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मंगलवार, 29 सितंबर 2015

अर्थहीन है वो ............

जब तक बुहारती रही आँगन
मिटाती रही सिलवटें
घर, बाज़ार
स्कूल ,डॉक्टर
से लेकर दुनियावी पहलुओं तक
उगाती रही कोशिशों के चिनार
खुद को मिटा सजाती रही तुम्हारी बज़्म
बा -अदब बा - मुलाहिजा होशियार की टंकार
और सिर झुकाने के अदबी रिवाजों के साथ
प्रिय थी शायद
या फिर स्वीकार था इतना होना भर उसका

समय समेट ही लेता है खुद में
धन रूप और यौवन को भी
ऐसे अंधेरों में घिरने पर
सूख जाती हैं शाखाएं
झरने लगते हैं पत्ते
शिथिल होने लगते हैं अंग
चूलों के हिलने से
हिलने लगती है जब इमारत
और फिर ऐसे नाज़ुक वक्त में
नकारा जाने लगता है अस्तित्व
आखिर बेजारियों की तीमारदारी कोई क्यूँ करे ?

पालने में झूलने के दिन तो
वैसे भी नसीब की क्यारियों में नहीं उगा करते
लेकिन तब भी
उम्मीद की क्यारी में जवां रहता है एक ख्वाब
शायद कभी खिल जाए ये जवाकुसुम
और हो जाये वो निहाल

ख्वाब ख्वाब ही होते हैं .......हकीकत नहीं
वाकफियत करा दी जाती है
जब हकीकत की तस्वीर उसे दिखाई जाती है
हाँ , अनुपयोगी हो अब तुम
खाना पीना और दंगडाना भर है तुम्हारा काम
जो नहीं है अब हमें स्वीकार

और रह जाती है वो हतप्रभ
हो जाती है सोचने को मजबूर
आखिर क्या है कारण
जो हो गयी यूं निष्कासित

क्या यही है एकमात्र कारण
उसके अस्तित्व को नकारे जाने का
कि ' हाउसवाइफ ' है वो
जिसका जिसकी उपयोगिता तक ही होता है , होना 


अर्थ बिना अर्थहीन है वो .............

रविवार, 20 सितंबर 2015

मोहब्बत के हरम

वो कहते हैं
दिल के जंगल में
फूल खिले
गर मोहब्बत का कोई
तो शायद हो जाये हरा

और हम
यूँ वीरानों के अदब से वाकिफ हैं
जाने फिर भी कैसे
खामोशियों के जंगल से मोहब्बत कर बैठे

अब
अपने अपने जंगल के बादशाह
ढूंढ रहे हैं अपनी अपनी मेहरूनिसा

ये मोहब्बत के हरम हमेशा सूने ही क्यों होते हैं 
और प्यास के पनघट हमेशा प्यासे 
खोज में हैं 
एक अरसे से दोनों ही ..........


गुरुवार, 17 सितंबर 2015

ईर्ष्या

क्या फर्क पड़ता है
मैं स्त्री हूँ या पुरुष
मानव सुलभ इर्ष्याओं से तो ग्रस्त रहता ही हूँ

पड़ जाता हूँ हैरत में
अपने समकालीनों को देख
नहीं स्वीकार पाता उनका बढ़ता वैभव
आखिर कैसे संभव है
कम समय में बुलंदियों को छूना
हमने क्या महज घास की खोदी है एक अरसे से
जो कल के आये
तरेरते हैं आँखें
करते हैं जुबाँ बंद अच्छे अच्छे लिक्खाडों की

न न यूं तो अपने वर्चस्व पर
लग जाएगा ग्रहण
ज्यों हम यूं तरजीह देते रहे
और वाह वाह का छौंक
उनके लेखन में देते रहे

बदलनी होगी तस्वीर
खुद को बचाने की जद्दोजहद में
खींचनी ही होगी एक लकीर
उनके और अपने बीच
ताकि तहजीब के फासलों पर
बची रहे कुछ इज्जत

यूं भी
फिर क्या बचेगा हमारे पास
कर दिए जायेंगे दरकिनार जब
इसलिए सोचा है
अपनी इर्ष्या को स्नेहमिश्रित चाशनी में डुबाकर
भले ही ऊपर से ही सही
करने ही होंगे थोड़े बहुत गुणगान
मगर
आलोचना के सम्पुट लगाकर
ताकि
बचा रहे लोकतंत्र लेखन में हमारा भी

ये आज के वक्त की
आज के लेखन की राजनीति है
फिर भला कैसे अछूते रह सकते हैं हम 


जानते हो 
मुख पर मुस्कान का खोल ओढना 
वाहवाही की झांझर झंकाना 
सच पर हैरिसन ताले लगाकर रखना
और अन्दर ही अन्दर ईर्ष्या को सहेजना भी एक कला है 

क्या आती है तुम्हें ?

गुरुवार, 10 सितंबर 2015

घोर संघर्ष काल है

घोर संघर्ष काल है
नहीं पता
हिन्दी का या हिन्दी के साहित्यकारों का
या फिर दोनों का
क्योंकि
मौज तो राजनीतिज्ञों की है
या चाटुकारों की

हिंदी की बाँह कौन पकड़ता है
सबको बस अपना मकसद ही दिखता है
वो तो कल भी अवांछित थी
आज भी है और कल भी रहेगी
क्योंकि
जो राजभाषा से राष्ट्रभाषा तक का सफ़र तय न कर पायी
या कहिये
जिसे ये सफ़र तय नहीं करने दिया गया
उस हिन्दी का भी भला कोई उज्जवल भविष्य हुआ

आओ शंख ध्वनि करो
आओ उद्घोष करो
आओ अपना परचम फहराओ
कि
हमने तय कर ली है एक और दूरी
तो क्या हुआ जो
चार दिन में चार कोस ही चले हों

बस इतना सा ही तो है मकसद
विश्व पटल पर लगा कर बिंदी
हमने अपना परचम फहरा दिया
हिन्दी का नाम बढ़ा दिया
अब गर्व से कहो
जय हिन्दी जय भारत

विश्व हिंदी सम्मलेन में शामिल होना खाला जी का घर नहीं जनाब

( सन्दर्भ : १० वां विश्व हिंदी सम्मलेन )

गुरुवार, 3 सितंबर 2015

' मुँह काला होना '

कितनी उठापटक है
फिर वो साहित्य हो , समाज , राजनीति या रिश्ते

कितने विषय बिखरे पड़े हैं
एक अराजकता सिर उठाये खड़ी है 
मगर मेरी साँसों में 
मेरे दिल में 
मेरे दिमाग में 
मेरी सोच में 
मेरे विचार में 
निष्क्रियता के परमाणु बिखरे पड़े हैं
आहत हैं इतने कि 
प्रतिकार भी नहीं करते और स्वीकार भी नहीं

विस्फोटक समय है ये 
जहाँ आंतरिक उथल पुथल शब्दहीन है
फिर मर्यादाओं के शिखरों का ढहना कोई आश्चर्य नहीं

' मुँह काला होना ' श्रृंगार है आज के समय का ..........