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मंगलवार, 19 नवंबर 2019

ऐसा तो न था कभी देश मेरा....

क्या बना रहे हो क्या बन रहे हैं
क्या दिखा रहे हो क्या दिख रहे हैं
तानाशाहों के राज में समीकरण बदल रहे हैं

कभी धर्म कभी जाति
कभी शिक्षा तो कभी मंदिर मस्जिद
के नाम पर
हंगामों आंदोलनों के शोर
सहमा रहे हैं भविष्य

तो क्या
आने वाली पीढ़ी सीख रही है
अपनी रीढ़ कैसे है सीधी करना?

रोते हुए कहता है अंतर्मन मेरा
ऐसा तो न था कभी देश मेरा....

गुरुवार, 7 नवंबर 2019

दिल माँ का किसी को समझ आता नहीं

दिल माँ का किसी को समझ आता नहीं
फूल कौन सा है जो अंत में मुरझाता नहीं
वो देगी बद्दुआ तो भी दुआ बन जायेगी
इतनी सी बात कोई उसे समझाता नहीं

तेरे गुस्से पर भी उसे गुस्सा आता नहीं
मगर तेरा बचपना है कि जाता नहीं
तेरे दर्द से पिघलती है जो दिन-ब-दिन
उसकी हूक का मर्म तुझे समझ आता नहीं

तू लेने हाल माँ का कभी आता नहीं
उसके क़दमों तले जन्नत है जान पाता नहीं
वो आईना है तेरे आने वाले कल का
अभिमानी मगर कल अपना संवार पाता नहीं