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बुधवार, 6 दिसंबर 2017

द्वन्द जारी है ...

क्योंकि
सत्य तो यही है
देते हैं हम ही उपाधियाँ
और बनाते हैं समाधियाँ
वर्ना क्या पहचान किसी की
और न भी हो तो क्या फर्क पड़ जायेगा
अंतिम सत्य तो यही रहेगा
कोई जन्मा और मर गया
छोड़ गया अपने पीछे अपनी निशानियाँ
गायक, चित्रकार, कवि, लेखक के रूप में

जो जिसने कहा
सिर झुका मान लिया
और जिसने नही माना
तो उसे भी किया स्वीकार नतमस्तक हो

कितना आसान होगा कहना एक दिन
जिसे दिए आपने ये नाम
और उसने किये स्वीकार - सप्रेम 

जो तुमने बनाया बनती गयी
जबकि नहीं पाया उसने कभी खुद को किसी गिनती में
कवयित्री , समीक्षक, उपन्यासकार
'वंदना गुप्ता इज नो मोर'
हृदयतल से दे श्रद्धांजलि
हो जाएगी एक और रस्म अदा

जबकि
हकीकत के आईने दुरूह होते हैं
जब देखती हूँ खुद को अनंत की यात्रा पर जाते
सोचती हूँ
बस यही था क्या जीवन का औचित्य?
एक दिन सिमट जायेगी जीवन यात्रा क्या सिर्फ इन चंद लफ़्ज़ों में ?

द्वन्द जारी है ...