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शनिवार, 31 दिसंबर 2016

धा धिन धिन धा ...

एक शहर रो रहा है
सुबह की आस में

जरूरी तो नहीं
कि
हर बार सूरज का निकलना ही साबित करे
मुर्गे ने बांग दे दी है

यहाँ नग्न हैं परछाइयों के रेखाचित्र
समय एक अंधी लाश पर सवार
ढो रहा है वृतचित्र
नहीं धोये जाते अब मलमल के कुरते सम्हालियत से
साबुन का घिसा जाना भर जरूरी है
बेतरतीबी बेअदबी ने जमाया है जबसे सिंहासन
इंसानियत की साँसें शिव के त्रिशूल पर अटकी
अंतिम साँस ले रही है
और कोई अघोरी गा रहा है राग मल्हार

इश्क और जूनून के किस्से तब्दील हो चुके हैं
स्वार्थ की भट्टी में 
आदर्शवाद राष्ट्रवाद जुमला भर है
और स्त्री सबसे सुलभ साधन

ये समय का सबसे स्वर्णिम युग है
क्योंकि 
अंधेरों का साम्राज्य चहुँ ओर से सुरक्षित है
फिर सुबह की फ़िक्र कौन करे


आओ कि
ताल ठोंक मनाएं उत्सव ...एक शहर के रोने पर 
धा धिन धिन धा ...

बुधवार, 28 दिसंबर 2016

बुरी औरत हूँ मैं ...कहानी संग्रह

मित्रों
मेरा पहला कहानी संग्रह "बुरी औरत हूँ मैं" आप सब की नज़र विश्व पुस्तक मेले में APN PUBLICATION के स्टाल पर 8 जनवरी 2017 को हॉल संख्या 12ए, स्टॉल नंंबर 107 पर दिन में 3 बजे लोकार्पित होगा ..........आप सबकी उपस्थिति सादर प्रार्थनीय है . APN से ही मेरा पहला उपन्यास 'अँधेरे का मध्य बिंदु' आया था जिसे आपका बहुत प्यार मिला . उम्मीद है ऐसा ही प्यार मेरे पहले कहानी संग्रह को भी मिलेगा . 


APN के निदेशक Nirbhay Kumar जी की मैं अत्यंत आभारी हूँ जो उन्होंने मुझ पर अपना विश्वास बनाए रखा और अगला संग्रह छापने के लिए आग्रह किया . बस प्रकाशक और लेखक के रिश्ते में यही विश्वास आने वाले कल की सुखद उम्मीद है . ये रिश्ता इसी तरह कायम रहे यही कामना करती हूँ .
मित्रों Kunwar Ravindra जी की शुक्रगुजार हूँ जो उन्होंने जैसा मैं चाहती थी वैसा ही कवर बना इस कृति को जीवंत कर दिया . उन्हें जब भी जैसा कहा वैसा ही बनाते हैं , इतने सहज सहृदयी इंसान हैं . पहला कवर भी उन्होंने ही बनाया और अब ये दूसरा भी जो बुरी औरत को जस्टिफाई कर रहा है .

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2016

16 दिसम्बर

16 दिसम्बर हर साल आएगा और चला जाएगा
समय का पंछी एक बार फिर हाथ मल बिलबिलायेगा
मगर इन्साफ न उसे मिल पायेगा

स्त्रियाँ और इन्साफ की हकदार
हरगिज़ नहीं
चलो खदेड़ो इन्हें इसी तरह
कानून की दहलीज पर सिसका सिसकाकर
ताकि कल फिर कोई न दिखा सके ये हिम्मत

ये देश है वीर जवानों का अलबेलों का मस्तानों का
बस सिर्फ स्त्रियों का नहीं

चलो बदल लो इस बार खुदा अपना
सुना है वो बहरा है
जिसकी तुम अराधना करते हो

तारीखें बेशक खुद को दोहरायें
जरूरी नहीं
इन्साफ भी दोहराए जाए
संजय गीता मर्डर जैसे केस
रंगा बिल्ला जैसे अपराधी
और मिल जाए उन्हें सजा भी मनचाही सिर्फ चार साल में
जानते हो क्यों
तुम नहीं हो कोई बड़ी हस्ती या देशभक्त या ब्यूरोक्रेटिक संतान

आम जनता के दुखदर्द के लिए नहीं है ये पुख्ता समय ...

गुरुवार, 1 दिसंबर 2016

मन , एक बदमाश बच्चा

मन में जाने कितनी बातें चलती रहती हैं . कहीं कुछ पढो तो मन करता है कुछ चुहल की जाए लेकिन फिर लगता है छोडो , गीत बनाने के दौर गुजर चुके हैं ....आओ हकीकतों से करो सामना

ये मन , एक बदमाश बच्चा ,
छेड़खानी खुद करता है
खामियाज़ा
या तो दिल या आँखें उठाती हैं

'कहीं दूर जब दिन ढल जाए'
कितना ही गुनगुना लो नगमों को
मन के गीतों के लिए नहीं बने कोई अलंकार

जानते हुए हकीकतें
कलाबाजी खाने के हुनर से अक्सर
मात खा ही जाती हैं हसरतें
और ये , नटखट बच्चा
अपनी गुलाटियों से करके अचंभित
फिर ओढ़कर सो जाता है रजाई
कि
दर्द के रेतीले समन्दरों में डूबने को
दिल की कश्ती में
आँखों के चप्पू जो हैं
बिना मल्लाह के कब कश्तियों को मिला है किनारा भला !
 
बदमाश बच्चों की बदमाशियाँ
कहने सुनने का विषय भर होती हैं
न कि ओढ़ने या बिछाने का...