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सोमवार, 13 जून 2016

यूं ही नहीं वैधव्य में भी आकर्षण होता है ..........

छंदबद्ध कविता 
गेयता रस से ओत प्रोत 
जैसे कोई सुहागिन 
सोलह श्रृंगार युक्त 
और दूसरी तरफ 
अतुकांत छन्दहीन कविता 
जैसे कोई विधवा श्रृंगार विहीन 
मगर क्या दोनों के 
सौष्ठव में कोई अंतर दीखता है 
गेयता हो या नहीं 
श्रृंगार युक्त हो या श्रृंगार विहीन 
आत्मा तो दोनों में ही बसती है ना 
फिर चाहे सुहागिन हो 
या वैधव्य की ओढ़ी चादर 
कैसे कह दें 
आत्मिक सौंदर्य 
कला सौष्ठव 
वैधव्य में छुप गया है 
वैधव्य हो या अतुकांत कविता 
भाव सौंदर्य - रूप सौन्दर्य 
तो दोनों में ही समाहित होता है 
ये तो सिर्फ देखने वाले का 
दृष्टिकोण होता है 
कृत्रिम श्रृंगार से बेहतर तो 
आंतरिक श्रृंगार होता है 
जो विधवा के मुख पर 
उसकी आँख में 
उसकी मुस्कराहट में 
दर्पित होता है 
तो फिर कविता का सौंदर्य 
चाहे श्रृंगारित हो या अश्रृंगारित 
अपने भाव सौंदर्य के बल पर 
हर प्रतिमान पर 
हर कसौटी पर 
खरा उतारकर 
स्वयं को स्थापित करता है 
यूं ही नहीं वैधव्य में भी आकर्षण होता है ..........

गुरुवार, 9 जून 2016

गीताश्री की नज़र से 'अँधेरे का मध्य बिंदु'



एक लेखक के लिए जन्मदिन का इससे प्यारा तोहफा क्या होगा जब उसे उपहार स्वरुप उसकी कृति की समीक्षा मिले ........ जी हाँ , ये तोहफा दिया है हम सबकी जानी मानी सुप्रसिद्ध लेखिका ‪#‎geetashreeगीताश्री‬ ने और सुबह सबसे पहले फ़ोन पर शुभकामना सन्देश भी उन्ही का मिला .........तो प्रस्तुत है गीताश्री जी का गहन समीक्षात्मक दृष्टिकोण , जो सिद्ध करता है कितनी गहनता से उपन्यास का उन्होंने अध्ययन किया और उस पहलू पर उनकी कलम चली जो उपन्यास का मूल है वर्ना कहानी पर तो सभी लिखते हैं :
प्रस्तुत है @geetashreeगीताश्री जी की प्रतिक्रिया उनके मूल शब्दों में जो उन्होंने फेसबुक पर दी :

Geeta Shree
Yesterday at 8:57am ·


"अंधेरे का मध्य बिंदू " की तलाश करते करते ठिठक गई मैं. आखिर लेखक की मंशा क्या है? जिसका जीवन में बहुत विरोध हो, लेखन में उसके पक्ष में खड़ा हो जाने के पीछे कौन सी मंशा काम कर रही थी ! वह विषय ही क्यों चुना, जिसका जीवन में स्वीकार नहीं. बहुत सारे सवालो के जवाब मिलते हैं, जैसे जैसे हम अंधेरी सुरंग में घुसते हैं. हर सुरंग का मुहाना रोशन होता है. विषय चाहे कितना भी नापसंद हो, असली बात तो पक्षधरता की है. लेखक बिना विषय का पक्ष लिए, छीजती हुई मनुष्यता की खोज तो कर ही सकता है. उन अंधेरे बिंदूओं की तरफ संकेतित तो हो ही सकता है. रिश्तों से गुमशुदा प्रेम, विश्वास और स्पेस को तो खोज ही सकता है.
हंसमुख, सहजमना कवि -ब्लॉगर वंदना गुप्ता का पहला उपन्यास मुझे बहुत कुछ सोचने पर विवश कर गया. हम रिश्तो से भाग कर रिश्तों से ही जा उलझते हैं. एक जाल टूटे है तो कई डोर खींचे हैं. विडंबनाएं इच्छाओं के साथ लगी चली आती हैं जो कई बार त्रासद अंत में बदल जाती हैं. मानवीय स्वभाव का सबसे बड़ा संकट ये कि हम सब जानते हुए दलदल की तरफ बड़े आराम से यात्रा करते हैं.
वंदना ने इस उपन्यास में लिव-इन रिश्तों को " डिकोड" किया है. पूरी तरह. प्रभा खेतान की थ्योरी पर यहां लेखिका खड़ी दिखाई देती हैं कि जीवन, रोमांस, सेक्स-संबंध सबके अलग अलग कोड होते हैं ! मैं जरा आगे जाकर मानती हूं कि लेखक उनको डिकोड करता चलता है. वंदना ने इस रिश्तों को " डिकोड" किया है , अपनी निजी असहमतियों के वाबजूद.
इतालो कल्वीनों की तरह कह सकती हूं कि साहित्य हमेशा उन गुप्त अर्थों या अज्ञात जगहों की तलाश करता है जिनके मूल अर्थ बदल देने की कोशिश करता है. वंदना यहां यही करती दिखाई देती है. वह रिश्तों के बेहद जरुरी अवयवों की न सिर्फ तलाश करती है बल्कि उन्हें नए सिरे से परिभाषित भी. यही होती है लेखकीय दृष्टि. जो हिंसा के खिलाफ अहिंसक स्थापनाएं दें.
ऐसा नहीं कि वैवाहिक हिंसा का निदान लिव-इन रिश्ते में है. दोनों विफल संस्थाएं साबित हो रही हैं इस दौर में, जहां जीवन ही संदिग्ध हो गया है.
लेखिका दोनों रिश्तों के खोल उतारती चलती है, चोट करती चलती है और तपती हुई ऊंगली मूल अवयव पर धर देती है. इन दोनों में कुछ चीजें खो गई हैं या घिस गई हैं. उनकी पड़ताल जरुरी. उसकी तलाश की यात्रा है यह उपन्यास जिसमें
प्रेम और भरोसे की उपस्थिति को मूर्त किया गया है और अवचेतन के गहरे अंधेरे में उतर कर वे points ढूंढ लिए गए हैं जहां उजाले बसते हैं.
यही तो है जॉनथन स्वीफ्ट की कलादृष्टि !
"Vision is the art of seeing, what is invisible to others. "
ब्लॉगिंग के जमाने से मेरी मित्र वंदना ने इस बार पुस्तक मेले में मुझे चौंका दिया था. उपन्यास की भनक तक नहीं लगने दी. उपन्यास देखते ही सुखद आश्चर्य से भर गई. हम सोचते रह गए, वंदना ने अंधेरे के मध्य बिंदू को खोज लिया. वाह !! उजाले की तलाश ऐसे ही होती है , बिना ढ़ोल -नगाड़े के.
वंदना का आज जन्म दिन भी है! इससे अच्छा दिन क्या होगा !! बहुत बहुत बधाई वंदना !!

शनिवार, 4 जून 2016

तमंचे पर डिस्को

वक्त का जालीदार बिछौना है ज़िन्दगी
जर्रे जर्रे से रेत सी फिसलती
मौत के स्पंदन ख़ारिज करने से खारिज नहीं होते

ज़िन्दगी न साहस है न दुस्साहस
अम्लीय क्षार ने कब दी है दुहाई
एकतारे से चाहे जितनी धुनें निकालो
आखिरी कतार में तो मिलेगी रामनामी धुन ही

अब पालो पोसो पुचकारो दुलारों
गर्दिशों की पाँव में जंजीरें नहीं हुआ करतीं
और ज़िन्दगी , दहशतगर्दी का दूसरा नाम है
अक्सर कह देते हैं कुछ लोग
जो नहीं जानते
अरूप और कुरूप के मध्य
रूप है ज़िन्दगी
श्रृंगार है ज़िन्दगी
अलंकार है ज़िन्दगी

ज़िन्दगी से इश्क तमंचे पर डिस्को सा है ...

बुधवार, 1 जून 2016

फ्री सेक्स ...वक्त का बदलता मापदंड

तेरी जिद की रेत को उलट कर
ले मैंने भर दी है 
अब अपने जिद के गिलास में

यूं आसमां के चुहचुहाने के दिनों का
हो चुका है अब वाष्पीकरण
सुना है न 'फ्री सेक्स'' के बारे में
और अब
समझ चुकी हूँ
वास्तव में स्त्री की फ्रीडम

न न , गलत मत समझना
मेरा वो मतलब नहीं
तुम और तुम्हारी सोच
हमेशा खूँटी पर लटकी कमीज सी ही रही
जिसे जब चाहे पहना
और जब चाहे उतारा
लेकिन
मेरे मायने हमेशा तुमसे उलट ही रहे

मैंने बदला है सिर्फ केशों का रंग
केश नहीं
और देखो
दर्प से जगमगाता चेहरा
कैसे तुम्हारे न केवल गले की
बल्कि
आँख की भी फांस बन गया है

सुनो
शब्दों को तोड़ो मरोड़ो मत
उनके वास्तविक अर्थ को समझो
ये सेक्स वो सेक्स नहीं है
बल्कि वो है
जो अक्सर पूछा जाता रहा है
सेक्स : मेल/फीमेल ...वाला 

और इस बार जिद की आंच पर 
चढ़ा है फीमेल वाला
और फ्री
इसका अर्थ भी
तुम्हारी मानसिक कलुषता और दिमागी दिवालियेपन
तक सीमित नहीं है
यानि हो गयी है वो स्वतंत्र
स्वयं के निर्णय को कार्यान्वित करने को
हाँ या न कहने को
फिर वो जीवनसाथी का चुनाव हो
या शारीरिक सम्बन्ध
या फिर सामाजिक आर्थिक निर्णयों में भागीदारी
लेकिन
तुम वहीँ के वहीँ रहे
हंगामाखेज ... 

यूं चाहे जितने निकाल ले कोई 
फ्री सेक्स के मनचाहे अर्थ 

बस यही है फर्क
तुम्हारी और मेरी सोच में
अब तुम सोच लो
तुम कहाँ हो खड़े ?

जानते हो .....जिदों के पर्याय नहीं होते
और वक्त की आंच पर
जो सुलगी होती हैं
उन दोपहरों को ख़ारिज करने के कोई मौसम नहीं होते

ये है वक्त का बदलता मापदंड ...