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बुधवार, 4 जुलाई 2007

ख्वाब

मैंने एक ख्वाब देखा है ,चाहतों का बाज़ार देखा है,
यह कौन सी मंज़िल है,जो मिल कर भी नहीं मिलती ,
हर तरफ एक खामोशी सी छाई है , दर्द है तनहाई है,
यह कौन सा मुकाम है जिन्दगी का, जहाँ कुछ नहीं मिलता ,
सिर्फ ख्वाबों को टूटते देखा और जिन्दगी को हाथ से फिसलते देखा ,
अब इस दौर मैं कैसे ख्वाबों को सजाऊँ ?
किसे आवाज़ दूं और किसे बुलाऊं ?

दिल चाहता है

दिल चाहता है आसमान में ऊड़ना,
पंछियों कि तरह उन्मुक्त ऊड़ना ,
बादलों की तरह हवा में तैरना ,
विशाल आकाश को छूना ,
जहाँ ना कोई बंदिश हो ना पहरे,
बस मैं हूँ और मेरी चाहतें हों,
जहाँ मैं सुन सकूं अपने मन कि बात ,
अपनी आवाज़ को दे सकूं शब्द ,
कुछ दिल की कहूं कुछ दिल की सुनूं
और बस आस्मां में ऊड्ती फिरूं ऊड्ती फिरूं ऊड्ती फिरूं।