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शुक्रवार, 29 अप्रैल 2011

देह से आगे गणनाएं नहीं की जातीं


किसने हक़ दिया
तुम्हें हंसने का
अपनी मनपसंद
ज़िन्दगी जीने का
किसने हक़ दिया
तुम्हें मरने का
ज़िन्दगी से ऊब कर
ज़िन्दा लाशें
सिर्फ सड़ने के लिए
होती हैं
उनका वजूद
होता ही कब है
जो कुछ पल
मुस्कुरा सकें
उनका वजूद होता
ही कब है
जो खुद पर इठला सकें
प्रायोगिक वस्तुएं
निजी अस्तित्व नहीं रखतीं
उन्हें सिर्फ
इस्तेमाल किया
जाता है
अधिकार सिर्फ
मालिक का होता है
किरायेदार तो सिर्फ
ज़िन्दगी भर
किराया देते हैं
तीलियाँ तो सिर्फ
जलने के लिए
होती हैं
जिनसे सिर्फ
रौशनी की जाती है
तीलियों को
सहेजा नहीं जाता
सिर्फ उपयोग किया
जाता है
आखिर तीलियों की
इससे आगे
हैसियत ही क्या है
चलती फिरती
ज़िन्दा लाशें
मुस्कुराने को मजबूर
इज्जत बचाने को मजबूर
अदृश्य बेड़ियों में जकड़ी
अपने वजूद से लड़तीं
समाज की बलि वेदी पर
खुद को होम करतीं
पति और बच्चों
की चाहतों पर
कुर्बान होतीं
अपनी इच्छाओं
आकांक्षाओं को
ज़हर के घूँट पिलातीं
बेशक मिट जायें 

मगर
कुछ वजूदों की 

देह से आगे गणनाएं नहीं की जातीं

बुधवार, 27 अप्रैल 2011

पहन लेती उम्र भर के लिये

काश कर सकती ऐसा
कि कर लेती बंद
मन्त्रों से तुम्हें
और समेट लेती
तुम्हारा वजूद
एक छोटे से
यन्त्र में
पढवा लेती
कलमा किसी
मौलवी से
या किसी दरवेश से
या किसी फकीर से
और कर देता
वो तुम्हें बंद
चंद आहुतियों से
किसी अमावस की रात को
या किसी पूनम  की रात को
मेरे लिए , मेरे नाम के साथ
ज़िन्दगी भर के लिए
मेरे बन जाने के लिए
और मैं पहन लेती
गले में उम्र भर के लिए
तुम्हें ताबीज बना कर

रविवार, 24 अप्रैल 2011

धूप भी मजबूर होती है

अब नहीं उतरती धूप
मेरे चौबारे पर
शायद कहीं और
आशियाँ बना लिया उसने
कौन उतरता है
सीले हुए मकान में
घुटन , बदबूदार
अँधेरी कोठरियां
डराती हैं
बंद तहखाने
हजारों कीड़ों की
शरणस्थली बन जाते हैं
ये रेंगते हुए
कीड़े मकौड़े
किसी और के
अस्तित्व को
स्वीकार नहीं पाते
डँस लेते हैं
अपने दंश से
धराशायी कर देते हैं
लहूलुहान हो जाता है
बिखरा हुआ अस्तित्व
ऐसी चौखटों पर
कौन आशियाना
बनाना चाहेगा
जिस पर सुबह
का पैगाम ना
पहुँचता हो
जिस पर सांझ की
बाती ना जलती हो
जहाँ सिर्फ और सिर्फ
अंधेरों का वास हो
बताओ कैसे
उन चौबारों पर
धूप उतरेगी
किसे गर्माहट देगी
किसे अपने रेशमी
स्पर्श से सहलाएगी
कैसे अँधेरी खोह में
छुपी नमी को सुखाएगी
आखिर उसकी भी
एक सीमा होती है

सीमाओं का अतिक्रमण 
चाह कर भी नही कर पाती
एक मर्यादा होती है
शायद इसलिए
अपना आशियाना
बदल देती है
धूप भी मजबूर होती है

दस्ताने पहनने को………

बुधवार, 20 अप्रैल 2011

बताओ ना कौन सी रिश्वत देते हो

ए ………सुनो
बहुत कहना चाह
रहा है आज ये दिल
मगर शब्द साथ
नही दे रहे
ना जाने कौन सी
खोह मे छुप गये
ज़रा देखना
तुम्हारे दिल के
पास तो नही
टहलने आ गये
ज़रा देखना
तुमसे तो
नही गुफ़्तगू
कर रहे
मेरे दिल की तो
कहीं नही कह रहे
ज़रा देखना
कोई नया
फ़साना तो नही
गढ रहे
ये शब्द बहुत
बेईमान हो गये है
आजकल
जब भी देखते हैं तुम्हे
मेरा दामन छोड
तुम्हारे पहलू मे
सिमट आते हैं
बताओ ना
कौन सी
रिश्वत देते हो

सोमवार, 18 अप्रैल 2011

.क्या होगा इसका जवाब सरकार के पास ?

ना जाने कब से एक प्रश्न कुलबुला रहा है कि आज जब भ्रष्टाचार के मुद्दे पर एक लडाई लड़ी गयी तब उसका कुछ हल निकालने की दिशा में कदम उठाने शुरू हुए मगर किसी ने ये नहीं सोचा अब तक कि इतना भ्रष्टाचार फैला कैसे और किसके कार्यकाल में और क्यों? देखा जाये तो भ्रष्टाचार का हमेशा बोलबाला रहा फिर भी पिछले कुछ सालों में भ्रष्टाचार ने अपनी जडें इतनी फैला लीं कि कोई टहनी , कोई शाखा भ्रष्टाचार से मुक्त दिखाई नहीं देती ............जहाँ भी नज़र दौड़ाओ सिर्फ और सिर्फ भ्रष्टाचार की व्यापकता नज़र आती है .........कोई ना कोई घोटाला तैयार है हर दिन ............अब तो लगता है हम गिनती भी भूलने लगेंगे कि कौन से कौन से कामों में भ्रष्टाचार फैला और कौन कौन उसमे शामिल था .............कौन सा ऐसा कार्य रहा जहाँ भ्रष्टाचार का बोलबाला ना रहा हो और वो भी पिछले दस सालों में तो भ्रष्टाचार सीमा से बाहर होता जा रहा है ...........अब तो भारत देश को भ्रष्टाचार का देश कहा जाने लगा है तो ऐसे में ये प्रश्न उठना वाजिब है कि आखिर इसके लिए दोषी कौन है और किसके कार्यकाल में भ्रष्टाचार सबसे ज्यादा फैला ?

क्या नैतिकता की दृष्टि से सरकार को अपना पड़ नहीं छोड़ देना चाहिए ?

सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार एक ही सरकार के कार्यकाल में हुआ है सभी जानते हैं तो ये प्रश्न क्यूँ नहीं उठाया जाता ?

आखिर इसके लिए आन्दोलन क्यों नहीं किया जाता?

शायद इसलिए क्योंकि हमाम में सभी नंगे हैं लेकिन जनता को तो अपनी शक्ति और एकता का परिचय देना चाहिए और एक आह्वान ऐसा भी करना चाहिए .............क्यों नहीं जनता सरकार से जवाब  मांगे कि उनके ही कार्यकाल में भ्रष्टाचार आसमान को कैसे छूने  लगा ?

क्या सरकार की कोई जवाबदेही नहीं है?

सरकार तो एक मिनट में किसी से भी कुछ भी पूछने को तैयार रहती है यहाँ तक कि अन्ना के अनशन को किसने प्रायोजित किया , कितने पैसे लगे ऐसे सवाल एक पल में सरकार ने उठा दिए मगर क्या जनता फिर उनसे ये सवाल नहीं कर सकती कि आपके कार्यकाल में इतना भ्रष्टाचार कैसे हुआ और अब उन्हें नैतिकता के आधार पर अपने सभी मंत्रिमंडल के साथ त्यागपत्र दे देना चाहिए ?

ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिनके जवाब जनता जरूर जानना चाहेगी ..........क्या होगा इसका जवाब सरकार के पास ?

शनिवार, 16 अप्रैल 2011

सिर्फ निशाँ होते हैं

तुम पुकार लो
तो रुक भी जाऊं
तुम निहार लो
तो संवर भी जाऊं
तुम आ जाओ
तो साथ चल भी दूँ
तुम बढाओ हाथ
तो थाम भी लूँ
तुम दिखाओ ख्वाब
तो देख भी लूँ
और पलको पर
सजा भी लूँ
मगर तुमने कभी
पुकारा ही नहीं
उस नज़र से
निहारा ही नहीं
वो हक़ जताया ही नहीं
कभी हाथ बढाया ही नहीं
फिर कैसे , कौन से मोड़ पर
रूकती और किसके लिए?
सिर्फ निशाँ होते हैं
इंतज़ार के मोड़ नहीं हुआ करते ..............

बुधवार, 13 अप्रैल 2011

एक प्रेम पत्र अनदेखे अहसास के नाम


आज तेरे
अह्सास का
छूकर निकल जाना
अन्दर तक
तडपा गया
मुझसे मुझे
चुरा ले गया
तेरी चाहत की बदली
दिल पर छा गयी
हर धडकन की
गूँज भिगो गयी
अहसास से
तपते दिल
के काँच पर
पडती एक
बूँद तेरे प्यार की
कहीं कुछ
तडका गयी
जैसे आईना कोई
चटका गया
हर अंग शिथिल
कर गया मगर
आंखियो मे ठांठें
मारता सागर
ना रोक पाया
उसे ना शिथिल
कर पाया
शायद तेरा ना होना
ही तेरे होने का
अहसास कराता है
और तेरे अह्सास
की डोर मे
मेरे जज़्बातों को
बाँध ले जाता है
ओ अनदेखे अहसास!
तू दूर होकर भी
पास होता है
मेरी रूह
मेरे ख्यालो मे
बहते तेरे
अन्छुये स्पर्श
मुझे सिहरा
जाते हैं
और तेरे होने
का अह्सास
करा जाते हैं
ये कैसे
अहसास हैं
जो हर
स्पन्दन को
स्पन्दित कर जाते हैं
कहाँ हो
कौन हो
नही जानती
मगर फिर भी
जैसे भीड मे भी
तुम्हे पहचानती हूँ
कैसे अहसास हो
जो मुझे मुझसे
छीने जाते हो
और तडप को
मेरी और
तडपा जाते हो
यादों को
दिल के कोने मे
छुपा लेती हूँ
अहसासों को भी
अहसास नही होने देती
क्योंकि कुछ अहसास
सिर्फ़ रूह की थाती होते हैं

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

वस्त्रहीन

कभी कभी
उदासी इतनी
गहन होती है
शब्द भी
खामोश हो जाते हैं
या किसी कोने मे
दुबक जाते हैं
इंतज़ार मे
रहते हैं कि
कब उसके
जज़्बातों को
उसके दर्द को
शब्द अपने मे समेटें
मगर उदासी
अपने दामन को
धूप मे नही सुखाती
तार तार होने से
बचाने के लिये
अंधकूप मे ही
कायम रहती है
जहाँ शब्दों को भी
स्थान नही मिलता
कैसे खुद को
वस्त्रहीन करे कोई?
कैसे जज़्बातों की
कालि्ख छुपाये कोई
कैसे झूठ के आवरण
हटाये कोई और
सच से नज़र मिलाये कोई

सोमवार, 4 अप्रैल 2011

मुझे पता था

मुझे पता था
तुम वापस आओगे
मगर मेरे रंगों को
किसी अंधे कुएं मे
झोंककर
अपनी विवशताओं
लाचारियों की
दुहाई देते
क्या तब भी
ऐसा ही कर पाते
जब ये पुनरागमन
मेरा होता?
क्या स्वीकारते मुझे
उसी स्नेह,अपनेपन से
जैसी उम्मीद
मुझसे रखते हो?
जानती हूँ
कोई जवाब नही है
तुम्हारे पास
और ना ही
आज के किसी
मर्द के पास
क्योंकि
ये शक्ति ,
ये ताकत
ये धैर्य
ये क्षमाशीलता
तो सिर्फ़
औरत का
गहना होती है
तुम कहाँ खुद को
मेरे धरातल तक
ला सकते हो
कमजोर हो तुम
बहुत कमजोर
और मै
शक्ति…………
धारती हूँ ना
धरणी हूँ
मगर कभी सोचना जरूर
क्या तुम कभी
बनना चाहोगे
शक्ति, धरणी
एक नारी
सोचना जरूर