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बुधवार, 7 फ़रवरी 2018

चलो चलें बुद्धत्व की ओर...

ज़िन्दगी किसी किताब का फटा पन्ना ही सही
आओ नृत्यांगना करो नृत्य
यहाँ चंचल हैं उदासियाँ भी
मौन की रिदम पर दो थाप
कि सुर लय ताल की बंदिश पर
लिख सको एक प्रेमगीत

मैं विस्तारित अनंत का वो राग
जिस पर न गुनगुनाया कोई गीत
मैं किसी छोर का कोई अछोर
जिसे पकड पाया न कोई मीत

आओ रक्कासा , करो रक्स
एक उनींदे ख्वाब में बुझ रहा है जीवन
और तुम लगा रही हो अभी सम्पुट भर
किसी सुबह की चौखट पर

आत्मभेदन यौगिक क्रिया है और ज़िन्दगी अयौगिकरण का गणित ...
वशीकरण के मन्त्रों को फूंकने भर से
नहीं हो जाता याचक अयाचक
क्योंकि
ज़िन्दगी चुप्पी का विशाल मगर खाली कैनवस है 
 
बंजारों की मुट्ठी में नहीं बंधा होता काला तिल
जो फटे पन्ने की बदल दे तकदीर
चलो चलें बुद्धत्व की ओर...


4 टिप्‍पणियां:

HARSHVARDHAN ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन मन्मथ नाथ गुप्त और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

sweta sinha ने कहा…

जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार ९फरवरी २०१८ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

Nitu Thakur ने कहा…

बेहद सुंदर रचना

Nitu Thakur ने कहा…

बेहद सुंदर रचना