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रविवार, 28 जून 2015

कौन कहता है अच्छे दिन नहीं आये

कौन कहता है 
अच्छे दिन नहीं आये 
देखिये तो ज़रा 
कितने अच्छे दिन आ गए 

चोर उच्चक्के सब बिलों में दुबक गए 
चोरी डाके सब बंद हो गए 
लूटपाट सीनाजोरी का बाजार नर्म हो गया 
झूठ मक्कारी दगाबाजी जाने कहाँ सो गए 
बलात्कार के किस्से तो बस स्वप्न हो गए 
खाप हो या आप हो सबकी जुबानों पर ताले लग गए

कैसी कायापलट हो गयी 
राम और अल्लाह की नज़र एक हो गयी 
चारों तरफ देखो तो 
रामराज्य की तूती बोल गयी 

अब थानों में केस दिखाई नहीं देते 
अदालतों में मुलजिमों के शोर सुनाई नहीं देते 
बकरी और शेर एक घाट पर पीते पानी हैं 
यही तो भैया अच्छे दिनों की निशानी हैं 

न यहाँ बाढ़ आती है 
न भूकंप 
और न ही कोई त्रासदी 
किसान आत्महत्या एक जुमला भर रह गया है 
देखो तो जरा मेरा मुल्क कैसे संवर गया है 
और ये सब यूँ ही नहीं हो गया है 
ये सब नसीबवालों के नसीब का ही तो बोलबाला है 

वो मन की बात कहते हैं 
और सब मन से सुन लेते हैं 
वो योगा करवाते हैं 
विश्व में नाम कमाते हैं 
ये सब काम ऐसे ही नहीं हो जाते हैं 
अच्छे दिनों की आमद ऐसे ही होती है 
जुबानी जमा खर्च पर ही तो सत्ता चला करती है 

तभी तो देखो जरा
कितना सुशासन आ गया है 
कहीं भैंस तो कहीं मुर्गी ढूँढने का काम 
ही तो पुलिस का रह गया है 
देखा 
सरहद पर 
चारों तरफ कितनी अमन शांति व्याप्त है 
उग्रवादी आतंकवादी बस शब्द भर रह गए हैं 

वो जानते हैं 
कैसे नाम कमाना है 
विश्व भ्रमण कर विश्व में डंका बजवाना है 
तभी तो ख्वाब में ही सही मेरा भारत विश्वशक्ति बन गया है 

मन की बात कहने से ही तो 
अच्छे दिनों की आमद होती है 
तो मान जाओ भैया 
ये सब अच्छे दिनों का तोहफा है 
जो नसीबवालों के नसीब से ही होता है 

गुरुवार, 25 जून 2015

पहली बरसात में


ऊँहूँ ......नहीं कह सकती 
(तेरा नाम गुनगुना रही हूँ मैं .........यादों की छुअन से गुजरे जा रही हूँ मैं )

ए 
पहली बरसात से कहो न 
यूँ जेहन की कुण्डियाँ न खडकाया करे 
अब यहाँ थाप पर प्रतिध्वनियाँ नहीं हुआ करतीं 
क्यूंकि 
पहली बरसात हो और कोई इश्क में भीगा न हो 
तो 
रूह के छालों पर सारे ज़माने का चंदन लगा लेना 
फफोले तो पड़ कर ही रहेंगे 
ज़ख्म तो रिस कर ही रहेंगे 

क्योंकि यहाँ तो 
पहली बरसात में भीगने का शगल 
जाने कब चौखट लाँघ गया 

सुना है 
तन से ज्यादा तो 
मन भीगा करता है 
जब उमंगों का सावन बरसता है 
मगर जरूरी तो नहीं न 
उमंगों की मछलियों का सुनहरी होना 
हर बरसात में ........

एक अरसा बीता 
तो कभी कभी लगता है 
एक युग ही बदल चुका

मगर मन का कोहबर है कि खुलता ही नहीं ..........

सोमवार, 22 जून 2015

अभी बहुत दूर है दिन



रात्रि और सूर्योदय के मध्य की बेला में भी 
खिल जाया करते हैं जवाकुसुम 
गर हसरतों के ताजमहल पर 
जला दे कोई एक दिया 

भोर के तारे सी किस्मत 
अभिमंत्रित नहीं होती 
जो चाहतों के सोपानों तक ही सिमट जाए ज़िन्दगी 

यहाँ अँधियारा हो 
ऐसा भी नहीं है 
मगर फिर भी 
अभी बहुत दूर है दिन .............

गुरुवार, 18 जून 2015

'कल किसने देखा '

ये जानते हुए भी 
कि अनिश्चित है भविष्य 
डर का बायस बन जाता है 

'कल किसने देखा '
महज जुमला भर ही साबित होता है 

भविष्य की अज्ञानता 
बिछुओं के डंक सी 
लील लेती है ज्ञान के सारे प्रपत्र 
और पूरा जीवन बीत जाता है 
महज डर की कंदराओं में भटकते 

ओ आड़ी टेढ़ी रेखाएं खींच 
चक्रव्यूह रचने वाले 
अनिश्चितता के बादलों पर 
डर की संज्ञाएँ लिपिबद्ध कर 
कहो तो कौन से महाकाव्य का निर्माण किया ?


पग घुँघरू बाँध मीरा नाची रे 
और देखो 
यहाँ किसी के भी पाँव में घुँघरू नहीं फिर भी नाच रहे हैं सभी  ........

शुक्रवार, 5 जून 2015

प्रधानमंत्री बीमा योजना........तेरा ही चून तेरा ही पुन

प्रधानमंत्री बीमा योजना तो लगता है काफी कारगर रहेगी .

वो कैसे ?

देखो १८ साल से ७०  साल तक के लोग इसका फायदा उठा सकते हैं तो सभी दौड़ लगा रहे हैं बैंक की तरफ और करा रहे हैं १२ रूपये में अपना बीमा जिसका फायदा बीमा कंपनी को ही तो होगा न तो हो गयी न कारगर और सब सरकार के गुण गायेंगे ये सरकार तो बहुत अच्छी है सबका बीमा करवा दिया तो एक पंथ दो काज निबटाये जा रहे हैं .

अच्छा , लेकिन खुलकर बताओ  कैसे कारगर होगी ?

देखो , ७० साल कि उम्र तक ही मरना पड़ेगा क्योंकि उसके बाद मरे तो पीछे वालों को कुछ नहीं मिलेगा और बेकार में आपके १२ रूपये भी मोरी में चले जायेंगे .

वो कैसे भाई ?

वो ऐसे कि एक तो हर साल १२ रुपये जमा कराओ उस पर  १२ रूपये में से ११ तो जो बीमा कम्पनी है वो ले जायेगी बचा एक रुपया उस बैंक को जाएगा जहाँ तुमने अकाउंट खोला है और बीमा कराया है तो तुम्हें क्या मिलेगा बाबाजी का ठुल्लू !

तो तुम्हारा कहने का मतलब है ७० से पहले मरने पर ही बीमित राशी मिलेगी मगर कोई कैसे अनुमान लगा सकता है कि वो कब मरेगा .........आखिर मृत्यु के बारे में कैसे जानें कोई उपाय हो तो बताओ भाई .

तो सुनो एक ही आखिरी उपाय बचता है , किसी प्रकांड ज्योतिषी की शरण में चले जाओ , जो लाल किताब का सम्पूर्ण ज्ञाता हो तो फिर अक्षरक्षः सही उम्र का पता चल जाएगा फिर सोच समझ कर बीमा करवाना बेकार में विदेशियों का पेट हम क्यों भरें यहाँ तो अपने खाने के लाले पड़े हुए हैं वहां वो उनका पेट भरने में लगे हैं .

बात तो तुम्हारी सही है मगर ये तो बताओ उसे खोजें कहाँ और मान लो मिल भी गया तो जितना बड़ा नाम होगा उसका उतना ही बड़ा दाम होगा ?

हाँ वो तो होगा ही मगर उसमे तुम्हें परेशानी क्या है ?

अरे भाई , यदि उसने बताया जल्दी मरोगे अर्थात ७० से पहले तब तो सही है मगर उसके बाद मरोगे तो मेरे तो जीते जी ही मेरा पैसा मिटटी हो जाएगा और उस ज्योतिषी की जेब में चला जाएगा. फिर उसकी फीस भी तो कितनी मोटी होगी क्या पता ? अब १२ रूपये से कम तो होगी नहीं न जो ये रिस्क उठाऊँ ? 

बात तो पते की कही तुमने मगर सोचो जरा इसमें देश का पैसा देश में रहेगा जबकि वहां तो विदेशी के हाथों चला जाएगा . सोचो जरा यहाँ तो वैसे ही प्रधानमंत्री ने जन धन योजना के जरिये सभी का अकाउंट खुलवा दिया है तो करोड़ों अकाउंट खुल चुके हैं ऐसे में ११ से गुना करोगे तो कितने अरबों रुपया तो उनके खाते में चला ही गया एडवांस में और करोड़ों रुपया १ रूपये के हिसाब से बैंक के खाते में चलो बैंक के खाते में जाए तो कोई नहीं कम से कम अपने देश में तो है लेकिन बाकि का सोचो वो तो गया न १२ के भाव . फिर यदि कोई मरता भी है तो सौ कानूनी लफड़े , सौ पेंच इसी में उलझा रहेगा और जब तक ये जंग जीतेगा उतना पैसा तो लगा चूका होगा बीमित राशी  पाने में तो क्या फायदा होगा उससे तो अच्छा है भैये एक बार बड़े ज्योतिष के पास जाकर सुनिश्चित कर लेना कम से कम तसल्ली तो रहेगी जो राशी लगायी है वो मयसूद वापस मिल जाएगी . सिर्फ विदेशी बीमा कंपनी को ही फायदा नहीं होना चाहिए बल्कि अपना भी हो तब तो फायदा है वर्ना तो मुफ्त में भी नुक्सान कोई क्यूँ उठाये भला . हमारे १२ रूपये कोई फ़ालतू के थोड़े हैं जो यूँ ही बीमा करवाते रहे और बाद में खाली हाथ रहे . 

अरे भाई ऐसा तो मैंने सोचा ही नहीं था , तुम तो बहुत होशियार हो जो मेरी आँखें खोल दीं अब तो इसका प्रचार प्रसार रेडियो टीवी अखबार आदि में होना चाहिए ताकि समय रहते सबको चेताया जा सके . यूँ ही नहीं कोई अपने पैसे का दुरूपयोग होने दे . 

हाँ हाँ जल्दी करो ऐसा ही 

मगर एक बात बताओ भाई यदि भविष्यवाणी फेल हो गयी तो ?

तो भी क्या कौन सी सभी भविष्यवाणियाँ फेल होती हैं कोई इक्का दुक्का होगी भी तो भी भला तो देश के लोगों का ही होगा न , उनका इन्वेस्टमेंट मिटटी के भाव तो नहीं जाएगा , अब इतना रिस्क तो उठाना ही पड़ेगा . ज्योतिषियों की भविष्यवाणी कोई मौसम विभाग थोड़े हैं जो हर भविष्यवाणी फेल हो . सोचो भला यदि इनकी सभी भविष्यवाणी यदि फेल होतीं तो इनका धंधा बताओ कैसे चलता . अरे भाई इनकी तो रोजी रोटी है तो आकलन ज्यादातर सही ही उतरते हैं और फिर कहते हैं जहाँ सबका भला हो रहा हो तो एक की कुर्बानी दी जा सकती है तो फिर भैये निकल पड़ो इस अभियान पर , अब सोचना क्या . आखिर देश की बात है और तुम ठहरे राष्ट्रप्रेमी . कैसे देश हित की नहीं सोचोगे और देशहित में कैसे नहीं कदम उठाओगे . आखिर देश की नाक का सवाल है क्योंकि वो तो विदेशियों पर देश से ज्यादा भरोसा करते हैं तो क्या तुम अपने देश के लिए अपनों पर भरोसा नहीं कर सकते ? आखिर ये हमारे रुपये की इज्जत का सवाल है . तुम्हें उसकी नाक बचानी होगी अपनी पूँजी वापस लानी होगी और उसके लिए कुछ तो कुर्बानी सभी को देनी पड़ती हैं यदि तुम भी दे दोगे तो नाम इतिहास में अमर हो जाएगा . वो देखो 'प्रधानमंत्री बीमा योजना का नया पहलू दिखाने वाला है वो' चलो उसे सलाम ठोको , फिर देखना कैसे फर्शी सलाम ठोकेगी दुनिया तुम्हारे आगे .देखना कैसे जीरो से एक दिन में हीरो बन जाओगे , हर टीवी चैनल पर तुम ही तुम छाओगे , हर अखबार के पहले पेज पर तुम्हारी ही तस्वीर होगी साथ ही साथ इससे ज्योतिषियों की भी निकल पड़ेगी . 

और गज्जू भविष्य के ख्वाब गुनता चल पड़ा मिशन पर ..........

ये है मेरा हिंदुस्तान जिसे जहाँ चाहे जैसे चाहे जो चाहे जब चाहे घुमा दे और घूमने वाले को पता ही न चले आखिर उसके साथ हुआ क्या है .बस कान हाथ घुमाकर पकड़ा दिया जाता है तो भी किसी को कुछ समझ नहीं आता है .तेरा ही चून तेरा ही पुन वाला मुहावरा शायद ऐसे ही लोगों के लिए बना है . 



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