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शनिवार, 26 अगस्त 2017

इक गमगीन सुबह

इक गमगीन सुबह के पहरुए
करते हैं सावधान की मुद्रा में
साष्टांग दंडवत
कि
वक्त की चाबी है उनके हाथों में
तो अकेली लकीरें भला किस दम पर भरें श्वांस


ये अनारकली को एक बार फिर दीवार में चिने जाने का वक्त है

रविवार, 13 अगस्त 2017

बच्चे सो रहे हैं

बच्चे सो रहे हैं
माँ अंतिम लोरी सुना रही है

मत ले जाओ मेरे लाल को
वो सो रहा है
चिल्ला रही है , गिडगिडा रही है , बिलबिला रही है

उसके कपडे, खिलौने , सामान संवार रही है
सोकर उठेगा उसका लाल
तब सजाएगी संवारेगी
मत करो तुम हाहाकार
कह, समझा रही है

सुनिए ये सदमा नहीं है
हकीकत है
दर्द है
बेबसी है
हकीकत को झुठलाने की

क्योंकि
मौत तो एक दिन आनी ही होती है , आ गयी
जान जानी ही होती है , चली गयी
कर्णधारों के कान पर जूँ नहीं रेंगनी होती, नहीं रेंगी

फिर नाहक शोर मचाते हो
एक माँ रो रही है , रोने दो उसे
मनाने दो मातम उसे
उम्र भर के लिए
कि
बच्चों की बारात जो निकली है

ये माओं के सम्मिलित रुदन की घड़ी है
जाने क्यों फिर भी
आसमां नहीं फटा
खुदा भी नहीं रोया आज

शायद माओं से डर गया
गर दे दिया श्राप तो?

शायद इसीलिए
अब कंसों से मुक्ति के लिए नहीं जन्म लेते कन्हाई ...

शनिवार, 5 अगस्त 2017

ये बेहया बेशर्म औरतों का ज़माना है

कल तक बात की जाती थी फलानी को पुरस्कार मिला तो वो पुरस्कार देने वाले के साथ सोयी होगी .....आज जब किसी फलाने को मिला तो कहा जा रहा है उसे तब मिला जब वो देने वाली के साथ सोया होगा ........ये किस तरफ धकेला जा रहा है साहित्य को ? क्या एक स्त्री को कभी सेक्स से अलग कर देखा ही नहीं जा सकता? क्या स्त्री सिवाय सेक्स मटेरियल के और कुछ नहीं ? और तब कहते हैं खुद को साहित्य के खैर ख्वाह......अरे बात करनी थी किसी को भी तो सिर्फ कविता पर करते लेकिन स्त्री को निशाना बनाकर अपनी कुत्सित मानसिकता के कौन से झंडे गाड़ रहे हैं ये लोग?

छि: , धिक्कार है ऐसी जड़ सोच के पुरोधाओं पर ......जाने अपने घर की औरतों को किस दृष्टि से देखते होंगे और उनके साथ क्या व्यवहार करते होंगा......स्त्री सिर्फ जंघा के बीच आने वाला सामान नहीं ......किसी को भी किसी भी स्त्री का अपमान करने का अधिकार नहीं मिलता.......जब भी बात करिए उसके लेखन की करिए , उसके निर्णय की करिए न कि उस पर आक्षेप लगाइए ......वर्ना एक दिन यही स्त्रियाँ एकत्र हो कर देंगी तुम्हें साहित्य से निष्कासित .....फिर कोई कितना भी बड़ा साहित्य का दरोगा ही क्यों न हो .......अब समय आ गया है सबको एकत्र हो इसी तरह हर कुंठित मानसिकता को जवाब देने का ....

साहेब
ये बेहया बेशर्म औरतों का ज़माना है
जो नहीं आतीं जंघा के नीचे
फिसल जाती हैं मछली सी
तुम्हारी सोच के दायरे से

बेशक नवाज़ दो तुम उन्हें
अपनी कुंठित सोच के तमगों से
उनकी बुलंद सोच
बुलंद आवाज़
कर ही देगी खारिज तुम्हें
न केवल साहित्य से
बल्कि तुम्हें तुम्हारी नज़र से भी

ये आज की स्त्रियाँ हैं
जो नहीं करवातीं अब चीरहरण शब्दों से भी
और तुम तुले हो
एक बार फिर द्रौपदी बनाने पर
संभल कर रहना
निकल पड़ी है
बेहयाओं की फ़ौज लेकर झंडा
अपनी खुदमुख्तारी का

सुनो
बेहया शब्द तुम्हारी सोच का पर्याय है
स्त्री की नहीं
वो कल भी हयादार थी , आज भी है और कल भी रहेगी
बस तुम सोचो
कैसे खुद को बचा सकोगे कुंठा के कुएं में डूबने से
कि फिर अपना चेहरा ही न पहचान सको

सुनो
मर्यादा का घूँघट इस बार डाल कर ही रहेंगी ये स्त्रियाँ ...तुम्हारी जुबान पर
 
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©वन्दना गुप्ता vandana gupta