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रविवार, 21 जून 2009

धरती और आकाश का क्षितिज

धरती और आकाश का क्षितिज
दूर बहुत दूर ..........अनन्त में
कभी मिलकर भी
नही मिल पाते
धरती यूँ ही
आकाश की तरफ़
एकटक , टकटकी बांधे
ताकती रहती है
नेह को उसके
तरसती रहती है
और आकाश
जब मन चाहे तब
बरस जाता है
उसकी चुनरिया को
धानी कर जाता है
और धरती प्रेम के
अथाह सागर में
डूब जाती है
और कभी कभी
ऐसा भी होता है
धरती जो आकाश की ओर
निहारते - निहारते
अपने वजूद को भी
खोने लगती है
तब भी आकाश
अपने अहम् में चूर
धरती की प्रीत को
उसके स्नेह को
उसके धैर्य को
भुलाकर , उसे
वृक्ष के ठूंठ सा
बाँझ बना देता है
उसके रूप - सौष्ठव को
उसकी गरिमा को
उसके त्याग को
बंजर बना देता है
प्रेम के अंकुर को सुखा देता है
उसकी सहनशीलता को
तीक्ष्ण ताप से
कुम्हला देता है
इतनी उपेक्षित होकर भी
धरती आकाश से
मिलन की चाह में
अपने को मिटाती रहती है
एक क्षितिज की चाह में
ख़ुद को भुलाती रहती है
और क्षितिज कभी
नही मिलता उसे
कभी नही मिलता ..........

सोमवार, 8 जून 2009

सिर्फ़ एक दिन

अपनी ज़िन्दगी से
सिर्फ़ एक दिन
उधार दे दो मुझे
उस एक दिन में
उम्र गुजार लेने दो मुझे
एक -एक पल को
यादों में सजा लेने दो मुझे
मेरे संग ,
उम्र के हर बंधन को तोड़ते हुए
कुछ पलों के लिए
ज़िन्दगी को जी लेने दो मुझे
तुम मुझमें और मैं तुम में
ऐसे डूब जायें जहाँ
तुम आंखों से बोलो
और मैं उन अंखियों की
हर भाषा को
हर शब्द को
दिल में उतार लूँ
सिर्फ़ एक दिन तुम
मुझे अपना दे दो
और उस एक दिन में
मेरी उम्र बीत जाए
फिर आँख न खुले
फिर ये सपना न टूटे
बस
ज़िन्दगी की हर तमन्ना
पूरी हो जाए
तुम्हारा हाथ हो मेरे हाथ में
उस स्पर्श को
दिल के एक खास हिस्से में
सहेज लूँ
उस अहसास को कुछ पलों
में ही जी लूँ
सिर्फ़ एक दिन तुम
मुझे अपना दे दो
उस एक दिन में
मेरी ज़िन्दगी बसर हो जाए
तुम्हारे हाथों में
रजनीगंधा के फूल हों
मेरे दिल के हर कोने को
उसकी खुशबू से ऐसे महका दो
फिर कोई सुगंध न बसे मन में
तुम्हारी यादों की खुशबू में
तन मन रच बस जाए
बस एक दिन
तुम मुझे अपना उधार दे दो
मुझे मेरी ज़िन्दगी
जी लेने दो
सिर्फ़ एक दिन तुम
प्रेमी बन जाओ
मैं तुमसे रूठ जाऊँ
और तुम
मनुहार करके
मनाओ मुझे
एक दिन के लिए
प्रेमिका अपनी बनाओ मुझे
और उस एक दिन में
प्रेम के सारे रंग
दिखाओ मुझे
प्रेम रंग में ऐसे डूब जाऊँ
फिर न कोई रंग चढ़े
हर ख्वाहिश पूरी हो जाए
और फिर
उसी प्रेम रंग में
ज़िन्दगी तमाम हो जाए
फिर उस दिन की
कोई शाम न हो
कोई सुबह न हो
कोई कल न हो
कोई दिन न हो
कोई रात न हो
सिर्फ़ इसी एक दिन में
पूरी उम्र गुजर जाए

गुरुवार, 4 जून 2009

एक मुलाक़ात -----सायों की

एक अनजाने
अनदेखे
अजनबी से मोड़ पर
तेरा साया
मेरे साये से
टकरा गया
चारों आँखें
जब टकराई
तो देखा
मेरे साये ने
तेरे साये की
आंखों में
वहां शमशान की
वीरानी थी
सूखे हुए
अश्कों के निशान
तेरी कहानी
कह गए
एक वीराने की
खामोशी
एक अजनबियत
लिए तेरी आँखें
सब हाल बयां
कर गयीं
मेरे साये ने
तेरे साये की
आंखों में
मेरी तस्वीर
ढूंढनी चाही
राख के ढेर में
चाहत की
इक चिंगारी
ढूंढनी चाही
पर वहां तो
एक बेजुबान चीख
दबी दिखी
बिना किसी हलचल के
बिना किसी चाहत के
छुपी हुयी खामोशी देखी
तेरी चाहत की
इंतहा देखी
कोई उम्मीद
न बाकी देखी
पहचानना तो
दूर की बात थी
तेरे साये की
आंखों में
मेरे साये ने
लाश की सी
वीरानी दखी
और फिर
उस अजनबी मोड़ पर
बिना रुके
बिना मुडे
बिना देखे
बिना बात किए
तेरा साया
आगे बढ़ता गया
और मेरा साया
तेरे साये के
क़दमों के निशां तले
तेरे मेरे रिश्ते की
राख को
संजोता रहा