पृष्ठ

मंगलवार, 27 फ़रवरी 2018

आइये फटकारें खुद को

आइये फटकारें खुद को
थोडा झाडें पोंछें
कि
भूल चुके हैं सभी तहजीबों की जुबान

संवेदनशीलता और संवेदनहीनता के मध्य
ख़ामोशी अख्तियार कर रुकें , सोचें, समझें
वक्त बेशक बेजुबान है
मगर जालिम है
नहीं पूछेगा तुमसे तुम्हारे इल्म
धराशायी करने को काफी है उसकी एक करवट

आरोपों आक्षेपों तक ही नहीं हो तुम प्रतिबद्ध
चिंतन मनन से मापी जायेगी तुम्हारी प्रमाणिकता
जानते हो
न वक्त की कोई जुबाँ होती है और न मौत की

ये जानते हुए भी कि
करवटों के भारी शोर तले दब चुकी हैं मुस्कुराहटें
तुम कैसे बजा सकते हो बाँसुरी
जिसमे न सुर हैं न लय न ताल

खुरदुरी सतहों पर चलने वालों
चलना जरा संभल कर
यहाँ घुटने छिलने के रिवाज़ से वाकिफ हैं सभी

ये वक्त का वो दौर है
जहाँ नदारद हैं पक्ष प्रतिपक्ष
और
कल जो हुआ
आज जो हुआ
कल जो होगा के मध्य खड़े हो तुम भी ... पता है न
या तो ठोको वक्त को फर्शी सलाम
या फिर हो जाओ तटस्थ
अन्यथा अगला निशाना तुम भी बन सकते हो
बस यही है
तुम्हारे चिंतन मनन की सही दिशा
खुद की झाड पोंछ का मूलमंत्र




गुरुवार, 15 फ़रवरी 2018

सफ़र 30 वर्षों का


सफ़र 30 वर्षों का पल में सिमट गया
दामन ज़िन्दगी का खुशियों से भर गया

कि गुजर चुकी उम्र शिकवो शिकायतों की
कि बदल चुकी इबारत दिल की इनायतों की
ये दौर है कोई और
वो दौर था कोई और

अब
नयी है वर्णमाला
नए हैं अक्षर
और नया है व्याकरण रिश्ते का
जहाँ
कोई कोमा नहीं
कोई अर्ध विराम नहीं
अब पूर्ण विराम की अवस्था है
जीवन राग अपने सातवें सुर पर गुनगुना रहा है आदिम गीत

कि धरा ने साँस भरी
और आकाश सिमट गया
लम्हा जो अब तक भटका था
उसके पहलू में ठिठक गया
फिर सजदा कौन किसे करे
जब
मैं तुम...हुए हम

कहो तो अब किस देवता की करें इबादत
जब ज़िन्दगी सुर्खरू है हमारी :) :)



पलक झपकते बीत गए 30 वर्ष और पता भी न चला कैसे ज़िन्दगी गुजर जाती है......लगता ही नहीं, जैसे कल की ही बात हो या फिर कोई स्वप्न जिसमें हम चल रहे थे किसी मदहोशी में......

शुक्रवार, 9 फ़रवरी 2018

"बुरी औरत हूँ मैं" गंगा शरण सिंह की नजर में

जब एक सजग पाठक और सच्चे आलोचक के द्वारा आपको अपने लेखन पर प्रतिक्रिया मिले तो शायद वो ही एक लेखक का सबसे बड़ा पुरस्कार होता है. उसमे भी गंगा शरण सिंह जी जैसे साहित्य के सजग प्रहरी आपको पढ़ें और आपके कहानी संग्रह पर अपनी प्रतिक्रिया दें तो ये किसी भी लेखक के लिए किसी उपलब्धि से कम नहीं क्योंकि ये वो पाठक हैं जो साहित्य की राजनीति से बहुत दूर हैं लेकिन साहित्य उनकी रग रग में बसा है.
मैं धन्य हुई गंगा जी आपकी बेबाक और सच्ची प्रतिक्रिया पाकर ....आशा है आप समय समय पर इसी तरह हम नव आगंतुकों को अपने विचारों से इसी तरह लाभान्वित करते रहेंगे ..........हार्दिक आभारी हूँ :) :)
"बुरी औरत हूँ मैं" कहानी संग्रह पर गंगा जी द्वारा लिखी समीक्षा आप सबकी नज़र :


Vandana Gupta की पहचान मूलतः एक कवियित्री के रूप में है किन्तु गद्य की अन्य विधाओं मसलन कहानी , उपन्यास, आलोचना, व्यंग्य आदि में भी उनका खासा दखल है।
"बुरी औरत हूँ मैं" उनका पहला कहानी संग्रह है जो 2017 में ए.पी.एन. पब्लिकेशन दिल्ली से प्रकाशित हुआ। व्यक्तिगत रूप से यह शीर्षक मुझे अच्छा नहीं लगा। दरअसल आजकल दौर ही सनसनीे का है। ये सनसनी चाहे शीर्षक द्वारा फैलाई जाय, चाहे किसी घटिया आवरण द्वारा। हालाँकि Kunwar Ravindra साहब द्वारा निर्मित इस किताब का आवरण बहुत बढ़िया है।
शीर्षकों से जुड़ा एक दूसरा पक्ष ये भी है कि तमाम प्रसिद्ध कहानी संग्रहों की तरह शीर्षक धाँसू हो किन्तु पूरे संग्रह में कहानी छोड़कर बाकी सारे तत्व हों , तो भी पाठक के किस काम के।
अपने कई स्वनामधन्य कथाकारों, जिन्हें वे बड़े आदर से समकालीन रचनाकार का ख़िताब देती हैं और बड़े उत्साह से उन्हें पढ़कर बड़ी बड़ी समीक्षाएँ लिखती हैं, से बहुत बेहतर वे स्वयं लिखती हैं। कथ्य के लिहाज से एक दो कमजोर कहानियों को छोड़कर अधिकांश रचनाएँ अलग अलग विषयों और पात्रों को बखूबी प्रस्तुत करती हैं। कुछ प्रेम कहानियों की मूल थीम में भी थोड़ा सा दोहराव जैसा लगा। बावजूद इसके अधिकांश किस्सों में व्याप्त किस्सागोई की विविधता ये दर्शाती है कि रचनाकार अपने आसपास हो रही घटनाओं और चरित्रों को कितनी सजगता और सूक्ष्मता से ग्रहण करने में सक्षम है। किसी भी कहानी संग्रह को पढ़ते समय पाठक अपनी अपनी रुचि की कहानियाँ चुन लेते हैं। मैं भी वही कर रहा हूँ। कुछ ऐसी कहानियाँ जो बेहद उल्लेखनीय लगीं उनका हल्का सा विवरण संग्रह के परिचय के रूप में समझा जाए।

संग्रह की पहली कहानी "ब्याह" एक ऐसी नारी की कथा है जिसका विवाह एक नपुंसक व्यक्ति से हो जाता है। नायिका दुर्भाग्य के इस अध्याय को अपनी नियति मानकर उस घर में शान्ति और सद्भाव से रहने का प्रयास करती है। घर के सदस्यों को एक लड़की के भविष्य खराब करने पर कोई पश्चाताप नहीं है। यहाँ तक कि उसकी सास अपने बेटे की कमी को सार्वजनिक होने से बचाने के लिए अपने पति यानी नायिका के ससुर को रात उसके कमरे में भेजने से गुरेज नहीं करती।
झूठ और छल के सहारे की गयी बहुत सी निरर्थक और विवादित शादियों की स्मृति इस कहानी के साथ ताजा हो आयी।

"उम्मीद" एक अलग सी कथावस्तु पर आधारित प्रेम-कथा है जहाँ कहानी का नायक एक विवाहित महिला से प्यार करने लगता है। पूरी तरह मानसिक धरातल पर स्थित इस प्यार में न तो कोई शारीरिक आकर्षण है न कोई चाहत। नायिका भी उसके नियमित संपर्क में है और वो भी नायक को पसन्द करती है किंतु अपनी अपनी सरहदों और प्रतिबद्धताओं से दोनों बखूबी वाकिफ़ हैं। न कोई इक़रार न इज़हार। अचानक कुछ यूँ होता है कि इस अव्यक्त प्रेम की पीड़ा से त्रस्त नायक धीरे धीरे बीमार पड़ जाता है। लेखकीय नियंत्रण में जरा सी छूट इसे एक साधारण कहानी बना सकती थी, किन्तु एक बेहद नाज़ुक विषय को बड़ी कुशलता से निभाया है वंदना जी ने।
"एक ज़िन्दगी और तीन चेहरे" एक असंतुष्ट प्रवृति के व्यक्ति की कथा है जो विवाहित होने के बावजूद अपनी प्रकृति के कारण संपर्क में आने वाली महिला मित्रों से सदैव अंतरंग होने का प्रयास करता था। कहानी की आख़िरी पात्र उसे इस मानसिकता से किस तरह मुक्त करती है, यह पढ़ना रोचक है।
"पत्ते झड़ने का मौसम" एक ऐसे ख़ुशमिज़ाज़, सहृदय और सुलझे हुए लेखक की आत्मकथा है जो अपनी कैंसर पीड़ित पत्नी की मृत्यु के बाद खुद को लेखन और यात्राओं में इस कदर व्यस्त कर लेते हैं कि देखने वाली ज़िंदादिली और जज्बे से रश्क़ करते हैं और कौतुक भी कि क्या इस इंसान को क्या कभी अकेलापन नहीं व्यापता होगा?
एक दिन जब वो नहीं रहते और कथावाचक मित्र के हाथ उनकी डायरी लगती है तब उसे मालूम पड़ता है कि वो अपनी पत्नी और उसे कितना याद करते रहे।

"बुरी औरत हूँ मैं" यह शीर्षक कहानी एक ऐसी महत्वाकांक्षी औरत की ज़िन्दगी को बयान करती है जो अपने शौक पूरा करने के लिए कॉलेज के समय से ही कॉल गर्ल बन जाती है। उसके सौंदर्य पर मोहित कहानी का नायक सब कुछ जानते हुए भी उसे एक बेहतर जीवन देने का वायदा करते हुए उससे विवाह कर लेता है। इस कहानी का भयावह अंत ऐसे लोगों के लिए एक सबक है जो भौतिक सुख सुविधाओं की अनंत भूलभुलैया में खोकर अपने जीवन से खिलवाड़ करते हैं। इस बार भी व्यक्तिगत जीवन में देखी कुछ इसी तरह की घटनाओं की स्मृति के कारण यह कहानी मेरे लिए प्रासंगिक हो उठी।
"कितने नादान थे हम" एक ऐसे पति पत्नी की कथा है जो एक दूसरे से बहुत प्यार करते हैं किंतु भौतिकता की दौड़ में एक दूसरे से बहुत दूर निकल जाते हैं। तलाक आदि कानूनी प्रक्रियाओं का लंबा रास्ता तय करने के बाद अचानक वे खुद को ज़िन्दगी के रेगिस्तान में अकेले खड़ा पाते हैं और फिर उन्हें एक दूसरे की मूल भावनाओं का समुचित एहसास होता है।
"वो बाइस दिन" इस संग्रह की सबसे बेहतरीन और संवेदनशील कहानी है। नायिका के पिता कोमा की अवस्था में हैं। आसन्न मृत्यु की आहट और पीछे अकेले रह जाने को बाध्य परिजनों की उस विवशता के दौर को बेहद सधे शब्दों और अप्रतिम संवेदना के साथ प्रस्तुत किया है वंदना जी ने।
"स्लीप मोड" इस संग्रह की अंतिम और गुणवत्ता में "वो बाइस दिन" के बाद सबसे अच्छी कहानी है। विस्मरण जैसी खतरनाक बीमारी के शिकार होते जा रहे उम्रदराज परिजन कभी कभी हम सबकी अनजाने में की गई उपेक्षा का शिकार होते हैं। हम उनके बताने पर भी ध्यान नहीं देते और अपनी इन लापरवाहियों पर हमारा ध्यान तब जाता है जब संभावनाओं के सारे दरवाज़े बंद हो चुके रहते हैं।
इस कहानी संग्रह की आरंभिक कहानियों में वंदना जी की भाषा बहुत खटकती है। उनकी कविता का दुष्प्रभाव वाक्य विन्यासों पर बार बार नज़र आता है। शायद ये पुरानी कहानियाँ होंगी जब उनकी भाषा परिमार्जित नहीं थी। किन्तु उत्तरार्द्ध की रचनाएँ पढ़ते हुए स्पष्ट दिखता है कि भाषा और शिल्प पर उनकी पकड़ क्रमशः मजबूत होती गयी है और संभवतः इसीलिए आखिर की कुछ कहानियाँ बेहद असरदार बन पड़ी हैं।