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मंगलवार, 30 जुलाई 2013

जी चाहता है--------

जी चाहता है--------
दिल को तोड के लिख दूँ
कलम को मोड के लिख दूँ
फ़लक को  फ़ोड के लिख दूँ
जमीँ को निचोड के लिख दूँ

जी चाहता है-------------
दर्द को  घोल के पी लूँ
ज़हर को भी अमर कर दूँ
मोहब्बत को ज़हर कर दूँ
गंगा को उल्टा बहा दूँ

जी चाहता है------------
नकाबों को आग लगा दूँ
बुझता हर चिराग जला दूँ
रेत से चीन की दीवार चिनवा दूँ
ज़िन्दगी को मौत से जिता दूँ

जी चाहता है-------------
हर रोक को आज हटा दूँ
हर पंछी को उडना सिखा दूँ
रस्मों की हर रवायत मिटा दूँ
बेफ़िक्री का डंका बजा दूँ

जी चाहता है------------
ब्रह्माँड को उलट दूँ
ब्रह्मा की सृष्टि को पलट दूँ
पाप पुण्य का भेद मिटा दूँ
इंसान को देवता बना दूँ

जी चाहता है------------------
हर नियम कानून की नींव मिटा दूं
मौत को भी रास्ता भुला दूँ

अमीरी गरीबी का भेद मिटा दूँ
रिश्वतखोरों  की कौम मिटा दूँ
भ्रष्टाचारियों को फ़ांसी चढा दूँ

एक नया जहान बसा दूँ

मगर मनचाहा कब होता है?





( भ्रष्ट तंत्र से परेशान हर ह्रदय की व्यथा )

शनिवार, 27 जुलाई 2013

एक थिरकती आस की अंतिम अरदास


जो पंछी अठखेलियाँ किया करता था कभी 
मुझमें रिदम भरा करता था जो कभी 
बिना संगीत के नृत्य किया करता था कभी 
वो मोहब्बत का पंछी आज धराशायी पड़ा है 
जानते हो क्यों ?
क्योंकि ………तुम नहीं हो आस पास मेरे 
अरे नहीं नहीं ………ये मत सोचना 
कि शरीरों की मोहताज रही है हमारी मोहब्बत 
ना ना …………मोहब्बत की भी कुछ रस्में हुआ करती हैं 
उनमे से एक रस्म ये भी है ……क़ि तुम हो आस पास मेरे 
मेरे ख्यालों में , मेरी सोच में , मेरी साँसों में 
ताकि खुद को जिंदा देख सकूं मैं ………
मगर तुम अब कहीं नहीं रहे
ना सोच में , ना ख्याल में , ना साँसों के रिदम में 
मृतप्राय देह होती तो मिटटी समेट  भी ली जाती 
मगर यहाँ तो हर स्पंदन की जो आखिरी उम्मीद थी 
वो भी जाती रही…………….तुम्हारे न होने के अहसास भर से 
और अब ये जो मेरी रूह का जर्जर पिंजर है ना 
इसकी मिटटी में अब नहीं उगती मोहब्बत की फसल 
जिसमे कभी देवदार जिंदा रहा करते थे 
जिसमे कभी रजनीगंधा महका करते थे 
यूं ही नहीं दरवेशों ने सजदा किया था 
यूं ही नहीं फकीरों ने कलमा पढ़ा था 
यूं ही नहीं कोई औलिया किसी दरगाह पर झुका था 
कुछ तो था ना ……………क़ुछ तो जरूर था 
जो हमारे बीच से मिट गया 
और मैं अहिल्या सी शापित शिखा बन 
आस के चौबारे पर उम्र दर उम्र टहलती ही रही 
शायद कोई आसमानी फ़रिश्ता 
एक टुकड़ा मेरी किस्मत का लाकर फिर से 
गुलाब सा मेरे हाथों में रखे 
और मैं मांग लूं उसमे खुदा से ……तुम्हें 
और हो जाए कुछ इस तरह सजदा उसके दरबार में 
झुका  दूं सिर कुछ इस तरह कि फिर कहीं झुकाने की तलब न रहे 
उफ़ …………कितना कुछ कह गयी ना 
ये सोच के बेलगाम पंछी भी कितने मदमस्त होते हैं ना 
हाल-ए -दिल बयाँ करने में ज़रा भी गुरेज नहीं करते 
क्या ये भी मोहब्बत की ही कोई अनगढ़ी अनकही तस्वीर है …………जानाँ
जिसमे विरह के वृक्ष पर ही मोहब्बत का फूल खिला करता है 
या ये है मेरी दीवानगी जिसमे 
खुद को मिटाने की कोई हसरत फन उठाये डंसती रहती है 
और मोहब्बत हर बार दंश पर दंश सहकर भी जिंदा रहती है 
तुम्हारे होने ना होने के अहसास के बीच के अंतराल में 
एक नैया मैंने भी उतारी है सागर में 
देखें …उस पार पहुँचने पर तुम मिलोगे या नहीं 
बढाओगे या नहीं अपना हाथ मुझे अपने अंक में समेटने के लिए 
मुझमे मुझे जिंदा रखने के लिए 
क्योंकि …………जानते हो तुम 
तुम  , तुम्हारे होने का अहसास भर ही जिंदा रख सकते हैं मुझमे मुझे 

क्या मुमकिन है धराशायी सिपाही का युद्ध जीतना बिना हथियारों के 
क्योंकि 
उम्र के इस पड़ाव पर नहीं उमगती उमंगों की लहरें 
मगर मोहब्बत के बीज जरूर किसी मिटटी में बुवे होते हैं 

( एक थिरकती आस की अंतिम अरदास है ये ……जानाँ )

बुधवार, 24 जुलाई 2013

ओ मेरे !.......10

आँख में उगे कैक्टस के जंगल में छटपटाती चीख का लहुलुहान अस्तित्व कब हमदर्दियों का मोहताज हुआ है फिर चाहे धुंधलका बढता रहा और तुम फ़ासलों से गुजरते रहे ……ना देख पाने की ज़िद पर अडी इन आँखों का शगल ही कुछ अलग है …………नहीं , नहीं देखना ………मोहब्बत को कब देखने के लिये आँखों की लालटेन की जरूरत हुयी है …………बस फ़ासलों से गुजरने की तुम्हारी अदा पर उम्र तमाम की है तो क्या हुआ जो तुम्हें मैं नज़र ना आयी , तो क्या हुआ जो तुम्हारे कदमों में ना इस तरफ़ मुडने की हरकत हुयी ………इश्क के अंदाज़ जुदा होते हैं फ़ासलों में भी मोहब्बत के खम होते हैं ………जानाँ !!! 

अब मुस्कुराती हूँ मैं अपने जीने के अन्दाज़ पर ………फिर क्या जरूरत है रेगिस्तान में भटकने की …………कैक्टस के फ़ूल यूँ ही नहीं सहेजे जाते …………उम्र फ़ना करनी पडती है धडकनो का श्रृंगार बनने को…………और मैंने तो खोज लिया है अपना हिमालय …………क्या तुम खोज सकोगे कभी मुझमें , मुझसा कुछ ………यह एक प्रश्न है तुमसे ओ मेरे !

शनिवार, 20 जुलाई 2013

" बाइपास "............मेरा दृष्टिकोण


आयकर एवं वैट अधिवक्ता मलिक राजकुमार जी साहित्य जगत में एक जाना पहचाना नाम हैं । कितने ही कहानी संग्रह, कविता संग्रह उपन्यास , यात्रा वर्णन आदि उनके छप चुके हैं। इसके अलावा कविता , गज़ल संग्रह आदि का संपादन भी कर चुके हैं साथ में उनकी किताबों पर लघु शोध  भी हो चुके हैं कुछ पर पीएच डी भी हुई है।  इसके अलावा दूरदर्शन रेडियो आदि पर कहानी वार्ता कविता आदि प्रसारित होती रही हैं पंजाबी , ब्रज आदि भाषाओं में । ऐसे व्यक्तित्व के धनी ने मुझे अपना उपन्यास स्वंय भिजवाकर अनुगृहित किया ।

मलिक राजकुमार का उपन्यास बाइपास पढ़ा जो राजकुमार जी ने सस्नेह मुझे भिजवाया . ईश्वर का करम रहा कि उपन्यास पढने के लिए बहुत ज्यादा बिजी होते हुए भी वक्त मिलता रहा और किश्तों में पढ़ती रही . कभी इतना वक्त हुआ करता था कि दो घंटे में मोटे से मोटा उपन्यास पढ लिया करती थी मगर अब वक्त की कमी से किश्तों में गुजरती है ज़िन्दगी।

इस उपन्यास की खासियत ये है कि इसमें उस ज़िन्दगी का चित्र खींचा गया है जिसकी तरफ हम देखते तो हैं मगर कभी सोचते नहीं . एक अजीब सा कसैलापन अपने अंतस में समेटे हम  उन चरित्रों से रु-ब -रु तो होते हैं मगर वो कैसे ऐसे बनते हैं , कैसे उनकी सोच , उनके व्यवहार और बातचीत में एक कडवाहट शामिल हो जाती है हम कभी उस तरफ देख नहीं पाते क्योंकि हमारी दृष्टि सिर्फ हम तक ही सीमित रहती है मगर राजकुमार जी की दृष्टि ने उन चरित्रों के जीवन के उन भेदों पर निशाना लगाया है जो तभी किया जा सकता है जब इंसान या तो खुद उन हालात से गुजरा हो या उसने उन हालातों को बहुत करीब से देखा या सुना हो . अब ये तो वो ही जाने कि कैसे उन्होंने प्रत्येक चरित्र को आत्मसात किया और इतना अद्भुत चित्रण किया . 

बाइपास वो जगह होती है जहाँ से न जाने कितनी जिंदगियां रोज गुजरती हैं किसी न किसी रूप में मगर बाइपास वहीँ रहता है कुछ इसी तरह इन्सान के जीवन में भी एक बाइपास होता है जिससे वो अपने अन्दर की उथल पुथल से गुजरता है मगर बाइपास पर उड़ने वाली धुल को खुद पर हावी नहीं होने देता न ही अपने चरित्र पर दाग लगने देता . 

बाइपास एक ऐसी जगह है जहाँ ट्रक वालों की ज़िन्दगी है तो कहीं ढाबे वालों का संघर्ष तो कहीं बचपन को लांघ सीधे प्रौढ़ावस्था में प्रवेश करते साइकिल के पंक्चर लगाने वालों की आँख में उभरी शाम की रोटी के लिए लडती ज़िन्दगी की दास्ताँ है और इसी में कुमार नाम के शख्श की जद्दोजहद जो ज़िन्दगी को अपनी शर्तों पर जीना चाहता है और जीता भी है अपने नियमों और शर्तों पर , किसी प्रकार का समझौता किये बगैर . न ज़िन्दगी से समझौता न समाज से न अपने उसूलों से जो आसान नहीं था क्योंकि जहाँ पूरा तालाब ही कीचड़ से भरा हो वहां कैसे  छींटों से बचा  जा सकता है मगर कुमार ने अपनी दृढ इच्छा शक्ति के बलबूते पर ना केवल ये कर दिखाया बल्कि वहाँ के लोगों के जीवन को भी बदला और समाज के कल्याण के लिये भी लाभकारी योजनाओं को कार्यान्वित किया बेशक अपना फ़ायदा उसका भी था मगर उसका उसने दुरुपयोग नहीं किया जो ये दर्शाता है कि यदि इंसान एक बार हिम्मत कर ले तो अपने चरित्र से समझौता ना करते हुये भी जीवन को सही दिशा में क्रियान्वित करते हुये एक सफ़ल जीवन जी सकता है । बेशक समाज की विभिन्न विडम्बनायें साथ साथ चलती रहीं और लेखक उन पर भी दृष्टिपात करता रहा और कुमार का उन पर प्रहार भी होता रहा मगर पूरे समाज को बदलना आसान नहीं इसलिये कुमार को भी कभी कभी चुप लगाना पडा मगर फिर भी अपने विचारों से बदलाव लाने का उस का प्रयास जारी रहा ।

लेखक का ये प्रयास बेहद सराहनीय है कि उसने समाज के उस अंग की ओर ध्यान दिलाया जिस तरफ़ हम देखना भी नहीं चाहते कि कैसे ज़िन्दगी समझौतों की नाव पर गुजरती है बिना किसी पतवार के । जहाँ दिन रात एक समान होते हैं और पेट की भूख हर समझौते को विवश कर देती है मगर उसमें भी कुछ चरित्र ज़िन्दादिली बरकरार रखते हैं क्योंकि जीवन है तो उसमें संघर्ष भी है और समझौते भी और उनके साथ जीने की जद्दोजहद भी …………बस इसी का नाम तो है बाइपास।
 नटराज प्रकाशन द्वारा प्रकाशित ये उपन्यास यदि आप पढना चाहते हैं तो मलिक राजकुमार जी से इन नंबर पर संपर्क कर सकते हैं 

M: 09810116001

     011-25260049

बुधवार, 17 जुलाई 2013

खोये हैं हम ना जाने किस जहान में

खोये हैं हम ना जाने किस जहान में 
आये कोई आवाज़ दे बुला ले उस जहान से



यूँ तो वापसी की डगर कोई नहीं 
बस उम्मीद के तारे पे रुकी है ज़िन्दगी
कतरनों को सीने की जद्दोजहद में 
आवाज़ के घुँघरुओं में बसी है ज़िन्दगी

चिलमनों के उस तरफ जो शोर था 
दिल में मेरे भी तो कुछ और था 
करवट बदलने से पहले कोई दे आवाज़ पुकार ले 
बस इसी आरज़ू की शाख से लिपटी खड़ी है ज़िन्दगी 

यूं तो जीने के बहाने और भी थे 
मेरे गम के सहारे और भी थे 
बस खुद को मुबारक देने की चाहत में 
उस पार की आवाज़ को तड़प रही है ज़िन्दगी 


खोये हैं हम ना जाने किस जहान में 
आये कोई आवाज़ दे बुला ले उस जहान से

शुक्रवार, 12 जुलाई 2013

की होगी सबने सुस्वादु मोहब्बत

याद है तुम्हें
वो पहला मिलन
जब हम
इक राह पर
इक मोड पर
अचानक मिले थे
और तुमने कहा था
तुम कौन हो?
तुम्हे देखकर
यूँ लगा
जैसे जन्मो की
तलाश को मुकाम
मिल गया हो
बताओ ना
कौन हो तुम?
तुम्हे तो मै
रोज अपने
ख्यालों मे
देखा करता था
कैसे आज
सपना साकार
हो गया
कैसे तुमने
आकार पा लिया
क्या मेरी खातिर?
और मै
सिर्फ़ तुम्हे
सुनती ही रही
और सोचती रही
ये कौन है अजनबी
कैसे इतना बेबाक
हो गया
कैसे इसका वजूद
मुझमे खो गया
और फिर हम
बिना हाथो मे हाथ डाले
निकल पडे अन्जाने सफ़र पर
बिना कोई वादा किये
बिना मोहब्बत का
इज़हार किये
बिना किसी आस के
सिर्फ़ एक विश्वास के साथ
हाँ ……कोई है इस जहाँ मे
जिसके सीने मे
मोम पिघलता है
है ना………कुछ ऐसा ही
क्योंकि बिन लफ़्ज़ों की मोहब्बत के घूंट का स्वाद 

उम्र भर के लिये जुबाँ  पर रुक जाता है 
की होगी सबने सुस्वादु मोहब्बत 
मगर नमकीन मोहब्बत के स्वाद ज़ेहन की धरोहर होते हैं
कहो ना…………ये है हमारी पहली मोहब्बत 
पहले मिलन की याद ……जिसमे कभी इतवार नही होते

बुधवार, 10 जुलाई 2013

ओ मेरे !.............9

रिदम वाद्य यंत्रों में कब होती है ............बिना साधे तो स्वर उसमे भी नहीं फूटा करते ............कसना पड़ता ही है तारों को , खींचनी पड़ती है नकेल तभी सप्त सुर एक संगीत की लड़ी में पिर जाते हैं ..........बस यूं ही ............तुम्हारा प्रेम है जिसे साधती हूँ मैं ..........अपनी साँसों की लड़ियों में , ह्रदय  के कम्पन में , धडकनों की झंकार में ............तब कहीं जाकर कभी कभी एक गीत झड़ता है तुम्हारी शुष्क प्रियता की शाख से ............और उसी में जीने की कोशिश करती हूँ मैं " पूरा एक  जीवन "............वरना  तो पीले पत्ते मूंह चिढाते रोज झड़ते हैं संवेदनहीन होकर और मैं समेट  लेती हूँ आँचल में उनका पीलापन ..........ना जाने कौन सी नीम की निम्बोली दाब रखी है तुमने दाढ़ के नीचे ...........कसैलापन जाता ही नहीं और मैं आदी  हो चुकी हूँ अब ...........तुम्हारे कसैलेपन की ......जानाँ !!!!!!!!

नमक ज़ख्म पर छिडकने से भी अब तो राहत मिलती है इसलिए गर्म करके चिमटे का सेंक दे देती हूँ कभी कभी ..........दर्द की बयारें कहीं बंद न हो जाएँ और मेरा जीना कहीं दुश्वार न हो जाए ...........आखिर आदत भी कोई चीज होती है ना ............सुनो ! तुमने भी क्या कभी ऐसी कोई आदत पाली है , जी सकते हो मेरी तरह ...........लबों पर मुस्कान धरे , ज़िन्दगी से भरपूर होकर ...............मगर दिल की जगह उसकी राख भी न बची हो ...............एक अंधकूप में रहकर रौशनी से बचकर ...............तुमसे एक सवाल है ये ...........क्या दे सकोगे कभी " मुझसा जवाब " ............ओ मेरे !

बुधवार, 3 जुलाई 2013

ओ मेरे !……………8

दर्द कभी हुआ ही नहीं ..............हा हा हा ............सोच रहे होंगे फिर ये समंदर कैसे बना ............अरे जानां !!! कुछ फसलों को उगाने के लिए प्रेम का बीज रोंपा जाता है जिसमे से हरी हरी  कोंपलें जब फूटा करती हैं विरह की तब जाकर दर्द का जन्म हुआ करता है और दर्द को पैदा करने के लिए मौत से इश्क किया करती हूँ .............इसलिए दर्द होता नहीं है पैदा किया जाता है ........खुद की आहुति देकर , अपनी रूह को नोंच खसोट कर बीजना पड़ता है उसमे इश्क का कीला ........उम्र भर के लिए , एक जन्म के लिए नहीं ..............इस कायनात के आखिरी छोर तक के लिए ...............तब जाकर दर्द की खिलखिलाती , लहलहाती पैदावार होती है जो उम्र की चाशनी में डूबा डूबा कर , तीखी लहर बन लहू में दौड़ा करती है और इश्क की कहानी मुकम्मल होती है ..........जानां !!!

किसान हूँ ना किसना फिर भी बिना खेती के उपकरणों के पैदावार करना और बिना अधरों पर वंशी धरे खुद को सम्मोहित करने का हुनर जान गयी हूँ ........... रिस रिस कर तपती पटरी पर ज़िन्दगी की रेल धडधडाती गुजर रही है बिना आंच ताप को महसूस किये और मोहब्बत के जश्न भी मना रही है सिगार सी सुलग सुलग कर ...........क्या कभी मेरे साथ एक कश तुम भी लेने आओगे ........क्या कभी तुम कटौथी में गंगाजल भर एक घूँट भरोगे और करोगे इश्क का समंदर पार .............मेरी तरह !!!!!ये एक सवाल है तुमसे ..........क्या दे सकोगे कभी " मुझसा जवाब " ............ओ मेरे !