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मंगलवार, 29 अप्रैल 2014

बालार्क की बारहवीं किरण



बालार्क की बारहवीं किरण है नीता पोरवाल जो अपने दामन में संजो कर लायी हैं अपने अनुभवों का खजाना जहाँ सादगी के साथ सोच का स्तर जब दस्तक देता है तो पाठक वहीँ ठहर जाता है खुद का अवलोकन करने लगता है एक ख्याल उसकी सोच की बेल पर चढ़ने लगता है , आह , यही , बिलकुल यही तो है मेरे मन की भाषा जो मैं कभी कह नहीं पाया , जिसे कभी व्यक्त नहीं कर पाया और यही किसी भी लेखक का सबसे बड़ा पुरस्कार होता है जब पाठक खुद को लेखक के लेखन से जुड़ा महसूसता है।  

" क्या होते हैं प्रेम में हम " जीवन का वो सत्य है जिसे जानते हुए भी अनभिज्ञ रहना चाहते हैं हम , एक परत ओढ़े प्रेम का स्वांग रचते हम कभी खुद से भी सच नहीं कह पाते तभी तो कवयित्री कहती है :

" क्योंकि सोच में जी लेना 
सच में जीने से कहीं ज्यादा होता है आसान " 

एक हकीकत से पर्दा उठाते हुए अंत में :

" दरअसल , अपना ख्यालों के सिवाय 
हम कभी नहीं होते किसी के प्रेम में " 

शायद ही किसी ने प्रेम की ऐसी सटीक व्याख्या की हो। 

" सजा " आज के इंसान की बदलती फितरत पर गहरा कटाक्ष है जहाँ शैतान भी सर झुका  दे इस हद तक मानव की फितरत बदल चुकी है फिर ऐसे में शैतानी ताकतों की जरूरत ही क्या रह गयी जब हर इंसान कहे जाने वाली शख्सियत में शैतानियत भर गयी। 

": दे दी है पटखनी 
कुछ सीधे पैरों वाले इंसानों ने 
इस आखिरी मुकाबले में भी उसे "

" ओढ़ी गयी चुप्पियाँ " एक यथार्थ को शब्दों में पिरो दिया हो जैसे , बिना सजा दिए भी मुजरिम करार कर दिया गया हो जैसे , चुप्पियों के यथार्थ का मानो आईना हो जहाँ चुप्पियाँ अपने होने का जश्न मनाती सी दिखीं , जहाँ चुप्पियों ने राजतिलक किया हो और एक नया इतिहास लिखा हो , यूं भी प्रतिकार  किये जाते हैं , यूं भी जीवन जिए जाते हैं और खुद पर रश्क किया जाता है जहाँ वेदना भी खिलखिला उठे और एक नया इतिहास जिवंत हो उठे कुछ ऐसे भावों को संजोये ओढ़ी हुयी चुप्पियाँ धीमे से पाठक के मन मस्तिष्क पर प्रहार करती हैं और चुपके से निकल लेती हैं पाठक को स्तब्ध छोड़ और यही कवयित्री के लेखन की पराकाष्ठा है जो चुप्पियों में भी मुखर हो उठती है :

" ओढ़ी गयी चुप्पियाँ 
न्याय पुस्तिका में नहीं लिखे जा सके एक गंभीर अपराध सी 
गवाह के आभाव में 
मुजरिम करार दिया जाने के भय से मुक्त 
औरों को ताउम्र कैद की सजा सुना जाती हैं चुप्पियाँ "

" दूरियां " जीवन की आपाधापी के साथ जीवन से आँख मिलाने और किसी समय खुद से ही दूर हो जाने का ऐसा ख्याल है जहाँ इंसान कब खुद के नज़दीक होता है और कब दूर उसे पता ही नहीं चलता और जब एक दिन सारे निष्कर्ष निकालने बैठता है तो हाथ खाली ही दिखते हैं क्योंकि खुद से खुद का फासला तब भी उतना ही कायम रहता है अब चाहे वो फासला रिश्तों का हो या खुद का खुद से महज कोरा  भ्रम भर साबित होता है। 

" ठहराव भी मौली धागे सा नहीं " जीवन एक ऐसी धारा जिसमे सिर्फ बहना ही है , बेशक कितने मोड़ आये , ऊबड़ खाबड़ रस्ते बने मगर चलना नियति है अब उसके लिए की गई जद्दोजहद कोई विशेष परिशिष्ट नहीं बनाती क्योंकि ठहरना संभव ही नहीं फिर क्यों किसी से कोई अपेक्षा की जाए क्योंकि जीवन में खुशियाँ किसी प्रतिस्थापन की मोहताज नहीं होतीं उन्हें आना है आएँगी और उन्हें जाना है जाएँगी बिना किसी आडम्बर को ओढ़े या हाथ में शगुन की मौली बांधने भर से ही नही आतीं : 

" एक उसके ही ठहराव से 
मुकम्मल हैं कई ज़िंदगियाँ " 

" हाँ , खुशियों का प्रतिस्थापन 
किसी विशेष अपेक्षा के बगैर भी संभव " 

नीता पोरवाल की कवितायेँ संवाद करती हैं , मन के कोने को छूती हैं और फिर पाठक को यथार्थ से परिचित कराती हैं।  कवयित्री का चिंतन उसके लेखन में परिलक्षित होता है जो दर्शाता है संभावनाओं की जमीन बहुत उर्वर है , भविष्य सुखद है , पाठक को पाठन  का एक नया आकाश हर बार मिलता रहेगा।  कवयित्री को उनके उज्जवल भविष्य की शुभकामनाएं देते हुए मिलती हूँ अगली बार। 

सोमवार, 28 अप्रैल 2014

ओ हताशा !

कृपया गुणीजन ध्यान दें ----

कवि का धर्म होता है अपने लेखन से समाज मे जागृति पैदा करना ये जानते हुए भी कुछ ऐसे भावों से रु-ब-रु हुयी हूँ कि खुद आश्चर्यचकित हूँ ……अब आप ही लोग मार्गदर्शन करें क्या सही और क्या गलत है या ऐसे भावों का जन्म भी होता है ........अब आपकी अदालत में 

हताशा पंख पसारे 
चुपके सा आ 
मुझे डराती है 
मेरे मन की खिड़कियों पर 
अनिश्चितता की थाप दे 
बंद कर जाती है 

जो उपजे थे 
थोड़े सुमन उपवन में 
सब पर अपनी 
नाकामी का ग्रहण 
लगा जाती है 

जाने कैसे 
मुझमे उपजी कुंठाओं का 
पता लगा जाती है 
और फिर दिन ढलने से पहले 
अपना अक्स दिखा जाती है 
हताशा के जंगलों को फैला 
खुद का रौद्र रूप दिखा जाती है 

मेरी सरसता सरलता पर 
ग्रहण लगा 
सूर्यकिरण सा नृत्य दिखाती है 
मुझे मुझमे झुलसा 
अपने होने का जश्न मनाती है 

एक फंतासी सा जब 
जीवन बन जाता है 
तब अपने स्वरुप पर 
गर्वोन्मत्त हो इठलाती है 

मेरे गौरव को नष्ट भ्रष्ट कर 
मुझसे मुझे चुराती है 
यूँ हताशा नर्तन कर 
रक्कासा सी 
मेरा मखौल उड़ाती है 


हताशा के वीभत्स रूप का दिग्दर्शन 
जब हो जाता है 
मैं 
हताशा को ही अपना सखा बना 
खुद से विमुख हो जाता हूँ 
और फिर 
मैं हताशा के भंवर में फँसा खुद का सीना चीरा करता हूँ 
हर मोड़ , हर गली 
हर चौराहे पर 
खुद ही खुद का क़त्ल किया करता हूँ 
मगर भंवर से निकलने का 
कोई उपाय न सोचा करता हूँ 

ओ धैर्य की सौतेली बहन 
आखिर कब तक मुझे 
यूं ही छलती रहोगी 
मेरे मन मस्तिष्क को जड़ कर 
मेरी चाहतों का बलात्कार करती रहोगी 
आखिर कब तक मेरा दोहन कर 
मुझे मुर्दा करती रहेगी 

क्योंकि 
मैं वो हूँ जो 
तेरे गर्भगृह में जब सिमट जाता हूँ 
उम्र भर न बाहर आ पाता हूँ 
और तू 
गर्भवती बन अट्टहास कर 
जब समय को ठेंगा दिखाती है 
तेरी क्षमताओं पर न शक रहता है 
बस मेरा ही स्वरूप विनष्ट होता है 
और मैं 
तेरे अट्टहासों तले प्रसव की पीड़ा झेलते 
मृत भ्रूण बन जब जन्मता हूँ 
वास्तव में वो 
तेरी जीत और मेरी हार का संध्याकाल होता है 
जहाँ तेरे पंख विस्तार पाते हैं 
और मेरी कुंठाएं , मेरी चाहतें 
छिन्न भिन्न हो 
प्रेत बन मुझसे लिपट जाती हैं 
और मैं 
फिर कभी प्रेतयोनि से न मुक्त हो पाता हूँ 

ओ हताशा !
तेरा भयानक विस्तार जब 
सृष्टि के कण कण में 
आकार पाता है 
सृजनकर्ता भी विस्मृत हो जाता है 
क्योंकि 
विनाश के चिन्हों का प्रकट होना 
सूचित कर जाता है 
प्रलय निकट है 
तेरे साम्राज्य का विस्तार 
मानो  विराट रूप धारी 
कोई कृष्ण खड़ा हो 
कौरवों की सभा में 
और नष्ट होने को हो सारा ब्रह्माण्ड 

जाने क्यों तेरे चेहरे पर 
फनधारी सर्प ही रेंगते दिखा करते हैं 
जिनका विषाक्त विष 
मेरी रग़ों में जब दौड़ा करता है 
मैं नीला पड़ जाता हूँ 
तेरे चरणों में नतमस्तक हो जाता हूँ 
जहाँ कोई सीढ़ी नहीं होती 
सिर्फ और सिर्फ 
तेरे सर्प ही डंसा करते हैं 
मेरी आकुलता को 
मेरी व्याकुलता को 
मेरी आकांक्षाओं को 
मेरी इच्छाओं को 
मेरी चाहतों को 
और मैं 
निसहाय निराश्रित बेबस शिशु सा हो जाता हूँ तुझे तकने को मजबूर !!!

रविवार, 27 अप्रैल 2014

इक अरसे बाद

इक अरसे बाद 

बिना पटकथा के संवाद कर गया कोई 
दिल धड़कन रूह तक उत्तर गया कोई 
अब धमकती है मिटटी मेरे आँगन की 
जब से नज़रों से जिरह कर गया कोई


मैं ही लक्ष्य 
मैं ही अर्जुन 
कहो 
कौन किस पर निशाना साधे अब ?

उल्लास के पंखों पर सवार हुआ करती थी 
वो जो चिडिया मेरे आँगन में उतरा करती थी
इस दिल की राज़दार हुआ करती थी 
नरगिसी अंदाज़ में जब आवाज़ दिया करती थी

मुझसे मैं खो गयी 
क्या से क्या हो गयी 
ज़िंदा थी जो कल तलक
आज जाने कहाँ खो गयी

दर्द जब भी पास आया 
दिल ने इक गीत गाया 
नैनो ने अश्रु जब भी ढलकाया 
रात ने इक जश्न मनाया


जाने कहाँ खो गयी इक दुनिया 
अब खुद को ढूँढ रही हूँ मैं 
न शब्द बचे न अर्थ 
वाक्यों में खो गयी हूँ मैं

चुप्पी का कैनवस जब गहराता है 
अक्स अपना ही कोई उभर आता है 
खुद के पहलू से जब भी दूर जा बैठे
कोई मुझे ही मुझसे मिला जाता है

बूँद बूँद रिसती ज़िन्दगी 
फिर किस पर करूँ गुमान

बस इंसाँ में इंसानियत बाकी रहे 
लम्हा एक ही काफ़ी है जीने के लिए

कोशिशों के पुल तुम चढते रहो 
बचने की तजवीजें मैं करती रहूँ 

इसी बेख्याली में गुजरती रहेगी ज़िन्दगी

जाने कौन से कैल ,चीड, देवदार हैं 
चीरे जाती हूँ मगर कटते ही नहीं 
मौन के सुलगते अस्थिपंजरों के 
अवशेष तक अब मिलते ही नहीं

जरूरी नहीं 
धधकते लावे ही कारण बनें 
शून्य से नीचे जाते 
तापमाप पर भी 
पड जाते हैं फ़फ़ोले .........


शनिवार, 19 अप्रैल 2014

जाने किस खुदा का करम हो रहा है


जाने किस खुदा का करम हो रहा है कि घर बैठे ही मुझे बड़ी बड़ी हस्तियों का सानिध्य प्राप्त हो रहा है।

पोस्ट तो आज सुबह ही लग जाती मगर बिटिया के मोबाइल में कुछ क्षण कैद थे तो अब जब वो आई तब लगा पायी हूँ।

कल यानि १८ अप्रैल को राजेश उत्साही जी से एक बेहद आत्मीय और सौहार्दपूर्ण मुलाकात हुयी। राजेश जी से यूं तो परिचय पिछले ५-६ साल से है जब वो और मैं दोनों ब्लॉगिंग में सक्रिय थे तो आये दिन बात चीत होती रहती थी वो भी कविताओं पर और फिर सहमति और असहमति के दौर चला करते थे तो कल जब वो भोपाल से मेरे घर आये तो सारी यादें ताज़ा हो गयीं क्योंकि उन्हें बंगलौर जाना था तो बीच में ५-६ घंटे का उनके पास वक्त था तो उस वक्त का सदुपयोग इससे बेहतर क्या हो सकता था। काफी बातें हुईं लगा ही नहीं कि पहली बार मिल रहे हैं क्योंकि इस तरह एक दुसरे से परिचित थे। ये मुलाकात शायद आधा पौना घंटा और बड़ी हो सकती थी अगर मुझे जाना न होता। एक जरूरी काम से जाना था इसलिए जल्दी विदा लेनी पड़ी।

कल राजेश जी का समझो पूरा परिचय मिला। यूं तो उनके ब्लॉग पर उनके बारे में पढ़ते रहते थे मगर जब आमने सामने मिलो तो बात ही अलग होती है तब जाना कि इतनी बड़ी हस्ती कितनी विनम्र और सहज है शायद यही इंसान के बड़प्पन की पहचान होती है।

सहज वातावरण में हमने अपनी पुस्तकों का आदान प्रदान भी किया

अब जानिये राजेश उत्साही जी और उनकी सुप्रसिद्ध कविता-आलू मिर्ची चाय जी के बारे में जो बच्चों और अध्यापकों के बीच खासी लोकप्रिय कविता रही है :

‘आलू मिर्ची चाय जी, कौन कहाँ से आए जी?’

यह सुप्रसिद्ध कविता ‘एकलव्य’ से जुड़े रहे साहित्यकार तथा विभिन्न बाल पत्रिकाओं के संपादक रहे राजेश उत्साही द्वारा लिखी गई है। एकलव्य द्वारा प्रकाशित सुप्रतिष्ठित बाल विज्ञान पत्रिका ‘चकमक’ के जुलाई,1985 में प्रकाशित पहले अंक में यह पत्रिका पहली बार प्रकाशित हुई थी। तब उत्साही जी चकमक के कार्यकारी सम्पादक भी थे। पिछले 30 बरसों से यह कविता बच्चों और शिक्षकों के बीच लोकप्रिय है। रूमटूरीड ने इसका पोस्टर प्रकाशित किया है। सीईआईटी और विज्ञान प्रसार ने इस का वीडियो बनाया है। एनसीईआरटी की पांचवीं की आसपास विज्ञान में यह शामिल है। इसके अलावा उत्तराखंड की पांचवीं की हिन्दी की पाठ्यपुस्तक में यह है। हाल ही में ऋषिवैली स्कूल ने अपनी चौथी की किताब में इसे लिया है। दिल्ली के एक निजी स्कूल की किताब में भी है। बहरहाल इसके बहुत सारे किस्से हैं..। इन्हें आप राजेश उत्साही जी के ब्लॉग गुल्लक (यानी उत्साही.ब्लागस्पाट.इन) पर पढ़ सकते हैं।














शुक्रवार, 18 अप्रैल 2014

" लौ दर्दे-दिल की " ………मेरी नज़र से



देवी नागरानी का ग़ज़ल संग्रह " लौ दर्दे-दिल की " रचना साहित्य प्रकाशन से प्रकाशित संग्रह एक मुद्दत से मेरे लिखने का इंतज़ार कर रहा है मगर क्योंकि मेरी अपनी सीमाँयें हैं इसलिए कुछ लिखने या कहने की हिम्मत ही नहीं हुयी।  कविता की बात हो तो एकदम जो चाहे कह लो मगर ग़ज़ल तो एक साधना है , आराधना है यूं ही नहीं ग़ज़ल कही जाती , ग़ज़ल के अपने नियम हैं , बहार , रदीफ़ , काफ़िया आदि का जब तक उचित मिलान न हो ग़ज़ल सम्पूर्ण नहीं होती और मैं इससे अंजान हूँ इसलिए पढ़ने के बाद भी संग्रह एक साल से कुछ कहने की बाट जोह रहा था।  आज हिम्मत करके देवी नागरानी जी के कुछ चुनिंदा शेरों को चुना है और आपके समक्ष रख रही हूँ।  

देवी नागरानी के पास भाषा है , बिम्ब हैं, संवाद है तभी वो इतनी असरदार ग़ज़लों का निर्माण कर पाती हैं।  तभी तो ग़ज़ल में भी इबादत करने का ख्याल उन जैसी गज़लकारा को ही आ सकता था 

इक इबादत से कम नहीं हरगिज़ 
बंदगी सी मुझे लगी है ग़ज़ल 

एक आक्रोश , एक दर्द को चंद  लफ़्ज़ों में पिरो देने की महारत ही ग़ज़ल को मुकम्मल बनाती है :

चीखती वासनाएं हैं देवी 
जंग जब भी हुयी हवाओं में 

सांस का ईंधन जलाया तब कहीं वो लौ जली 
देखकर जिसको तड़पती रात की बेचैनियाँ 

अकेलेपन की त्रासदी और आज के भौतिकवादी युग में खुद से जुदा वजूद की कश्मकश का खाका खींच दिया तो दूसरी तरफ सच और झूठ की सदियों से चली आ रही जद्दोजहद को अपने ही ढंग से बयां किया 

सूनी सूनी राह लम्बी , पर डगर आसाँ  नहीं 
खुद से मिलने के लिए ये तो बता जाऊँ  कहाँ 

झूठ के शोले जलाएं सच को देवी जब कभी 
दूर रहना वर्ना उनकी आग में जल जाओगे 

क्यों निराशाओं में बदलीं सारी उम्मीदें ही मेरी 
ये लिखी कैसी कहानी तेरी मेरी हसरतों ने 

कितना नटखट है मुकद्दर ये , है कितना चंचल 
खेलता आँख मिचौली है सितारों की तरह 

मैं सूनसान बस्ती में जैसे ही आई 
हुई बात मेरी कई पत्थरों से 


तो कहीं प्रेम के बंधों में बंधी इश्क की दास्ताँ चित्रित हुयी :



ख्वाब की चादर पे टाँके यूं फरेबों के गुलाब 
उन में अब सच्चाइयों की इक कली पाती नहीं 

दौलत  तेरे दर्द की रक्खा सहेज कर 
पलकों से हमने अश्क गिराए नहीं कभी 

उनकी आँखों में तो खुद को ढूंढने निकले थे हम 
हम मगर गहराइयों में जाके उनकी खो गए 

वक्त के क्रूर हाथ जब उठते हैं तो न धर्म बचता न ईमान क्योंकि भूख एक ऐसी त्रासदी है जिससे कोई अछूता नहीं रह सकता तो दूसरी तरफ धर्मान्धता की लड़ाई हो या ज़िन्दगी की पेट की आग और घर के हालात सब का चित्रण इस तरह किया है कि उसके बाद कहने को शब्द नहीं बचते और पाठक सिर्फ उसी में डूबा रह जाता है :

धर्म ईमान सब जला क्या है 
भूख भी आगे , सिवा क्या है ?

ठन्डे चूल्हे रहे थे जिस घर के 
उससे पूछा गया , "पका क्या है "

अनगिनत प्रश्न , एक ख़ामोशी 
सब सवालों का इक जवाब हुआ 

मेरी बिसात नहीं छू लूं आसमां को मगर 
कोई तो है जो बढता है हौसला दिल का 

ग़ुरबत की तीलियों से तो चूल्हा न जल सका 
वो ठंडी ठंडी आग ही भूखें मिटा गयी 


ज़िन्दगी के हर पहलू पर कलम चली है और इस तरह चली है कि आप सोचने लगोगे क्या खूब कहा है बिलकुल सही तो कहा है यही तो हो रहा है और जब पाठक का तारतम्य लेखक एक साथ बैठता है तो उसे सब अपने साथ घटित सा ही लगता है कुछ ऐसा ही असर उनकी ग़ज़लों में है जिसका हर शेर दाद के काबिल है 

लोग करते हैं दगा प्यार से प्यारे बनकर 
छीन लेते हैं सहारे ही सहारे बनकर 

दुश्मनों को भी कभी अपना बनाकर देखो 
वर्ना जल जाओगे दोनों ही शरारे बनकर 

क्यों जलाते लोग हैं रावण के पुतलों को सदा 
हो दिखने की फकत नेकी बदी  किस काम की 

जिन भरोसों की हों बुनियादें सरासर खोखली 
उन फरेबों पर इमारत जो बनी किस काम की 


एक जोश का संचार करता शेर कितनी गहरी बात कह गया वो भी बेहद सादगी से यही तो कलमकार की कलम का कमाल होता है बिना शोर किये सब कुछ कह जाना और पाठक के हृदय के तारों को झंकृत कर देना :

आपको कहना है कहिये जो बुलंद आवाज़ में 
शोर की इन नगरियों में ख़ामुशी किस काम की 

अपनी शर्तों पर जिया 
हारा वो सब बाजियां 

ज़िन्दगी कब सिखा सकी वो ढब 
पुरसुकूं जी सकें , उसे यारब 

जानूं की चल रही हैं वहाँ साज़िशें भी क्या 
दुश्मन से बन के दोस्त भी मिलना पड़ा मुझे 


रिश्तों के गणित कब कोई समझ पाया है मगर उसे भी बड़ी संजीदगी से संजोया है :


ये रिश्ता की कोई कागज़ है पढ़ कर फेंक दोगे  तुम 
तुम्हे ये कैसे समझाए , सजाया दिल में जाता है 

बड़े ही प्यार से बोया , बड़े ही प्यार से सींचा 
अचानक फूल सा रिश्ता बिखर कर टूट जाता है 

धमाकों से दरारें जो ज़मीने दिल पे आई हैं 
उन्हें फिर से भरेंगे , करिश्मा कर दिखाएंगे 

फासलों से जो पास पास लगी 
जाके नज़दीक दूरियां देखीं 


आज के वक्त की एक त्रासदी मानो गरीबी अभिशाप हो लेखिका का दिल पिघल उठा और सच्चाई बयाँ कर गया :


आग में जलती बस्तियां देखीं 
जो भी देखीं वो झुग्गियां देखीं 

लगेगी देर न कुछ उसको शोला बनने में 
दबी सी आग जो दिल में छिपाये बैठे हैं 

ये जानते हैं कि ज़िन्दगी बड़ी ज़ालिम 
उसी को दिल से हम अपने लगाये बैठे हैं 


छोटी बहर में भी कमाल करती हैं शब्दों का बेजा इस्तेमाल न कर सिर्फ अपने कथ्य को कहना ही एक ग़ज़लकार के लिए ही संभव होता है जिसमे लेखिका सिद्धहस्त हैं :


बिम्ब हम कहते हैं जिसको 
शब्द शिल्पी की कला है 

बोले गूंगा सुन ले बहरा 
ये करिश्मा भी हुआ है 


मन की मनमानियों  की गंगा में 
पाप सब खुद ही धो लिए साहब 


राजनीती का चेहरा उजागर करता शेर बताता है कलम कब रूकती है वो तो सच्चाइयों पर हकीकतों पर प्रहार करती ही है :


वोट लेकर आँख फेरे आज का संसार देखो 
बन गयी है ये सियासत अब तो इक व्यापर देखो 

उम्मीद की किरण का साथ न छोड़ना ही किसी भी लेखन को सार्थकता प्रदान करता है और यही उम्मीद की किरण आशा का संचार करती है :


इक असीम आसमान है सर पर 
कि  किसी सायबाँ से है वो कम 


देवी नागरानी की कलम हर क्षेत्र पर चली है कौन सा ज़िन्दगी का ऐसा पक्ष है जिसे अनदेखा किया गया हो , सरल शब्दों में गहरी और मारक बात कह जाना ही किसी भी कलम की , उस लेखक की पहचान होती है।  जितनी सौम्य और शालीन व्यक्तित्व है उतनी ही सौम्यता और शालीनता उनकी ग़ज़लों में है जहाँ भाव पक्ष बेहद सबल है और जब तक भाव पक्ष न हो तो शब्दों का प्रयोग महज क्रीडांगन बन कर रह जाता है पाठक के हृदय पर छाप नहीं छोड़ पाता।  हर शेर ज़िन्दगी के अनगिनत पहलुओं का ज़खीरा है जहाँ पाठक खुद से मिलता है , ज़िन्दगी की त्रासदियों , घुटन , घटनाओं से रु-ब-रु होता है और उत्साह का संचार करती ग़ज़लें , शेर उसके मस्तिष्क पटल पर गहरी छाप छोड़ जाते हैं जो एक लेखक के लिए सबसे बड़ा पुरस्कार होता है।  सामाजिकता , साम्प्रदायिकता  , दर्शन हर पहलू बड़ी से बड़ी बात को सरलता से उजागर करता है और लेखिका की संवेदनशीलता और दृष्टिकोण को इंगित करता है कि लेखिका किसी एक पहलू से बंधी न होकर व्यापक अवलोकन करती है और फिर उन्हें ग़ज़लों में ढाल बयां करती है। सिंधी भाषा की लेखिका का हिंदी भाषा पर भी सामान वर्चस्व है।  

ग़ज़ल के प्रति सम्पूर्ण समर्पण उनके उज्जवल भविष्य को इंगित करता है अपनी शुभकामनाओं के साथ देवी नागरानी को उनके संग्रह की बधाई देती हूँ।  

सग्रह प्राप्त करने के लिए पाठक देवी नागरानी से निम्न इ मेल और फोन पर संपर्क कर सकते हैं :

ई मेल : dnagrani@gmail.com

m : 9987928358 

रविवार, 13 अप्रैल 2014

राकेश कुमार की नज़र में



वन्दना गुप्ता का प्रथम काव्य संग्रह बदलती सोच के नये अर्थ एक युवा कवियित्री का ऐसा संग्रहणीय लिखित दस्तावेज है जिसमें प्रेम के साथ विरह भी है, दर्शन भी है, एक स्त्री का सुंदर चारित्रिक चित्रण भी है, तमाम वर्जनाओं के प्रति मुखरता है और समाज के बदलते प्रतिमानों के प्रति एक प्रकार का विद्रोह भी है। यद्यपि पाठकों के पठन की सहजता की दृष्टि से कवियित्री ने इसे चार विभिन्न खण्डों में विभक्त करने की चेष्टा की है तथापि प्रत्येक खण्ड एक दूसरे से स्वयं को संबद्ध करती, प्रश्न-प्रतिप्रश्न के बीच उलझनों का स्वयं निवारण करती, प्रेम और दैहिक सम्मिलन जैसे जटिल विषयों में दर्शन का समावेश करती प्रत्येक पंक्तियां सात्विकता की कल्पना रूपी घृत में पवित्र लौ की भांति प्रज्जवलित प्रतीत होती है। अपनी कविता संग्रह का आरंभ उन्होने प्रेम रचनादेखो आज मुहब्बत के हरकारे ने आवाज दी है“, से की है। आज के युग में संचार माध्यमों के द्वारा आपस में दूरस्थ दो अन्जान व्यक्तियों के मध्य प्रेम के बीज का स्वआरोपण एवं अंकुरण तथा पल्लवन को कविता में श्रृंगार के माध्यम से उकेरने की चेष्टा के बीच पाठक के हृदय चक्षु में विरह अश्रु का अनायास आयातित होना, उनके लेखन कौशल का प्रमाण प्रस्तुत करता है। यद्यपि उन्होने रचना के आरंभ को श्रृंगार से प्रारंभ करने का प्रयास किया है, किंतु मध्य में ही उन्होने विरह की कल्पनाओं से पाठकों को द्रवित करने की चेष्टा की हैं। शायद कवियित्री यह भलीभांति जानती हैं कि मिलन तो प्रेम का सतही एवं मलिन स्वरूप होता है, वास्तव में विरह उसे सुंदरता प्रदान करता है। अपनी दूसरी कविता तुम तो मेरी प्रकृति का लिखित हस्ताक्षर हो में वे द्वापर युग की श्रीकृष्ण की परिकल्पना को शब्दों में उकेरती प्रतीत होती हैं। नायक के उन श्रृंगारिक अनुभूतियों को जिसमें वह नायिका को स्वयं की प्रतिकृति के रूप में महसूस करने लगता है, कदाचित् अकल्पनीय किंतु प्रेम की पराकाष्ठा को प्रतिबिंबित करता है। यह प्रेम के चरमोत्कर्ष की अवस्था है, जब मैं और तुम का भेद नायक और नायिका के मध्य सदा के लिये समाप्त हो जाता है। राधाजी, श्रीकृष्ण से यही प्रश्न करती हैं, वे कहती हैं किकान्हा तुमने मुझसे अपार प्रेम किया किंतु विवाह रूक्मणी से, यह कदाचित् उचित नही“, तब श्रीकृष्ण प्रेम की पराकाष्ठा को परिभाषित करते हुये कहते हैं किराधा विवाह तो उनके बीच किया जाता है जिनके मध्य तुम और मैं का भेद विद्यमान हो। किंतु जब प्रेम अपने उच्चतम उत्कर्ष को प्राप्त कर लेता है, तब तुम और मैं का भेद भला कहाँ रह जाता है, मैं तो तुममे और स्वयं में कोई भेद ही नहीं कर पाता हूँ और क्या यह संभव है कि मैं स्वयं से विवाह कर लूँ? अपनी अगली कविताओं में भी कवियित्री ने प्रेम के सात्विकता पर बल देने की चेष्टा की है, प्रेम दैहिक आकर्षण से परे आत्मिक अनुभूति का विषय है, यह कवियित्री ने बार-बार रेखांकित करने की चेष्टा की है। आज के युग में जब प्रेम पूरी तरह स्वार्थपरक और शारीरिक आकर्षण से इतर कुछ भी नहीं रह गया है, ऐसे में इस तरह की अलहदा विचार को जिंदा रख शब्दों में उकेर पाठकों तक परोसना, कवियित्री के उज्जवल दृढ़ सोंच को प्रतिबिंबित करता है। कवियित्री अपनी कविता प्रेम का अंतिम लक्ष्य क्या...? में अपनी कविता के माध्यम से पाठकों को वैचारिक द्वंद में धकेल देती हैं। प्रेम की संपूर्णता दैहिक समर्पण में है अथवा आत्मिक मिलन में ? क्या प्रेम बिना दैहिक अनुभूति के अपनी पराकाष्ठा को प्राप्त नहीं कर सकता ? दो देह का मिलन प्रेम की पराकाष्ठा को परिलक्षित करता है अथवा प्रेम के निरंतर हव की ओर अग्रसर होने वाले एक चरम बिंदु को चिन्हित करता है ? इन सभी विचारों के द्वंद में पाठक स्वयं को जैसे ही उलझा हुआ महसूस करता है हीं इसके पश्चात की कवितायें इन प्रश्नों के उत्तर ढूढ़ने में स्वयं मददगार साबित होती हैं। अपनी कविताएक अधूरी कहानी का मौन पनघटमें कवियित्री अपनी इन पंक्तियों के सहारे इन प्रश्नों का उत्तर स्वयं दे देती हैं
फिर क्या करूंगा तुम्हे पाकर
हाँ तुम्हे ही खो दूं हाँ...
खोना ही तो हुआ ना
एक निश्छल प्रेम का
काया के भंवर में डूबकर
और मैं जिंदा रखना चाहता हूं,
हमारे प्रेम को,
अतृप्ति के क्षितिज पर देह के भूगोल से परे
वास्तव में प्यार सत्यम् ,शिवम्, सुन्दरम् के गूढ़ अर्थों को स्वयं में समेटे ईश्वर का दिया अनुपम उपहार है। यह उम्र की सीमाओं से परे आत्मिक अनुभूति का विषय है। जहाँ प्यार है, वहाँ जीवन है और जहाँ सत्य है, संयम है, विश्वास और पारदर्शिता है, वहाँ प्यार के बीज सीप से निकले मोती की तरह चमकते हैं।प्रेम कभी प्रौढ़ नहीं होतामें कवियित्री जैसे इन्ही विचारों को रेखांकित करने की चेष्टा करती प्रतीत होती हैं। कवियित्री प्रेम कविताओं के आगे स्त्री विषयक प्रसंगों को जैसे ही छूने की चेष्टा करती हैं, उनके भीतर की ज्वालामुखी फट पड़ती है। बरसों से घर की चारदीवारी के भीतर सतायी हुई एक स्त्री की संवदेनायें जब भीतर तक आहत होती हैं, तब किस़ तरह मर्यादा की सीमारेखा तटबंधनों को तोड़ पूरी व्यवस्था को नेस्तनाबू कर देती है। इसे उन्होने बखूबी चित्रित करने की कोशिश की है। इसे विडंबना ही कहें कि इस प्रगतिशील समाज का दंभ भरने वाले हर घरों में आज स्त्री किसी ना किसी रूप में शोषित और प्रताड़ित है। कवियित्री अपनी कविताघायी औरतके माध्यम से उत्पीड़ित स्त्री के मन में उपज रहे इस विद्रोह को शब्दों का रूप देने का प्रयत्न करती है। कविताऋतुस्त्राव से मीनोपाज तक के सफर में एक कन्या से स्त्री बनने तक के शारीरिक एवं मानसिक मनोभावों का प्रभावपूर्ण रेखांकन है। एक कन्या में शनैः-शनैः विकसित होने वाले शारीरिक एवं मानसिक भावनात्मक लक्षण तथा एक संपूर्ण ब्रह्मांड की रचना के लिये तैयार होने के पूर्व उभरने वाले शारीरिक लक्षणों के मध्य कन्या के मासिक उद्वेग एवं मनोभावों का चित्रण बेहद प्रभावी है वहीं इसके अवसान काल के प्रति एक स्त्री की आशंका का चित्रण पढ़ जैसे हृदय कांप उठता है। कवियित्री जैसे-जैसे आगे बढ़ती हैं, वैसे-वैसे स्त्रीगत् संवदेनाएं और मुखर होते जाती है। पुरूष प्रधान समाज में स्त्रियों के लिये वर्जनात्मक विषयों के प्रति कवियित्री के विद्रोह के स्वर आज की प्रगतिशील नारी के सोच को प्रतिबिंबित करती है। वंदना अपनी कविताइतना विरोध का स्वर क्यूँमें एक स्त्री के प्रति पुरूष की परंपरागत सोच को बदलते हुये जैसे वह कहना चाहती है कि अब स्त्री केवल पुरूष के सौदर्य उपासना का साधन मात्र नहीं है और ना ही वह उसके चक्षुओं को तृप्त करने अथवा दैहिक उपभोग के लिये कोई वस्तु है। अब वह पुरूषों के परंपरागत सौंदर्य विशेषणों, उपमाओं एवं चिकने-चुपड़े अलंकारों से मुक्त होकर समाज के भीतर अपने अधिकारों की अपेक्षा रखती है। वह अजंता-एलोरा की भित्तचित्रों से निकलकर समाज में अपनी उपस्थिति का अहसास चाहती हैं। यह बेहद संवेदनशील नितांत मौलिक एवं नया विषय है, जिस पर कवियित्री ने अपने कलम से आधुनिक स्त्रियों के भीतर कुलबुलाती आहत किंतु मौन संवेदनाओं को शब्द देने की चेष्टा की है।
कवियित्री ने कुछ पौराणिक पात्रों को भी अपनी विषयवस्तु का आधार बनाया है और वर्तमान प्रगतिशील नारी के सापेक्ष उस चरित्र के समालोचना करने की चेष्टा की है। यह सत्य है कि पुरातन भारतीय समाज, स्त्रियों के संदर्भ में तमात तरह की वर्जनाओं एवं परिहार प्रथाओं का शिकार रहा है। एक पुरूष की अंधत्व की पीड़ा को स्वयं की नियति समझ कर स्वीकार कर लेना गांधारी के पतिव्रत धर्म के स्वस्वीकारोक्ति को दर्शाता है अथवा पुरूषप्रधान समाज के द्वारा एक स्त्री को नैतिकता के दलदल में धकेल पुरूष के दुर्भाग्य को ही भाग्य स्वीकार करवाने की पुरूषोचित कुंठित सोच को, यह बहस का विषय हो सकता है किंतु माता के रूप में गांधारी के कर्तव्य पलायन पर ना तो कोई प्रश्नचिन्ह है और ना ही कोई विवाद। एक संपूर्ण समाज के विलोपन के लिये गांधारी को दोषी ठहरा जब अपनी पंक्तियों के माध्यम से कवयित्री लिखती हैं
मैं इक्कीसवीं सदी की नारी
नकारना चाहती हूं,
तुम्हारे अस्तित्व को .....
देना चाहती हूं, तुम्हे श्राप
तो जैसे समस्त पंक्तियां अपने विचारों के ज्वार के साथ कंपन करने लगती हैं
स्त्रियां आज सभ्रांत घरों में शोषित और उपेक्षित है। उसकी प्रतिभायें अधिकतम संघर्ष के पश्चात स्वीकार्य होती हैं और स्थापित होने में तो कदाचित् बरसों लग जाते हैं। कवियित्री अपनी रचनाकागज ही तो काले करती होमें जिस व्यथा का चित्रण करती हैं, वह रचनाकार के रूप में उभरती कमोबेश हर स्त्री की प्रारंभिक व्यथा है,जिससे उबरने में या तो उन्हे अपनी पूरी ताकत झोंक देनी होती है या फिर उबरने के पहले ही घर की देहरी पर दम तोड़ देती हैं। कवियित्री समाजिक विषयों में, भ्रूण हत्या, स्त्रियों के शोषण,बदलते सामाजिक चरित्र को बड़ी बेबाकी से कहने का प्रयास करती हैं, कई बार ऐसा करते हुये उनकी पंक्तियां उनके अतिशय क्रोध का भी शिकार हुई हैं, कदाचित् ज्वलंत विषयों की ओर ध्यान आकृष्ट करते ऐसा हुआ होगा किंतुखोज में हूं अपनी प्रजाति के अस्तित्व कीमें वे घटते लिंगानुपात पर बेहद चतुराई से प्रहार करती हैं। कवियित्री जब अंत में सभी तरह के विषयो से होते हुये दर्शन में प्रवेश करती हैं, तो उसके लिये प्रेम की संपूर्णता मिलन ना होकर विरह हो जाता है। वह यह स्वीकार कर लेती है कि वास्तव में विरह प्रेम का सौंदर्य है, प्रेम रूपी नन्हा सा पौधा तो विरह के अश्रु से सिंचित हो सर्वाधिक पुष्ट होता है। प्रेम वह स्वर्ण कणिका है जो विरह की धधकती ज्वाला में जितनी तपती है उतनी ही अधिक दृढ़ता से आलोकित होती है।अपनी कविताओह मेरे किसी जन्म के बिछड़े प्रियतममें अपनी इन पंक्तियों में अपने भाव को व्यक्त करती हैं।
अपूर्णता में संपूर्णता का आधार ही तो
व्याकुलता को पोषित करता है। ...
प्रेम के बीच विरह की कणिकायें जब और अधिक पल्लवित और पुष्टित होने लगती है अर्थात जब यह चमोत्कर्ष की ओर बढ़ने लगता है तो प्रेम पूजा का स्वरूप ग्रहण कर लेता है। वास्तव में जब कोई वस्तु एवं भाव अलभ्य हो जाये तो उसमें श्रद्धा का अंकुरण अनायास किंतु स्वाभाविक है। मीरा का कृष्ण के प्रति प्रेम के स्वरूप को इसी नजरिये से देखा जा सकता है।प्रेम अध्यात्म और जीवन दर्शनमें जैसे वे यही कहती हैं। अपने दर्शन विषयों से संबंधित अगली कविताओं में कवियित्री नेमैंके विलोप पर बल देने की चेष्टा की है। कवियित्री ने आचार्य रजनीश से संबंधित एक विषय को अपनी कविता में उठाया हैसम्भोग से समाधि तक इस कविता में भी उन्होने पुरूष केमैंसे संबद्ध दृष्टिकोण को नकारने की चेष्टा की है। दैहिक सम्मिलन में पुरूष का अहम्, सर्वत्रमैंके प्रति उसका अभिमान, स्त्रियों के प्रति इस अवस्था में भी दोयम सोच और इन सबके बीच आत्मिक आनंद से वंचित, इसके वास्तविक स्वरूप आध्यात्म से इस अवस्था में भी साक्षात्कार ना कर पाने, वासना के दलदल से बाहर ना निकल पाने के पुरूषवादी सतही मानसिकता को कवियित्री जैसे सिरे से नकारना चाहती हैं। वृहदारण्यक उपनिषद में एक स्थान पर लिखा गया हैसंभोग आनंद की पराकाष्ठा हैकिंतु इसका वास्तविक अर्थ वासनात्मक भोग-विलास नहीं है बल्कि जीवों का सम सम्मिलन है, जिसे वंदना गुप्ता अपनी कविता में उठाते हुये इसके वास्तविक अर्थ से जोड़ने का प्रयत्न करती हैं, वे एक स्थान पर लिखती हैं
जीव रूपी यमुना का,
ब्रह्म रूपी गंगा के साथ,
संभोग उर्फ संगम होने पर
सरस्वती में लय हो जाना ही आनंद या समाधि है।
और यही उपनिषदों में लिखे उपरोक्त शब्दों का भी उद्देश्य है, इस लिहाज से उनकी दर्शन से संबंधित कवितायें उपनिषदों एवं वेदों में लिखे उद्धरणों के करीब हैं। प्रायः यह कहा जाता है किसाहित्य समाज का दर्पण होता है” , किंतु मेरी नजर में जब तक उसमें भविष्य की बेहतर संभावनाओं के प्रति एक दृष्टि ना हो, उसमें समस्याओं के समाधान के मौलिक सृजन के संकेत विद्यमान ना हो तब तक ऐसा साहित्य निहायत ही खोखला एवं केवल समय व्यतीत करने तथा मनोरंजन के योग्य मात्र होता है और मुझे ऐसे साहित्य से परहेज है। वंदना गुप्ता के साहित्य सृजन में समस्या भी है, समाधान भी है और इन समस्याओं के समाधान की दिशा में एक साहित्यकार की स्वयं की दृष्टि एवं मौलिक सो भी है। कवियित्री एक साहित्यकार होने के साथ-साथ प्रबुद्ध सामाजिक प्राणी भी है जिनमें समाज में हो रहे नकारात्मक परिवर्तन के प्रति आक्रोश है और यही आक्रेाश उनकी कविताओं में कहीं घटते लिंगानुपात तो कहीं स्त्रियों के शोषण की व्यथाओं के आक्रेाश के रूप में उभरा है। कवियित्री समाधान चाहती हैं, पुरूषवादी सोंच में परिवर्तन कर तथा समाज में स्त्रियों के भीतर चेतना की लौ जगाकर। वह स्त्रियों की बेचारगी की पुरूषवादी दृष्टिकोण से उबरना चाहती है और हमें इस विचार का स्वागत करना चाहिये।
अंत में का जा सकता है कि सभी कवितायें बेहद प्रभावी, वैचारिक समझ एवं नयी सोच का बीजारोपण करने वाली है, सरल शब्दों का प्रयोग कर कवियित्री ने अधिकाधिक पाठकों के बीच हुँचने का प्रयत्न किया गया है। रस, अलंकार, छंद स्वआयातित हैं। कहीं-कहीं कविताओं ने अनावश्यक विस्तार पाया है, कदाचित् इसे बचा जा सकता था, किंतु संभवतः प्रत्येक कवि के साथ उनकी प्रारंभिक रचनाओं में इस तरह की स्वाभाविकता देखने को मिलते हैं, जो आने वाली रचनाओं के साथ स्वतः ठीक हो जाती है। पुस्तक पठन के योग्य है, साहित्य के क्षेत्र में यह एक संग्रहणीय रचना है। मैं उनके उज्जवल भविष्य की कामना के साथ, साहित्य के विशाल क्षितिज पर उनका अभिनंदन करता हूं।
सादर
राकेश कुमार
प्रशासनिक कार्यालय
हिर्री डोलोमाईट माईंस
भिलाई इस्पात संयंत्र
जिला-बिलासपुर (छतीसगढ. )

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