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मंगलवार, 28 जून 2011

इतनी जल्दी क्या थी

देखो आज
मुझे जरूरत थी
मगर तुम नहीं हो
ऐसा क्यूँ होता है
हमेशा .............
कभी तो सुन सको मेरे दिल की जुबान
कभी तो बांध सको रेत को मुट्ठी में
कभी तो लगा दो गांठ चुनरी में
कभी तो फाँस बिना चुभे भी निकाल दो
देखो आज तुम्हारी ...........
तुम्हारे बिन
कुम्हला गयी है
देखो कहीं ऐसा ना हो
जब तुम आओ
और देर हो जाये
तुम्हारी ........
ज़िन्दगी की धड़कन सो जाये
और तुम कहो
जानां  ...........इतनी जल्दी क्या थी जाने की
मैं आ तो रहा था ..............

शुक्रवार, 24 जून 2011

कहो ना ..........

उस दिन जब तुमने
उसे पसंद किया
और मैंने भी छुआ
तो एक तरंग सी
अहसासों से गुजर गयी
एक नमकीन सा अहसास
दिल में धड़क गया
स्पर्श का ऐसा अहसास
तो पहले कभी नहीं हुआ था
क्या तरंगें वस्तुओं से भी
पहुँचती हैं या हमारे दिल

इतने जुड़ चुके हैं कि
तरंगे वस्तुओं से गुजरकर
भी हम तक पहुँच जाती हैं
ये कैसे संकेत हैं
क्या प्रेम की तरंगें
इतनी गहरी होती हैं
या प्रेम तरंगें ऐसे ही बहती हैं
बिना माध्यम के
दिल की तारों पर
मचलते स्पंदनों में
ए क्या तुम्हारे साथ भी
ऐसा होता है
क्या तुमने भी कभी
मुझे यूँ ही महसूस किया है
बिना स्पर्श के
मगर अहसास और अनुभूति में
जीवंत किया हो
कहो ना ..........

मंगलवार, 21 जून 2011

या ये मेरा कोरा भरम था

सुना था
कोई याद करे
कोई बात करे
कोई बारिश मे भीगे
कोई सपनो मे देखे
कोई ख्यालो मे संजोये
तो हिचकी आती है
मगर देखो ना
मै तो इक पल को भी
कभी तुमको भूली ही नही
यादों से कभी तुमको
रुखसत ही नही किया
ख्यालों मे …दिन मे
सपनो मे …रात मे
भिगी भीगी बरसात मे
फिर चाहे आसमानी हो
या रुहानी
तुम और तुम्हारी यादो को
हमेशा भिगोये रखा
बताओ ज़रा ……
कभी एक सांस भी
ले पाये मेरी हिचकियों बिन
या  ये मेरा कोरा भरम था
तुम्हे कभी हिचकी आई ही नही

शुक्रवार, 17 जून 2011

जो मानस का मोती बन पाता

ढूंढती हूँ मानस का मोती
शायद कहीं मिल जाए
जो छूट गया है आँगन में
फिर से मुझे मिल जाये

इक नदी सी मुझमे बहती थी
अठखेलियाँ लेती थी
दिन रात की कशमकश में
कोई अधूरी सुबह  मिल जाये

अमराइयों की छांह तले
कहीं कोई शाम मिल जाये
जो मुझे मुझसे मिला जाये
और पीर सारी ले जाए

उर की धधकती ज्वाला में
ना स्नेह का कोई गीत जगा
बरसों तलाशा है जिसको ,वो
 कहीं ना मन का मीत मिला

जिस्म की आग में पिघलते
सारे लोह खण्ड ही मिले
वक्त के तंदूर में जलते
रूह के भग्नावशेष मिले
पर  मन के दरिया में बहता
कोई ना ऐसा गीत मिला
जो मानस का मोती बन पाता
मुझे जीने का सबब दे पाता


मंगलवार, 14 जून 2011

और कविता लौट गयी कभी ना मुडने के लिये…………

सोच की आखिरी सीढी पर जाकर कविता फिर मुडती है
और कहती है
कहां से शुरु करूँ
तुम अब तुम न रहे
मै अब मै न रही
न तुम्हारे जज़्बात मे
वो आंधियां रहीं
ना तुम्हारी कलम मे
वो स्याही रही
जिसमे लफ़्ज़ रूह
बनकर उतरते थे
और दिल पर
सुबह की ओस से
गिरते थे
फिर कैसे तुम करोगे
मुझे व्यक्त
अव्यक्त हूं और
अब अव्यक्त ही
रह जाऊंगी
क्योंकि अब
दीवारों पर
कांच का प्लास्टर
चढा रखा है
सब दिखने लगा है
आर -पार
तुम्हारे भीतर का
भयावह सच
तुम अब मुझे
जीते नही हो
उपभोग की
सामग्री बना दिया
मेरा क्रय विक्रय किया
और मेरे वजूद का
हर कोण पर
बलात्कार किया
क्योंकि अर्थ यूं ही
नही मिला करता
ज़माने की नब्ज़
के आगे तुमने भी
सिर झुका दिया
फिर कैसे करोगे
तुम मुझे व्यक्त
अब तुममे वो
चाशनी बची ही नही
वो अमृत रहा ही नही
आखिर तुमने भी
बाज़ारवाद की भेंट
चढा दिया मुझे
लौटा रही हूं
तुम्हारा अक्स तुम्हे
अब नही मिलूंगी
किसी दिल के बाज़ार मे
करवट बदलते
अब नही मिलूंगी
किसी गरीब की झोंपडी मे
आग सेंकते
अब नही मिलूंगी
किसी छंद मे बंद होते हुये
अब सब मिलेगा तुम्हे
मगर नही मिलेगा तो बस
स्वान्त: सुखाय का अर्थ
जाओ जी लो अपनी ज़िन्दगी
और कविता लौट गयी
कभी ना मुडने के लिये…………

शनिवार, 11 जून 2011

मैंने कहा था ना

मैंने कहा था ना
जो नकाब डला है
डाले रहने दो
मत करो बेनकाब
एक बार यदि
बेनकाब हो जाये
फिर कितनी सदायें भेजो
कितने ही सितारे
आसमा में टांको
कितना भी अब
दुल्हन को सजाओ
कोई भी चूनर उढाओ
एक बार बेनकाब होने पर
अक्स सच बोल देता है
और फिर ये तो
एक रिश्ता था
तुम्हारा और मेरा
अन्जाना रिश्ता
कहा था ना
मिलने की ख्वाहिश को
ज़मींदोज़ कर दो
मगर तुम नहीं माने
और देखा
जब से मिले हो
सारे भ्रम टूट गए
और तुम जो मुझमे
अपना अक्स देखते थे
वो आईने भी टूट गया
जानती हूँ तभी
तुमने अब मेरी
मिटटी पर अपने
निशाँ छोड़ने बंद कर दिए
जानती हूँ तभी तुमने
अपने आसमाँ अलग बना लिए
काश ! तुमने पर्दा ना हटाया होता
तो चाँद घूंघट में ही रहा होता
यूँ बेबसी की आग में ना जल रहा होता
सच की आँच में झुलसा ना होता
और तेरा पैमाना ना छलका होता
जीने के लिए किवाड़ की ओट ही काफी होती है

बुधवार, 8 जून 2011

प्रिया ! कहाँ खो गयीं तुम ?

आज भी याद है 
वो पहले मिलन की
पहली खुशबू
सांसों के साथ महकती सी 

वो तुम्हारी नागिन सी
बलखाती ,लहराती 
वेणी जब मेरे सीने से
टकराई थी 
इक आह सी निकल आई थी 
तुम बिलकुल मेरे
पीछे ही तो थीं
जब तुमने
लापरवाही से
अपनी करीने से बंधी
वेणी को पीछे झटका था
उस वेणी का पहला स्पर्श
आज भी मदमाता है
और जब मैंने पलटकर
तुम्हें देखा तो 
न जाने गुस्सा 
कहाँ काफूर हो गया 
और तुम्हारी 
चंचल मुस्कान
बेफिक्र अदा
बात- बात पर 
खिलखिलाना 
होशो -हवास 
गुम करने के लिए
काफी था 
और तुम 
अपनी दुनिया में मस्त थीं 
तुम्हें पता भी न था
कि किसे घायल कर दिया
किसी को अपनी ज़ुल्फ़ों का
कैदी बना लिया 


देखो आज भी 
तुम्हारी वेणी
मेरे ह्रदय आँगन में 
पहाड़ों की सर्पीली 
राहों सी बलखाती है 
मैं इन राहों में
खो जाता हूँ 
और तुम्हें ढूंढता हूँ 
प्रिये , ये कौन सा 
मुकाम आ गया 
ज़िन्दगी का 
वो अल्हड़ता , चंचलता 
उन्मुक्त हंसी 
आज ढूंढता हूँ
तुम में उसी कमसिनी को
फिर ढूंढता हूँ एक बार
तुम्हारे साथ 
उसी पल को
जीना चाहता हूँ
प्रिया ! कहाँ खो गयीं तुम ?

पास होकर भी 
क्यूँ दूर हो तुम 
पता नहीं 
वक्त अजीब होता है
या रिश्ते 
मगर मैं तुम्हारे 
प्रेम की वेणी में आबद्ध 
वो प्रेम पुष्प हूँ 
जो आज भी 
तुममे तुम्हें ढूंढता है        

शुक्रवार, 3 जून 2011

एक सच और टूट गया

मुझे पता था
जाओगे एक दिन
तुम भी छोड़कर
टूटे हुए मकबरों पर
कौन चराग जलाता है
शायद तभी शाम अब
दिया बाती नहीं करती
जानती है ना कोई नहीं आएगा
बुझे चराग रौशन करने
क्या हुआ जो आज
एक सच और टूट गया
यूँ भी मरे हुए को ही
दुनिया भी मारती है
क्या हुआ जो तुमने भी
ज़ख्मो पर नमक छिड़क दिया
आखिर कब सिसकती
शामों को सुबह मिली है