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शनिवार, 24 अक्टूबर 2015

भारतकोश पर

अभी अभी प्राप्त सूचना के अनुसार , ' भारतकोश ' पर मुझे और मेरी रचनाओं को भी जगह मिली है जिसके लिए मैं रश्मि प्रभा दी और भारतकोश के संचालक आदित्य चौधरी जी और आशा चौधरी जी की तहे दिल से शुक्रगुजार हूँ . 

मित्रों यहाँ मेरी अध्यात्म और दर्शन से जुडी रचनाएँ आपको पढने को मिलेंगी 

जहाँ मेरे अलावा भारतीय अध्यात्म से सम्बंधित आदिकाल से लेकर आधुनिक कवियों को भी आप पढ़ सकते हैं .

http://hi.bharatdiscovery.org/india/%E0%A4%B5%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A4%BE_%E0%A4%97%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE

गुरुवार, 22 अक्टूबर 2015

जरा सोचिये ............



जरा सोचिये ............
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धर्म निरपेक्ष देश होते हुए धार्मिक असहिक्ष्णुता का माहौल अचानक से बन जाना एक संदेह को जन्म देता है . पिछले डेढ़ साल में ऐसा क्या हुआ जो अचानक हर जगह सिर्फ हिन्दू मुस्लिम में बांटा जा रहा है जनता को ? उससे पहले इतनी शांति थी कि कोई सोच भी नहीं सकता था कि यहाँ हिन्दू और मुस्लिम दो कम्युनिटी रहती हैं . यहाँ तक कि जब बाबरी मस्जिद पर फैसला आया था तो लगता था जाने कितना बड़ा बवाल हो जाएगा देश में लेकिन दोनों ही धर्मों के लोगों ने उसका ने केवल स्वागत किया बल्कि भाईचारे और धैर्य का भी परिचय दिया . फिर अचानक से ऐसा क्या हुआ जो आज ऐसा माहौल बन गया है कि देश सिवाय इस मुद्दे के और कोई मुद्दा ही नहीं बचा ?

ये बात सोचने वाली है आखिर क्यों कभी मुजफ्फरपुर कभी दादरी में दंगे होते हैं तो कभी कलबुर्गी , पंसारे आदि की हत्या ? क्या अब लोग असहिष्णु हो गए हैं ? क्या अब अचानक उनमे अपने धर्म के प्रति ज्यादा मोह उत्पन्न हो गया है ? या आज ही ज्यादा धार्मिक हो गए हैं ?

लोगों से बात करो तो वो कहते हैं सब राजनीति है . आम इंसान ऐसा कुछ नहीं चाहता . दोनों ही अमनोचैन से रहें बस यही चाहते हैं तो क्या उनका कहना सही है ? क्या सिर्फ सियासत की बिसात बिछाने को इतनी घिनौनी चालें खेली जा रही हैं जिनमे आम आदमी मोहरे बना हुआ है ? उसकी जान के कीमत पर इतनी घटिया चाल चलना क्या शोभा देता है ?

अगर राजनीति भी है तो प्रश्न उठता है कौन करा रहा है ये सब ? पक्ष विपक्ष एक दुसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगा रहे हैं . कांग्रेस कहती है बीजेपी और संघ के इशारे पर हो रहा है और वो कहते हैं कांग्रेस के . तो सुनने के बाद लगता है कहीं न कहीं कोई न कोई पार्टी तो ऐसा कर ही रही है जो नहीं चाहती देश में अमन रहे जनता खुशहाल रहे . बात फिर वहीँ आती है घूमफिरकर कि क्या मोदी के आने से ऐसा हुआ या उन्हें फ्रेम किया जा रहा है क्योंकि उनके नाम के साथ गोधरा काण्ड चिपका हुआ है . साथ ही जिस तेजी से वो विकास के रास्ते देश के लिए बना रहे हैं , सभी देशों से मिलकर भारत का नाम सारे संसार में ऊंचा करने में लगे हैं , ये देख कुछ राजनैतिक पार्टियों को सोचना पड़ गया कि यदि ये इन पांच सालों के बाद अगले पांच साल भी रह गया तो हमारा तो कोई नामलेवा भी नहीं रहेगा इसलिए और कुछ नहीं तो इसी आग को फैलाया जाए क्योंकि किसी भी देश या व्यक्ति को खोखला करने के लिए धार्मिक असहिष्णुता का माहौल बनाना सबसे आसान है और उस पर अपनी राजनीति की रोटियां सेंकना और भी आसान .

दूसरी तरफ ये भी नहीं कहा जा सकता कि जो सत्ता में काबिज हैं वो पूरी तरह दूध के धुले हैं . अब दाग तो दाग है और लगा भी है कोई दोषी मानता है कोई निर्दोष ऐसे में ऊंगली उन पर भी उठती है साथ ही संघ पर भी . शायद देश को सिर्फ हिन्दू राष्ट्र बनाने की मुहीम की ओर अग्रसर हों ये पार्टियाँ या फिर सिर्फ चुनाव जितने के लिए करवाए जा रहे उपद्रव हों .............मगर चाहे जो हो , चाहे पक्ष का हाथ हो या विपक्ष का मगर उसमे नुक्सान आम आदमी का हो रहा है . वो समझ नहीं पा रहा ऐसे में कौन सही है और कौन गलत यहाँ तक कि इस विरोध में जब साहित्यकारों का एक धडा शामिल हो गया तो वो भी आरोपों की राजनीति से मुक्त न रह सका जबकि साहित्यकार अपने समय को रचता है तो अपनी तरह विरोध करने का भी हकदार है कोई कलम से करता है तो कोई पुरस्कार वापसी से तो ऐसे में उन पर ही तोहमतों की राजनीति खेली जा रही है जो किसी भी दृष्टिकोण से सही नहीं है . साहित्यकार सिर्फ इतना चाहता है कि उसे देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मिले और यदि उस स्वतंत्रता पर उसका ही क़त्ल होने लगे तो विरोध लाजिमी है क्योंकि साहित्यकार न हिन्दू होता है न मुस्लिम वो समाज का आइना होता है जो देखता है वो ही उसकी कलम लिखती है , इंसान है तो आहत भी होता है जब अति होने लगती है तो कैसे खुद को सिर्फ अपने लेखन तक ही सिमित रख सकता है और जब विरोध करने लगता है तो उस पर भी आरोप प्रत्यारोप लगने लगते हैं कि ये फलानी पार्टी के हैं ये ढिमकानी पार्टी के जबकि वो विरोध कर रहा है तो अपनी आगे आने वाली पीढ़ियों के लिए ताकि उन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मिल सके ऐसे में सारा साहित्यिक समाज भी साथ नहीं देता क्योंकि राजनीति की जड़ें काफी गहरे तक धंसी हैं . क्या ये सोचने वाली बात नहीं है कि राजनीति हर क्षेत्र में इस हद तक व्याप्त है कि कोई अपना स्वतंत्र निर्णय नहीं ले सकता और लेता है तो या तो मार दिया जाता है या आरोपित हो जाता है ? ये कैसा माहौल बन गया अचानक ? इतनी अराजकता पहले तो न थी तो अभी अचानक ऐसा क्या हुआ जो कोई भी खुद को कहीं सुरक्षित नहीं पा रहा ?
जरा सोचिये ............

गुरुवार, 15 अक्टूबर 2015

शक्ति है तो विध्वंस भी

शब्दविहीन होना
मानो आत्मा विहीन देह
मौन के पिंजर में कैद हो
और अंतस में
कुलबुलाहट का कृष्ण बांसुरी बजाता
जाने किस राधा को रिझाता हो

ये ढकोसलों की सांझें कितनी निर्मोही हैं
कि
साझे दुःख सुख पर भी पहरे बिठा दिए

अब कोई कितना भी
कबीर की साखी सूर के पद मीरा का गायन नृत्यन करे
बंद दरवाज़े किसी थाप के मोहताज नहीं

मौन
शक्ति है तो विध्वंस भी न

गुरुवार, 8 अक्टूबर 2015

बुजुर्ग : बोझ या धरोहर


केन्द्रीय समाज कल्याण बोर्ड द्वारा प्रकाशित "समाज कल्याण" पत्रिका (महिला एवं बाल विकास मंत्रालय,भारत सरकार की मासिक पत्रिका) के अक्टूबर अंक2015 में प्रकाशित मेरा लिखा आलेख : बुजुर्ग : बोझ या धरोहर

श्री ‪#‎kishoresrivastav‬ जी व संपादन मंडल का हार्दिक आभार






आज के भागादौड़ी वाले समय में मानवीय संवेदनाओं की चूलें किस हद तक हिल गयी हैं कि बुजुर्ग हमारे लिए हमारी ‘धरोहर हैं या बोझ’ पर सोचने को विवश होना पड़ रहा है जो यही दर्शा रहा है कि कहीं न कहीं कोई न कोई कमी पिछली पीढ़ी के संस्कारों में रह गयी है जो आज की पीढ़ी उन्हें वो मान सम्मान नहीं दे पा रही जिसके वो हकदार हैं .

घर में बड़े बुजुर्गों का होना कभी शान का प्रतीक होता था . उनके अनुभव और दूरदर्शिता आने वाली पीढ़ियों में स्वतः ही स्थान्तरित होती जाती थी बिना किसी अनावश्यक प्रयास के क्योंकि वो अपने आचरण से अहसास कराया करते थे . वो कहने में नहीं करने में विश्वास रखते थे तो सुसंस्कार , मर्यादाएं और सफल जीवन के गुर इंसान स्वतः ही सीख जाता था और उन्ही को आगे हस्तांतरित करता जाता था लेकिन आज के आपाधापी के युग में न वो संस्कार रहे न वो मर्यादाएं और न ही वो रिश्तों में ऊष्मा तो कैसे संभव है बुजुर्गों को धरोहर मान लेना ? जिन्होंने रिश्तों के महत्त्व को न जाना न समझा न ही अपने से बड़ों को अपने बुजुर्गों को सहेजते हुए देखा उनसे कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वो सही आचरण करें और उन्हें वो ही मान सम्मान दें जो पहले लोग दिया करते थे .

बुजुर्ग बोझ हैं या धरोहर ये तो हर घर के संस्कार ही निर्धारित करते हैं . जिन्होंने अपने माता पिता को बुजुर्गों की सेवा करते देखा है वो ही आगे अपने जीवन में इस महत्त्व को समझ सकते हैं क्योंकि जब उम्र बढ़ने लगती है तो शक्ति का ह्रास होने लगता है , बुद्धि भी कमजोर होने लगती है , अंग शिथिल पड़ने लगते हैं ऐसे में उन्हें जरूरत होती है एक बच्चे की तरह की देखभाल की और इसके लिए जरूरी है पूरा समय देना लेकिन आज वो संभव नहीं है क्योंकि पति पत्नी दोनों नौकरी कर रहे हैं ऐसे समय में वो अपने बच्चों को ही क्रेच के हवाले करते हैं तो कैसे संभव है बुजुर्गों पर पूरा ध्यान देना .

कारण दोनों ही हैं कहीं ज़िन्दगी की आपाधापी तो कहीं संस्कार विहीनता लेकिन इस चक्कर में बुजुर्ग न केवल उपेक्षित हो रहे हैं बल्कि वो बोझ भी महसूस होने लगते हैं और इसका आज की पीढ़ी अंतिम विकल्प यही निकालती है या तो उन्हें वृद्ध आश्रम में छोड़ देती है या उनसे मुँह ही फेर लेती है और अपनी ज़िन्दगी में व्यस्त रहती है जो कहीं से भी एक स्वस्थ समाज का संकेत नहीं है क्योंकि ज़िन्दगी सिर्फ सीधी सहज सरल सपाट सड़क नहीं इसमें ऊबड़ खाबड़ रास्ते भी हैं जहाँ अनुभवों की दरकार होती है , किसी अपने के ऊष्मीय स्पर्श की आवश्यकता भी होती है , किसी अपने के सिर पर हाथ की अपेक्षा भी होती है और ये तब समझ आती है जब इंसान उन परिस्थितियों से गुजरता है लेकिन तब तक देर हो चुकी होती है .
इसलिए जरूरी है वक्त रहते चेता जाये ताकि उनके अनुभवों और आशीर्वाद से एक सफल जीवन जिया जा सके क्योंकि बोझ मानते हुए वो ये भूल जाता है कि एक दिन वो भी इन्ही परिस्थितियों से गुजरेगा तब क्या होगा यदि बोझ मानने से पहले इतना यदि अपने बारे में ही सोच ले तो कभी उन्हें धरोहर मानने से इनकार नहीं करेगा . वर्ना आज तो बुजुर्ग सिवाय बोझ के कुछ और प्रतीत ही नहीं होते .
जो लोग उन्हें बोझ मानते हैं वो नहीं जानते वो क्या खो रहे हैं और जो धरोहर मानते हैं उनके लिए वो वास्तव में एक अमूल्य उपहार से कम नहीं होते क्योंकि बाकि सब ज़िन्दगी में आसानी से मिल जाता है लेकिन बुजुर्गों का निस्वार्थ प्यार,   अनुभव और अपनापन किसी बाज़ार से ख़रीदा नहीं जा सकता .


वंदना गुप्ता
डी – 19 , राणा प्रताप रोड
आदर्श नगर
दिल्ली --- 110033
मोबाइल : 09868077896



सोमवार, 5 अक्टूबर 2015

अंधेरों की सरसों

अंधेरों के पीछे के अँधेरे भी
उतने ही घनेरे होते हैं
ये जानकर होने लगता है अहसास
भविष्य की कछुआ चाल का
जिसमे न गति होगी न रिदम न संगीत
न सुर न लय न ताल
तब भविष्यदृष्टा नहीं तो भी
छटी इंद्री जरूर करती है सचेत
आने वाली काली गहराती परछाइयों से
और जब आशंकाएं अक्सर सच हो जाया करती हैं 
ऐसे में संभव ही नहीं
कोई दूसरा जुगाड़ बाहर आने का
तब छोड़कर हर जद्दोजहद
मान लेना चाहिए

ये गहराते अंधेरों से इश्क करने का ही मौसम है

तो क़ुबूल है क़ुबूल है क़ुबूल है
कह
करना ही पड़ता है निकाह

किस किस से , कैसे और कब तक बचूँ
क्या बचना संभव है मेरा ?

जबकि
मेरे चारों तरफ लहलहा रही अंधेरों की सरसों बेइंतेहा

गुरुवार, 1 अक्टूबर 2015

रोता है मेरा रब बुक्का फाड़ कर

रोता है मेरा रब बुक्का फाड़ कर 
आह ! ये किस तराजू में तुल गया 
जहाँ अन्याय ठहाकें लगाता मिला 
बेबस न्याय ही कसमसाता मिला 
ये किन शरीफों की बस्ती में आ गया 
हर चेहरे पर लटकता वहशियत का 
चमचमाता फानूस मिला 
हर गर्दन तलवार के साए में सिर झुकाए 
ताबेदार सी बेबस निष्प्राण मिली 
बस एक शैतान के चेहरे पर ही 
खिलखिलाती मुस्कान मिली 

ऐसे  तो जहान की न कल्पना की थी मैंने 
जहाँ हैवानियत के जूतों में लगी 
इंसानियत की कील हर चेहरे पर चुभती मिली 
कहीं गुरुद्वार पर ही अस्मिता बिलबिलाती मिली 
कहीं जिंदा लाशों के चेहरों पर बेबसी की मजार मिली 
कहीं कोई हीर वक्त के तेज़ाब में खौलती मिली 
देह तो क्या आत्मा भी तेजाबी ताप से गलती मिली 
कहीं खरीद फरोख्त के साझीदारों में 
अपनों के हाथों के फिंगरप्रिंट मिले 
कहीं शीश महलों में भी कुचली मसली 
रूहों के अवशेष मिले 
कहीं पिंजरबद्ध सोन चिरैया के 
हाथ में तलवार मगर 
पैरों में पड़ी बेड़ियाँ मिलीं 
अपने ही दांतों से अपने ही मांस को नोंचते 
गिद्धों के बाज़ार मिले 
मौकापरस्ती , स्वार्थपरता के खोटे  सिक्कों का 
महकता चलता बाज़ार मिला 
स्वार्थ की वेदी पर निस्वार्थता की बलि देती 
सारी  कायनात मिली 
कहीं अन्याय के बिस्तर पर 
सिसकती न्याय की जिंदा लाश मिली 
कर्त्तव्य अकर्तव्य के दायरे में जकड़ी 
मानुष की ना कोई जात मिली 
बस खुदपरस्ती  की जकड़नों में  जकड़ी 
हैवानियत की ही सांस मिली 

ये कौन सी बस्ती में आ गया 
देख खुदा भी घबरा गया 
आदम और हव्वा के रचनात्मक संसार में 
आदम को ढूँढने खुदा भी चल दिया 

अपने मन के इकतारे पर बिना सुरों को साजे 
मेरा रब रोता है बुक्का फाड़ कर 
कहता है बिलबिलाकर 
कोई मेरा भी क़त्ल कर दो यारों 
कोई मुझे भी मुक्त कर दो यारों 
तुम्हारी जड़वादी सोच से 
भयग्रस्त कुंठाओं से 
भय के अखंड साम्राज्य से 
जहाँ मेरे नाम की तख्ती लगा 
मनमाना व्यभिचार करते हो 
और मेरे नाम के दीप में 
अपनी तुच्छ वासनाओं के घृत भरते हो 
और फिर  कभी सामाजिक तो कभी 
धार्मिक डर की आँधियाँ  चलाते हो 
मेरे नाम पर मानव द्वारा मानवता को ही छलवाते हो 
अपनी कामनाओं की पूर्ती के लिए 
मेरे कंधे पर  बन्दूक रख चलाते हो 
बस करो अब बस करो 
खुद को बेबस लाचार महसूसता हूँ 
जब तुम्हारी स्वार्थपरता में घिरता हूँ 
मेरा अंतःकरण भी रोता है 
और यही प्रश्न करता है 

तुम्हारे बोये भय और उन्माद की आँधी में आखिर कब तक मेरा क़त्ल होता रहेगा ?

मंगलवार, 29 सितंबर 2015

अर्थहीन है वो ............

जब तक बुहारती रही आँगन
मिटाती रही सिलवटें
घर, बाज़ार
स्कूल ,डॉक्टर
से लेकर दुनियावी पहलुओं तक
उगाती रही कोशिशों के चिनार
खुद को मिटा सजाती रही तुम्हारी बज़्म
बा -अदब बा - मुलाहिजा होशियार की टंकार
और सिर झुकाने के अदबी रिवाजों के साथ
प्रिय थी शायद
या फिर स्वीकार था इतना होना भर उसका

समय समेट ही लेता है खुद में
धन रूप और यौवन को भी
ऐसे अंधेरों में घिरने पर
सूख जाती हैं शाखाएं
झरने लगते हैं पत्ते
शिथिल होने लगते हैं अंग
चूलों के हिलने से
हिलने लगती है जब इमारत
और फिर ऐसे नाज़ुक वक्त में
नकारा जाने लगता है अस्तित्व
आखिर बेजारियों की तीमारदारी कोई क्यूँ करे ?

पालने में झूलने के दिन तो
वैसे भी नसीब की क्यारियों में नहीं उगा करते
लेकिन तब भी
उम्मीद की क्यारी में जवां रहता है एक ख्वाब
शायद कभी खिल जाए ये जवाकुसुम
और हो जाये वो निहाल

ख्वाब ख्वाब ही होते हैं .......हकीकत नहीं
वाकफियत करा दी जाती है
जब हकीकत की तस्वीर उसे दिखाई जाती है
हाँ , अनुपयोगी हो अब तुम
खाना पीना और दंगडाना भर है तुम्हारा काम
जो नहीं है अब हमें स्वीकार

और रह जाती है वो हतप्रभ
हो जाती है सोचने को मजबूर
आखिर क्या है कारण
जो हो गयी यूं निष्कासित

क्या यही है एकमात्र कारण
उसके अस्तित्व को नकारे जाने का
कि ' हाउसवाइफ ' है वो
जिसका जिसकी उपयोगिता तक ही होता है , होना 


अर्थ बिना अर्थहीन है वो .............

रविवार, 20 सितंबर 2015

मोहब्बत के हरम

वो कहते हैं
दिल के जंगल में
फूल खिले
गर मोहब्बत का कोई
तो शायद हो जाये हरा

और हम
यूँ वीरानों के अदब से वाकिफ हैं
जाने फिर भी कैसे
खामोशियों के जंगल से मोहब्बत कर बैठे

अब
अपने अपने जंगल के बादशाह
ढूंढ रहे हैं अपनी अपनी मेहरूनिसा

ये मोहब्बत के हरम हमेशा सूने ही क्यों होते हैं 
और प्यास के पनघट हमेशा प्यासे 
खोज में हैं 
एक अरसे से दोनों ही ..........


गुरुवार, 17 सितंबर 2015

ईर्ष्या

क्या फर्क पड़ता है
मैं स्त्री हूँ या पुरुष
मानव सुलभ इर्ष्याओं से तो ग्रस्त रहता ही हूँ

पड़ जाता हूँ हैरत में
अपने समकालीनों को देख
नहीं स्वीकार पाता उनका बढ़ता वैभव
आखिर कैसे संभव है
कम समय में बुलंदियों को छूना
हमने क्या महज घास की खोदी है एक अरसे से
जो कल के आये
तरेरते हैं आँखें
करते हैं जुबाँ बंद अच्छे अच्छे लिक्खाडों की

न न यूं तो अपने वर्चस्व पर
लग जाएगा ग्रहण
ज्यों हम यूं तरजीह देते रहे
और वाह वाह का छौंक
उनके लेखन में देते रहे

बदलनी होगी तस्वीर
खुद को बचाने की जद्दोजहद में
खींचनी ही होगी एक लकीर
उनके और अपने बीच
ताकि तहजीब के फासलों पर
बची रहे कुछ इज्जत

यूं भी
फिर क्या बचेगा हमारे पास
कर दिए जायेंगे दरकिनार जब
इसलिए सोचा है
अपनी इर्ष्या को स्नेहमिश्रित चाशनी में डुबाकर
भले ही ऊपर से ही सही
करने ही होंगे थोड़े बहुत गुणगान
मगर
आलोचना के सम्पुट लगाकर
ताकि
बचा रहे लोकतंत्र लेखन में हमारा भी

ये आज के वक्त की
आज के लेखन की राजनीति है
फिर भला कैसे अछूते रह सकते हैं हम 


जानते हो 
मुख पर मुस्कान का खोल ओढना 
वाहवाही की झांझर झंकाना 
सच पर हैरिसन ताले लगाकर रखना
और अन्दर ही अन्दर ईर्ष्या को सहेजना भी एक कला है 

क्या आती है तुम्हें ?

गुरुवार, 10 सितंबर 2015

घोर संघर्ष काल है

घोर संघर्ष काल है
नहीं पता
हिन्दी का या हिन्दी के साहित्यकारों का
या फिर दोनों का
क्योंकि
मौज तो राजनीतिज्ञों की है
या चाटुकारों की

हिंदी की बाँह कौन पकड़ता है
सबको बस अपना मकसद ही दिखता है
वो तो कल भी अवांछित थी
आज भी है और कल भी रहेगी
क्योंकि
जो राजभाषा से राष्ट्रभाषा तक का सफ़र तय न कर पायी
या कहिये
जिसे ये सफ़र तय नहीं करने दिया गया
उस हिन्दी का भी भला कोई उज्जवल भविष्य हुआ

आओ शंख ध्वनि करो
आओ उद्घोष करो
आओ अपना परचम फहराओ
कि
हमने तय कर ली है एक और दूरी
तो क्या हुआ जो
चार दिन में चार कोस ही चले हों

बस इतना सा ही तो है मकसद
विश्व पटल पर लगा कर बिंदी
हमने अपना परचम फहरा दिया
हिन्दी का नाम बढ़ा दिया
अब गर्व से कहो
जय हिन्दी जय भारत

विश्व हिंदी सम्मलेन में शामिल होना खाला जी का घर नहीं जनाब

( सन्दर्भ : १० वां विश्व हिंदी सम्मलेन )

गुरुवार, 3 सितंबर 2015

' मुँह काला होना '

कितनी उठापटक है
फिर वो साहित्य हो , समाज , राजनीति या रिश्ते

कितने विषय बिखरे पड़े हैं
एक अराजकता सिर उठाये खड़ी है 
मगर मेरी साँसों में 
मेरे दिल में 
मेरे दिमाग में 
मेरी सोच में 
मेरे विचार में 
निष्क्रियता के परमाणु बिखरे पड़े हैं
आहत हैं इतने कि 
प्रतिकार भी नहीं करते और स्वीकार भी नहीं

विस्फोटक समय है ये 
जहाँ आंतरिक उथल पुथल शब्दहीन है
फिर मर्यादाओं के शिखरों का ढहना कोई आश्चर्य नहीं

' मुँह काला होना ' श्रृंगार है आज के समय का ..........

सोमवार, 31 अगस्त 2015

" ..... के भौंकने से शहर खाली नहीं होते "

" ...... के भौंकने से शहर खाली नहीं होते "
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ओ बगावती हवाओं
स्वीकार नहीं तुम्हारे स्वर
तुम्हारे आकाओं को
कि
सिर झुकाने की रवायतें
गर बदल दी जाएँ
तो कैसे संभव है उनका सिर उठाकर चलना
एकछत्र राज्य के वारिस हैं जो

ये शापित वक्त है
जहाँ फलने फूलने के मौसम
सिर्फ चरण चारण करने वालों को ही नसीब होते हैं

फिर क्यों
जोर आजमाइश किये जाती हो
जाओ , जाओ सो जाओ
फिर उन्ही तबेलों में
जहाँ की आवाज़ नहीं तोडा करती नींदें
सत्ताधारियों की

वर्ना आता है उन्हें प्रयोग करना
कीटनाशकों का भी
और आता है साज के सुरों को बदलना भी
ये त्रासद समय की आग उगलती विभीषिका है
बच सको तो बच लो
आज बगावत भी देश समय और काल देखकर ही करनी चाहिए
विपरीत परिस्थितियों में उपेक्षा लाज़िमी है
क्योंकि
जानते हैं वो हुनर
बगावती हवाओं के रुखों को मोड़ने का भी


क्योकि
सूत्रवाक्य है ये उनकी सत्ता का
जिसका पालन हर ताजपोश करता है

" ..... के भौंकने से शहर खाली नहीं होते "
" राजा आगे आगे चलते हैं .... पीछे भौंका करते हैं "

किसी भी बगावत को कुचलने के लिए काफी है
सिर्फ एक शब्द या एक वाक्य
" कुत्ता "
अर्थ अपने आप अपना स्वरुप ग्रहण करने लगते हैं