती हैं , धड़कनों में राग बन जैसे बजती हों घंटियाँ कुछ ऐसा ही नाता है कवयित्री का जीवन से और जीवन में उतरे हर रिश्ते से तभी रिश्तों के सौंदर्य को इस खूबसूरती से उकेरा है कि पाठक उसके साथ अपनी स्मृतियों के खो जाता है और एक यात्रा वो खुद कर आता है और यही होती है किसी भी कवि के लेखन की सार्थकता जब पाठक उसमे अपना अक्स ढूँढता है और वो उसे वहाँ मिलता है।  कवयित्री को सार्थक लेखन के लिए बधाई देती हूँ। 

मिलती हूँ अगले कवि के साथ जल्दी ही .......... 

सोमवार, 23 दिसंबर 2013

बालार्क ………सातवीं किरण



दोस्तों 

(बालार्क की छटी किरण मैं खुद हूँ तो मैं अपने बारे में तो  स्वयं कुछ कह नहीं सकती।  अब यदि किसी को हमारा लिखा पसंद आएगा और  यदि हमे इस लायक समझा गया  तभी कोई कुछ कहेगा  तभी आपको उसके बारे में पता चल सकता है।  )

चलिए मैं आपको मिलवाती हूँ बालार्क की सातवीं किरण अशोक आंद्रे जी की कविताओं से :

ज़िन्दगी के साथ भी और ज़िन्दगी के बाद भी एक दिशा एक दशा हमें हर पल सचेत करती है , हमारे अंतस में कोयल सी कुहुकती है मगर समझ के परिदृश्य में छेद होने के कारण स्वप्नवत ही लगता है और ज़िन्दगी की शाम में एक दस्तक देता प्रतीत होता है , आगत विगत के सारे गणित उस पल उसकी सोच पर हावी हो उसे उससे मिलवाते हैं मगर कहने या सुनने की स्थिति से परे दृष्टा बन वो सिर्फ देख सकता है मगर किसी से कह नहीं सकता।  मानव की त्रासदी का सम्पूर्ण रेखाचित्र खींच दिया है कवि ने "जलजला " के माध्यम से फिर चाहे जीते ही अवलोकन हो या अर्ध चेतनावस्था हो , जिसे हम देख कर भी देखना नहीं चाहते , चेतना की उच्चावस्था में उपजा अर्ध चेतनावस्था की प्रतिक्रिया है ये कविता कुछ इस तरह :


" और ऐसे में सोचो / कल सूर्य ही ना निकले / लेकिन उसे हल्का सा होश यह सब / देखने / समझने के लिए / तब कैसा लगेगा ? / क्योंकि समय तो होगा नहीं / किसी की गति को पकड़ने के लिए "

" बादलों की " कविता के माध्यम से प्रकृति से तादात्म्य बनाता कवि ह्रदय जब प्रश्न करता है खुद से तो उत्तर भी अंदर से ही आता है जो कवि के बालसुलभ मन को सुकून की स्थिति में पहुँचा देता है , जहाँ जीवन का राग है , प्रकृति में बिखरा सतत आनंद है फिर भी कहीं कोई अवसाद नहीं और यही उल्लास कवि में निराशा में आशा के बीजों को बो एक बार फिर उत्साह का संचार करता है अर्थात प्रकृति के कण कण से चाहो तो जीवन जीने के सूत्र ग्रहण किये जा सकते हैं बस जरूरत है तो उस नज़र की , उस सोच की। 

"अकेला खड़ा मैं " जीवन दर्शन की संपूर्ण व्याख्या है , एक खोज है खुद की खुद तक , एक प्रश्न सत्य से सम्मुख होने का , आखिर क्या है उस पार जिससे अनभिज्ञता है और एक धरातल पर खड़ा अक्स खुद के होने की स्वीकार्यता के साथ उसके बाद की स्थिति का अवलोकन करता है और जीवन के होने और उसके बाद न होने के रहस्य को सुलझाने की कोशिश है ये कविता :

" हे ईश्वर / इसीलिए मुझे उस बीज के पनपने का रहस्य जानना है / आखिर कैसे एक दिन बिखर कर मौन हो जाते हैं वे ?"

"लेकिन बिल्ली तो " के माध्यम से कवि ने इंसानी सोच की जड़ प्रकृति पर प्रहार किया है।  कैसे बिल्ली के रास्ता काटने पर भय और शंका के बादल अपना विस्तार पाते हैं और एक नए धरातल का निर्माण कर देते हैं जो होने और ना होने की अवस्थाओं से परे होता है मगर शंका और अन्धविश्वास की जड़ें इतनी गहरी होती हैं कि न चाहते हुए भी विस्तार पाती हैं और जकड लेती हैं अपने बाहुपाश में इस तरह कि न चाहते हुए भी विश्वास के जुगनू टिमटिमाने लगते हैं जिन्हे दूर करने की कोशिश तो की जाती है मगर तब भी कहीं न कहीं भय की एक शाख सोच से लिपटी दंश देती रहती है ये कहते हुए :

"क्योंकि  चेहरे तो लौटते रहेंगे इसी तरह की शंकाओं के लिए / ताकि उसकी अनंत यात्रों के पुल बनाये जा सकें / ताकि उसकी प्राकृतिक सोच के साथ / जहाँ सब कुछ पहले से तय होता है / उसकी पूर्णता के साथ प्रस्तुत हो सके / लेकिन बिल्ली तो फिर भी......."


" फुनगियों पर लटका अहसास " आज के कंक्रीट के जंगल में गुम होते अहसासों की विवशता का चित्रण है , कैसे वक्त के साथ विश्वास की धज्जियाँ इस प्रकार उड़ जाती हैं कि चाहकर भी किसी पर विश्वास किया नहीं जा सकता और विश्वास किये बिना जिया भी नहीं जा सकता , एक अजब भयाक्रांत माहौल को जन्म देते हम लोगों को सोचना होगा , जागना होगा एक बार फिर से विश्वास की ड्योढ़ी पर आसन जमाना होगा नहीं एक वक्त ऐसा आ जाएगा हम खुद को अकेला पाएंगे और अकेलेपन की जोंक धीरे धीरे हमारा सारा लहू चूस लेगी :

"इसी प्रक्रिया से गुजरता हुआ वह / अपने ही विश्वासों की परतों को / कुतरने लगता है / सयाने चूहे की तरह / और उम्र की घिसी कमीजों को / परचम की तरह लहराकर / ऊँचाई और गहराई के मध्य / फुनगियों पर लटके अहसासों को / नोचने लगता है "

सभी कविताएँ कवि की सोच , उसकी गहराई , उसकी संवेदनशीलता  को दर्शाती हैं जो कवी की सोच की ऊँचाई को दर्शाता है , जहाँ कवि निरपेक्ष सा होकर सारे परिदृश्यों को देखता है , महसूसता है और भी भावों की माला गूंथता है , यूं ही नहीं ये गहराइयाँ उतरा करती हैं समंदर के सीने में , एक खामोश ठहरे और शांत सागर में कितनी हलचल है , कितनी वेदना है , कितना समन्वयन है ये तभी जाना जा सकता है जब उसमे उतरा जाये , कुछ देर उसमे ठहरा जाए और फिर उसका मनन किया जाए।  एक बेहद उम्दा  रचनाओं से लबरेज कविता संग्रह में कवि की कविताओं ने चार चाँद लगा दिए हैं जिसे किसी समीक्षा की जरूरत नहीं , उसकी कवितायेँ ही उसकी पहचान हैं।  

मिलती हूँ अगले कवि के साथ जल्दी ही ……… 

शनिवार, 21 दिसंबर 2013

भूख भूख भूख ..............2

2
सबकी अपनी अपनी भूख है
फिर भूख जिस्म की ही क्यों ना हो
वहशीपने की ही क्यों ना हो
आत्मा को कुचलने की ही क्यों ना हो
भूख शांत नहीं होती
जितना बुझाओ उतनी जगती है
और इस ज्वाल को शांत करने के लिये
आज नहीं मिलता उदाहरण रावण से धैर्य का
फिर चाहे रिश्तों की मर्यादा ही क्यों ना लांघी जाये
फिर चाहे अपनों को ही क्यों ना शर्मसार किया जाये
भूख तो आखिर भूख है 
बिना भोजन कैसे शांत हो सकती है
खुराक तो सबके लिये जरूरी है
कौन सोचे मर्यादाओं के उल्लंघन के बारे में
क्या फ़र्क पडता है
सामने नर हो या मादा
सबका अपना ही इरादा
येन केन प्रकारेण भूख को शांत करना
भूख का दानव नहीं देखना चाहता किसी मर्यादा को
फिर चाहे उसके बाद जीवन ही होम हो जाये
क्योंकि
नहीं सिखा पाये भूख को सहना हम 
हमारे आचरण, हमारी नैतिकता 
महज़ कोरा भ्रम भर रहे 
और ढो रही हैं सदियाँ दंश को अनादिकाल से अनादिकाल तक
श्रापित हैं अहिल्या सी पत्थर बनकर जीने को 
फिर चाहे कारण कोई हो
तुलसी के शील भंग का 
चली आ रही परिपाटियों ने खाई को चौडा ही किया है कभी ना भरने के लिये 

क्रमश : ………………

बुधवार, 18 दिसंबर 2013

भूख भूख भूख ……1

1
भूख भूख भूख
एक शब्द भर नहीं
इसके कारण ही होते
दुनिया भर के अनर्थ
फिर चाहे सबके लिये हों
इसके अनेक अर्थ 

भूख 
पेट की हो 
तो हो जाती है
दो रोटी में भी शांत
फिर चाहे तुम उसे 
महज़ 26 रुपये में करो 
या दो रुपये में
क्या फ़र्क पडता है 
बस पेट का काम तो है
खुद को भरना किसी भी तरह
और इसके लिये जरूरी नहीं होता
किसी छोटी रेखा के आगे 
एक और बडी रेखा का खींचना

मगर भूख उस वक्त
सुरसा सी भयावह होती है
जहाँ इच्छाओं का काला लबादा ओढे
कोई साया सिर्फ़ टहलना भर नहीं चाहता
उसे चाहिये होता है 
पूरा का पूरा साम्राज्य 
उसे चाहिये होता है
पूरा का पूरा आसमान
पैर ज़मीन पर ना रखने की धुन में
आसमान में सुराख करने की चाहत में
खुद को सबका मालिक सिद्ध करने की भूख में
बिलबिलाता साया नहीं जान पाता 
कितनी चींटियाँ मसली गयीं उसके पाँव के नीचे
कितने रेंगते कीडे कुचले गये उसकी गाडी के नीचे
और खुद को खुदा बनाने की भूख 
अंतडियोँ मे इस कदर उबाल लेती है
कि मिट जाते हैं अन्तर गलत और सही के
और चल पडता है वो उस अन्धेरी गुफ़ा में
जहाँ रौशनी की दरकार नहीं होती 
होती है तो सिर्फ़ ………भूख 
खुद को पितामह सिद्ध करने की 
और ऐसी भूखों के अन्तिम छोर नहीं हुआ करते
फिर भी दलदल में धंस जाते हैं पाँव 
आँख होते हुये भी अंधा बनकर 
क्योंकि
भूख बडी चीज़ है ………सबसे ऊपर
फिर सत्तारूढ होने के लिये इतना जोखिम तो उठाना है पडता 
मगर इस सुरसा का पेट ना कभी है भरता



क्रमश: ……………

शनिवार, 14 दिसंबर 2013

पहाड़ के पक्ष में ………बालार्क का सौदर्य

बालार्क की पाँचवीं किरण :


सुशील कुमार किसी पहचान के मोहताज नहीं।  अपनी कविताओं में विशिष्टता देना ही उनकी मुख्य  पहचान है और इसी धर्म को उन्होंने अपनी कविताओं में निभाया तभी जमीनी हकीकतों से परे पहाड़ी कठिनाइयों पर कवि की दृष्टि पड़ती है तो कराह उठती है और इस प्रकार वेदना स्वर पाती है :

"पहाड़ी लड़कियां " जैसा नाम से ही स्पष्ट हो रहा है कि पहाड़ी जीवन यूँ भी आसान नहीं होता उस पर वहाँ की विषम परिस्थिति में कैसे पहाड़ी लड़कियाँ जीती हैं उसका बहुत ही सटीक चित्रण किया है।  एक तरफ वहाँ की उन्मुक्तता पहाड़ी स्त्री के जीवन की जीवंतता को चित्रित करती है तो दूसरी तरफ कठिन परिस्थितियों से लड़ती स्त्री की विषमता से भी जब दो चार होती है तब पहाड़ से नीचे आना उनकी मजबूरी होती है और उस मजबूरी का कैसे बिचौलिए फायदा उठाते हैं उसका मार्मिक चित्रण दर्शाता है कवि के संवेदनशील ह्रदय को ....... कवि का डर जायज है कि इस तरह तो पहाड़ों के साथ क्या इन उन्मुक्त चिड़ियों की चहचहाट भी एक दिन ख़त्म हो जायेगी एक ऐसी समस्या की तरफ ध्यान दे रहा है  जहाँ किसी की नज़र नहीं पड़ती :

"उनकी पत्थर सी काया को भी /कुचल रहे हैं जब तब / बिचौलिए महाजन, दिक्कु सब / वहाँ कब तक यूं ही अलापती रहेंगी/ भग्न होती ये ह्रदयकंठ -वीणाएँ ?

"पहाड़ी नदी के बारे में " कहते हुए एक तारतम्य बैठाया है कवि ने स्त्री के जीवन और नदी में, जो बह रही हैं युगों से और दे  रही है अपनी तकलीफों और दुखो की आहुति नदी के गर्भ में तब जाकर उसके सुन्दरतम स्वरुप का दर्शन होता है जहाँ प्रेम , वात्सल्य आकार पाते हैं. अपने दर्द को अपने ही मिटटी के सकोरों में भरकर जब पहाड़ी स्त्री चलती है तो उस पीड़ा को सिर्फ पहाड़ या नदी ही महसूस कर सकते हैं क्योंकि नदी सा जीवन चलने को इंगित करता है फिर चाहे कैसी ही विषम परिस्थिति हो और होठों पर मुस्कराहट तभी थिरकती है जब स्त्री अपनी पीड़ा को किसी अँधेरे कोटर में सुरक्षित रख आगे बढ़ती है। 

"हरिया पूछता है कब लौटोगी सुगनी परदेस से " के माध्यम से पहाड़ी लड़की का किसी शहर में ब्याह के चले जाने के बाद कैसा महसूस करते हैं पहाड़ पर रहने वाले उसका बहुत ही मार्मिक चित्रण है जिसमे यूँ लगता है जैसे अगर सुगनी है तभी पहाड़ जीवंत हैं , वहाँ जीवन है अगर वो नहीं तो कुछ नहीं  जैसे एक ख़ामोशी ने अपना डेरा डाला हो , जैसे जीवन उसी मोड़ पर रुक गया हो जहाँ से सुगनी या कहो कोई लड़की विदा होती है बस वहीँ ज़िन्दगी रुक गयी हो :

" पूरा पहाड़ , नदी , झरना , ताल तलैया / यानि कि तराई पर का पूरा गाओं ही / उजाड़ सा दीखता है तुम बिन / सब के सब तुम्हारे लौटने की / बाट जोह रहे हैं कब से। "

"ठूँठ होते पहाड़ " में पहाड़ के भविष्य पर कवि ने प्रहार किया है कैसे कुछ राजनीतिज्ञ अपनी राजनीती की रोटी सेंकने के लिए लोकलुभावन वायदे करके पहाड़ों पर अपने विषैले दांत गड़ाते हैं और पहाड़ी लोगों का जीवन , लुप्त होती उनकी जातियाँ , क्या इन में से किसी पर भी किसी की निगाह होती है या ये सब कोरे सब्ज़बाग हैं और पहाड़ के दर्द हमेशा की तरह अंतहीन ही हैं।  एक गहरा , करारा कटाक्ष और पीड़ा का चित्रण किया है :

" मैं ठिठकता हूँ / पहाड़ के पक्ष में बने / क़ानून की / धाराओं से और पूछता हूँ स्वयं से / कि वैन संरक्षण अधिनियमों के / दलदल में हांफते पहाड़ के / सुख , स्वप्न और भविष्य क्या हैं ?

कवि ने कविताओं के माध्यम से अपना कवि धर्म पूरी शिद्दत से निभाया है और इस तरह वर्णन किया है मानो सब सामने ही घटित हो रहा हो और यही किसी भी लेखक के लेखन की सबसे बड़ी कसौटी होता है कि दृश्य हो या पीड़ा उसे जीवंत  कर दे और उसे पूरा करने में कवि पूरी तरह से सक्षम हैं।  


मिलती हूँ अगली कड़ी में एक और कवि के साथ ……… 

सोमवार, 2 दिसंबर 2013

बालार्क की चौथी किरण और मेरी नज़र


बालार्क की चौथी किरण हैं सरस दरबारी जी :

एक ज़िन्दगी और उसकी धूप छाँव कैसे करवटें बदलती है सभी वाकिफ होते हैं।  लेकिन ज़िन्दगी में बहुत कुछ जो पीछे छूटा करता है वो हमेशा साथ साथ चलता है , वो हमेशा एक दखल दिया करता है ख्वाबों की दरगाह में तब समेटना चाहते है तो यूँ लगता है मानो कोई धूप को मुट्ठी में बंद करना चाहता हो।  कहीं बचपन के गलियारों में जब अल्हड़ता कुलांचे भरा करती थी तब भी एक सुखद अनुभूति दिया करती थी धूप की तपिश और आज वो ही एक सवाल बन जब खड़ी हो जाती है तो क्यों सहम जाती हैं हमारी आज़ादियाँ , क्यों खुलकर सांस नहीं ले पाते , क्यों घबराये सिमटे से अपनी खोलियों में दुबक जाते हैं क्यों नहीं कोशिश करते "आज़ादी की धूप" में कुछ पल बिताने की ………उबरना होगा अब इस मनोदशा से यही तो सन्देश दे रही है ये कविता :

"आओ , खुलकर फिर जी ले हम / सूरज को मुट्ठी में ले लें / आगे बढ़कर उस धूप  के हम  / तेवर से भी बाजी ले लें "

सिर्फ दो कविताएं "आज़ादी की धूप " और " लहरे " मगर समस्त भावों का समावेश कर दिया कवयित्री ने।  

लहरें के माध्यम से चार दृष्टिकोणों को छुआ है मानो ज़िन्दगी के हर परिदृश्य से पर्दा ही हटा दिया हो , मानो चुनौतियों के सागर में गोते लगाने पर कुछ ना मिलने पर उपजी हताशा अपने संस्कार पर खीज रही हो , मानो दो प्रेमियों का युगल स्वर मौन के गह्वर से बाहर निकल मुखर होने को प्रयासरत हो , मानो ज़िन्दगी की भयावहता जब नकाब ओढ़ कर दस्तक देती हो तब किसी लोकोक्ति का स्वर रक्तरंजित हुआ हो।  कुछ ऐसे ही भावों को समेटे जब ज़िन्दगी के सागर में अनजान लहरे दस्तक देती हैं तो कहीं वो खुद नेस्तनाबूद होती हैं तो कहीं अभिशापित सी सिसकती हैं तो कहीं सपनों के महलों में ज़िद के आशियाने ढूंढती हैं सिर्फ अपने अस्तित्व को बचाने और पूर्ण रूपेण जीने की जद्दोजहद में।  मगर लहर का जीवन ही क्या और कितना सा मगर उसमे भी एक पूरा जीवन जीने की चाहत में किनारों से टकराती हैं , सागर के सीने पर सर पटकती हैं मगर अपने सपनों , अपनी हसरतों को पाने की ज़िद नहीं छोड़तीं फिर चाहे उसके लिए खुद के अस्तित्व को ही क्यों ना मिटाना पड़े।  यही तो इंसानी जिजीविषा है जो उसे ज़िन्दगी को हर हाल में जीने को प्रेरित करती है जिसकी बानगी इन कुछ पंक्तियों में देखिये : 

" कभी शोर सुना है लहरों का ..../दो छोटी छोटी लहरें -/हाथों में हाथ डाले -/ज्यूँ ही सागर से दूर जाने की /कोशिश करती हैं-/गरजती हुयी बड़ी लहरें / उनका पीछा करती हुयी / दौड़ी आती हैं / और उन्हें नेस्तनाबूत कर / लौट जाती हैं / बस किनारे पर रह जाते हैं / सपने/ख्वाहिशें/और ज़िद / साथ रहने की / फेन की शक्ल में "

आज जो हो रहा है जिससे आज हर अभिभावक डर रहा है , सहमा हुआ है , सो नहीं पाता , चिंतामुक्त हो नहीं पाता उस वातावरण की भयावहता उसे हर पल कैसे डंसती है और उसके परिणाम कैसे कलंकित करते हैं उसका चित्रण लहरों के माध्यम से करना आसान नहीं था यूँ लगा जैसे कवयित्री सागर के किनारे बैठी हो और हर आती जाती लहर उससे बतिया रही हो जीवन की विभिन्न  विभीषिकाओं को जैसे आईना दिखा रही हो तभी तो जो आज हर माँ बाप की चिंता है उसका इतना सटीक चित्रण कर पायी हैं :

"कभी कभी लहरें -/अल्हड़ युवतियों सी /एक स्वछन्द वातावरण में /विचरने निकल पड़तीं हैं ---/घर से दूर -/एल अनजान छोर पर !/तभी बड़ी लहरें /माता पिता की चिंताएं -/पुकारती हुई /बढ़ती आती हैं .../देखना बच्चों संभलकर /यह दुनिया बहुत बुरी है /कहीं खो न जाना /अपना ख़याल रखना -/लगभग चीखती हुई सी /वह बड़ी लहर उनके पीछे पीछे भागती है .../लेकिन तब तक -/किनारे की रेत -/सोख चुकी होती है उन्हें -/बस रह जाते हैं कुछ फेनिल अवशेष /यादें बन ...../आंसू बन ....../तथाकथित कलंक बन ....!!!!! "


यूं ही तो नहीं बना होगा ये रिश्ता लहरों से , कोई तो गीत गुनगुनाया होगा लहरों ने ,यूँ  ही नहीं अहसास बुलंद हुए होंगे।यूं ही नहीं दर्द के छींटे उड़े होंगे  क्योंकि कुछ भी कहने से पहले खुद वो हो जाना पड़ता है , उस अहसास से गुजरना पड़ता है तभी भावनाओं का सागर उमड़ा करता है और कवयित्री उन भावों को पकड़ने और जीवन दर्शन बयाँ करने में सक्षम रही हैं इसलिए बधाई की पात्र हैं।  

अगली कड़ी में मिलते हैं एक नए कवि से  ………।